बुधवार, 12 मार्च 2014

मजबूरी का नाम नहीं है- महात्मा गांधी



'खरी चवन्नी चांदी की जय बोलो महात्मा गांधी की से लेकर 26 जनवरी और 15 अगस्त के जुलूसों में लगने वाले महात्मा गांधी की जय की गूंज के साथ बचपन में ही गांधी से परिचय हुआ था। आइन्स्टाइन को तो बाद में पढ़ा कि - ''आने वाली पीढि़यों को मुशिकल से विश्वास होगा कि इस तरह का हाड़ माँस वाला मनुष्य इस धरती पर कभी मौजूद था लेकिन ऐसी अनेक चमत्कार कथाएँ भी सुनने को मिलती रहती थीं जिनसे गांधी के महात्मा ही नहीं अतिमानवीय शकित से सम्पन्न होने की पुषिट होती थी। कैसे गांधी की जय बोलने वाले को मारने के लिए दौड़ाने वाला अंगे्रज घोड़े से गिर कर मर गया या कुएँ में गिरी बकरी महात्मा का नाम जपने से सही सलामत मिल गयी जैसी कहानियों ने गांधी की एक अतिमानवीय छवि बना रखी थी।
गांधी की आत्मकथा सत्य का प्रयोग पढ़कर मैंने भी आत्मनिर्भरता के कर्इ प्रयोग किये थे जो अन्तत: हास्यास्पद सिद्ध हुए। उन दिनों मैंने भी गांधी की तरह गीता याद करने की कोशिश की थी। गांधी तो तेरहवें अध्याय तक पहुँच गए थे अपन तीसरे अध्याय तक जाते-जाते बोल गए। बहुत बाद में समझ में आया कि यह गांधी का प्रभावशाली गध था जो मेरे बाल मन को इस अनुकरण के लिए प्रेरित कर रहा था। समझ में यह भी आया कि गांधी की नकल संभव नहीं।
बाद में उच्च शिक्षा के लिए गांव से शहर आया तो एक दूसरे ही गांधी से परिचय हुआ। बातचीत में यह जुमला सुनने को मिला-मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। केवल बोलने में ही नहीं लिखत-पढ़त में भी इस जुमले का पर्याप्त प्रयोग होता है। लगभग सामान्य बोध की तरह। मैंने भी बिना सोचे समझे इस जुमले का प्रयोग सालों साल किया है।
महज संयोग है कि कुछ दिनों पहले मुझे सेवाग्राम और साबरमती आश्रम देखने का अवसर मिला। सेवाग्राम और साबरमती आश्रम में घूमते हुए अचानक मेरा ध्यान इस जुमले की ओर गया और मैं सोचने लगा कि क्या सचमुच मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। आखिर इस जुमले के मूल में क्या है। क्या इस जुमले का र्इजाद इसलिए हुआ कि गांधी को मजबूरी में भारत विभाजन स्वीकार करना पड़ा। गांधी उधर नोवाखाली में साम्प्रदायिक दंगों से निपट रहे थे इधर उनके अनुयायी देश के साथ-साथ खुद को भी आजाद कर रहे थे। लेकिन यह मानने को जी नहीं करता क्योंकि यदि गांधी मजबूर होते तो उन्हें मारने की क्या जरूरत थी। गांधी के पास अब भी ऐसा बहुत कुछ था जिससे वे औरों को मजबूर कर रहे थे। परायों को ही नहीं अपनों को भी। कहते हैं एक बार बिड़ला ने गांधी से पूछा कि देश तो आजाद हो गया अब आप किसके खिलाफ लड़ेंगे। गांधी ने मुस्कराते हुए बिड़ला की ओर इशारा किया। बिड़ला गांधी के अनन्य सहयोगी थे। जाहिर है गांधी की योजना अब अपने लोगों से लड़ने की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह लड़ार्इ ज्यादा हौसले की मांग करती है।
मुझे लगता हैं मजबूरी को महात्मा गांधी का पर्याय बताने वाले इस जुमले का प्रयोग इसलिए करते हैं कि हम गांधी को ठीक से जानते नहीं हैं। या उन्हें जानने के बारे में बहुत सचेत नहीं रहते। एक तरह की लापरवाही हमारे दिलो दिमाग में छार्इ रहती है और शायद हमारी नीयत में भी। गांधी को न जानना ही हमारे हित में हैं। दे दी हमे आजादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल तक ही गांधी को सीमित रखने में भलार्इ है।
सेवाग्राम में महात्मा गांधी की कुटिया के बाहर एक वजन नापने की मशीन रखी है। जिस पर दर्शकों के लिए सूचना लिखी है- 'महात्मा गांधी का वजन नापने की मशीन। महात्मा गांधी स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते थे क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही सभी कार्य होने हैं। इसलिए वे वजन नापने की मशीन रखते थे। हम महात्मा गांधी के उसी वजन तक पहुँच पाते हैं जो मशीन से नापी जाती है। महात्मा गांधी का वास्तविक वजन हमें परेशान करता है। इसलिए हम उन्हें दीवाल पर टंगी एक तस्वीर और एक नारे से अधिक नहीं जानना चाहते।
सेवाग्राम और साबरमती दोनों ही जगहों पर गांधी के जीवन की झांकी मौजूद है। सेवाग्राम में गांधी जिस कुटिया में रहते थे। उसके बरामदे में एक टेलीफोन बूथ है। जिसमें काले रंग का भारी भरकम फोन रखा हुआ है। गांधी जी से देश की राजनीतिक सिथतियों के बारे में वायसराय को बात करनी होती थी इसलिए वायसराय ने सेवाग्राम तक टेलीफोन लाइन बिछवार्इ और गांधी से बात-चीत करने के लिए यह टेलीफोन लगवाया। यह देखते ही मुझे गांधी का वह कथन याद आया जो उन्होंने 1916 में अखिल भारतीय एक भाषा सम्मेलन में लखनऊ में कहा था- 'मैं कहता हूँ यदि मैं बोलना जानता हूँ और मेरे बोलने में कोर्इ ऐसी बात रहेगी जिससे वायसराय लाभ उठा सकें, तो वह अवश्य ही मेरी बातें हिन्दी में बोलने पर भी सुन लेंगे। उन्हें आवश्यकता होगी तो उसका अनुवाद करा लेंगे।  यानी सुने जाने के लिए बात का होना महत्वपूर्ण है, यह या वह भाषा नहीं।
नमक सत्याग्रह के बाद गांधी ने तय किया था कि वे देश की आजादी हासिल होने के बाद ही साबरमती आश्रम आयेंगे। गांधी ने वर्धा के निकट सेगाँव में अपना नया ठिकाना बनाया। वर्धा से भी चार मील दूर। धुर देहात में। गांधी भारत में रहना चाहते थे और भारत गांव से बसता है। इसलिए वे 1936 से 1946 तक  सेगाँव में रहे। यह घनघोर राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। गांधी की जगह कोर्इ दूसरा व्यकित केन्द्र को छोड़कर यहाँ रहना पसन्द नहीं करता। रोज-रोज की गतिविधियाँ, राजनीतिक दाव पेंच। लेकिन गांधी अच्छी तरह जानते थे कि उनके पास कहने के लिए बात है। इसलिए वे जिस किसी भाषा में बोलेंगे और जहाँ से बोलेंगे उनकी बात सुनी जायेगी। सेगाँव, जिसे गांधी ने सेवाग्राम नाम दिया, में बैठे गांधी की बात सुनने के लिए तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने टेलीफोन लगवाया।
गांधी ने एक बार कहा था- मैं लिनलिथगो से कहूँगा कि भारत एक विशाल देश है। जिस परिसिथति में हम यहाँ रहते हैं उनमें यदि आप रह सकते हों तो आजादी के बाद भी यहाँ आराम से रहिए। गांधी के इस कथन को आधार बनाकर शंकर ने 'सबके लिए जगह शीर्षक से एक काटर्ून बनाया जो हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा था। इस काटर्ून में गांधी भारत के गावों में लिनलिथगो से रहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। गांधी का आग्रह सुन कर लिनलिथगो और गाँव की असुविधा छोड़कर निकल भागने को आतुर उनके साथियों का चेहरा देखने लायक है। अंग्रेजों की छोडि़ए गाँव में रहने के सवाल पर आज भारतीय मध्यवर्ग मजबूरी के अलावा किसी सूरत में तैयार नहीं है। बेशक गाँवों की सिथतियाँ इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन इन सिथतियों के लिए कौन जिम्मेदार है ? गांधी के जमाने में गाँव आज से कहीं ज्यादा पिछड़े थे किन्तु गांधी के लिए गाँव में रहने का अर्थ सेगांव को सेवाग्राम बना देना था।
गांधी ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा 12 मार्च 1930 को प्रात: साढ़े छ बजे शुरू की। अहमदाबाद से दांडी 240 मील दूर अरब सागर के किनारे बसा नामालूम सा गाँव था। 24 दिन की अनथक यात्रा के बाद गांधी पाँच अप्रैल को दांडी पहुँचे। अगली सुबह प्रार्थना के बाद मुÎी भर नमक उठाकर गांधी ने बि्रटिश साम्राज्यवाद की चूलें हिला दी। नमक उठाने जैसी साधारण बात इतनी युगान्तरकारी सिद्ध हो सकती है क्या गांधी इसे जानते थे ? शायद।
कभी-कभी मैं 7 जून 1883 की उस काली रात के बारे में सोचता हूँ जब डरबन से प्रिटोरिया जाते वक्त मेरित्सबर्ग में गांधी को पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद तीसरे दर्जे में जाने के लिए कहा गया। समझौता करके तीसरे दर्जे में आगे की यात्रा करने के बजाय गांधी ने मेरित्सबर्ग के रेलवे स्टेशन पर अंधेरी ठण्ठी रात गुजारना बेहतर समझा। अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध तन कर खड़ा होने वाला यह निर्णायक क्षण ही गांधी को गांधी बनाता है और किसी भी अन्याय अत्याचार का प्रतिकार करने वाले अदम्य साहस और आत्मबल का पता देता है।
गांधी का एक परिचय हमें प्रेमचन्द की कहानी र्इदगाह से मिलता है। र्इदगाह कहानी में नमाज के बाद बच्चे जब मेले में जाते हैं तो हामिद की उपेक्षा करते हैं, कुल जमापूँजी लगाकर चिमटा खरीदने पर उसका मजाक उड़ाया जाता है, मेले से लौटते हुए सब उससे लड़ते हैं और अन्त में सब हामिद और उसके चिमटे के कायल हो जाते हैं। मैं शिक्षाविद Ñष्ण कुमार का आभारी हूँ जिन्होंने र्इदगाह कहानी को गांधी के इस वाक्य से जोड़कर देखने का प्रस्ताव किया था- 'पहले वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे, फिर तुम्हारा मजाक उड़ाएंगे फिर तुमसे लडेंगे और फिर तुम्हारे पीछे चलने लगेेंगे।
गांधी कहते हैं- 'मेरा जीवन हीे मेरा सन्देश है। र्इदगाह कहानी के हामिद की तरह गांधी ने अपने जीवन से इस बात को सिद्ध किया था। उनकी उपेक्षा हुर्इ, उनका मजाक उड़ाया गया विरोध हुआ और फिर पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा । इसलिए मुझे कहने दीजिए कि मजबूरी का नाम नहीं है महात्मा गांधी। मजबूती का नाम है महात्मा गांधी। क्या हम इसे अपने सामान्य बोध का हिस्सा बना पायेंगे?

मंगलवार, 11 मार्च 2014

लोकतंत्र के कीमियागर बाबू जगजीवन राम




बाबू जगजीवन राम को 1977 के आम चुनावों में सुनने का अवसर मिला था। तत्कालीन राजनीतिक मसलों के अलावा जो बात ध्यान में रह गयी वह है उनकी भाषा। छोटे, सरल सुस्पष्ट वाक्य। सीधे और साफ ढंग से बिना लाग लपेट के अपनी बातें कह देने और सुनने वाले के तह तक उतर जाने की कला। मेरे किशोर मन में जगजीवन राम की ऐसी छवि बनी जिसने आगे चल कर जाति और वर्ग को योग्यता से जोड़कर देखने वाले पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में काफी मदद की।
काफी अन्तराल के बाद सन 2007 में बाबू जी के जीवन और चिन्तन से परिचित होने का अवसर मिला। काशी हिन्दू विश्वविधालय में बाबू जगजीवन राम पीठ कायम हुर्इ। उसका उदघाटन करने तत्कालीन सामाजिक न्याय और सहकारिता मन्त्री श्रीमती मीरा कुमार को आना था। इस कार्यक्रम की आयोजन समिति से मैं भी जुड़ा हुआ था। यह तय हुआ कि 'बाबू जगजीवन राम पीठ की स्थापना के पीछे जो विचार हैं, उन्हें एक ब्रोशर के रूप में प्रकाशित करके वितरित किया जाय। ब्रोशर तैयार करने के क्रम में बाबू जगजीवन राम के व्यकितत्व और विचारों का अध्ययन-अनुशीलन किया।
बाबू जी का जीवन कर्इ कारणों से विलक्षण है। वे अकेले ऐसे दलित नेता हैं जो राष्ट्रीय आन्दोंलन की मुख्यधारा में रहे है। आजादी के पहले स्वाधीनता आन्दोलन में तथा राष्ट्रीय सरकारों मेंं उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाइ±। आजादी के बाद बनी सरकारों में शामिल होकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में योगदान किया। राष्ट्रीयआन्दोलन के नेताओं का मानना था कि आजादी हासिल करना मुख्य लक्ष्य है। आजादी के बाद दलित मुकित के प्रश्न को हल कर लिया जायेगा, जबकि दलित नेतृत्व इसे लेकर सशंकित था। इसलिए दलित नेतृत्व ने दलित मुकित के सवाल को तरजीह दी। गांधी और अम्बेडकर के बीच की बहस मुख्य रूप से यही थी । बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा में रहते हुए दलित मुकित के लिए काम करने का रास्ता चुना। यह बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण था। राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण जातियों का प्रभुत्व था। गांधी के अनुनायी होते हुए भी राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व वर्ग में सभी गांधी नहीं थे। इसलिए अपनी दलित पृष्ठभूमि के नाते बाबू जगजीवन राम को राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं के साथ काम करते हुए जातीय भेदभाव और विद्वेष का दंश झेलना पड़ा। दूसरी तरफ उन्हें दलित नेतृत्व के व्यंग्य बाण भी सहने पड़े। भीतर और बाहर दोनों तरफ से मिलने वाले व्यंग्य और विद्वेष से विचलित हुए बगैर बाबूजी ने राष्ट्रनिर्माण के वृहत्तर सरोकारों और दलित मुकित के विशेष सरोकारों को दृढ़ता पूर्वक अंजाम दिया। बाबू जी  के जीवन से परिचित होने पर उनके व्यकितत्व की सबसे बड़ी खासियत नजर आती है- वह है विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ संयोग। इस विनम्रता और दृढ़ता का सम्बन्ध संत रैदास की बानी से है :
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी
जाकी अंग अंग बास समानी ।।
अपने प्रभु के साथ रच बस कर संत रैदास एकमेक हो गये थे। इस एकमेक भाव ने उन्हें सहज आत्मविश्वास से भर दिया था जिसके बल पर वे सामाजिक दंश से उपर उठ कर बेगमपुरा शहर के नागरिक बन सके थे। तुलसीदास के रामराज्य की कल्पना की चर्चा करते लोग अघाते नहीं है; पर मेरी राय में  रैदास का बेगमपुर रामराज्य से बेहतर और उन्नत संकल्पना है । (इस पर फिर कभी) संत रैदास का 'बेगमपुरा ऐसा शहर है, एक ऐसा वतन, जिसमें सभी के लिए खैरियत है। बाबू जगजीवन राम भी इसी बेगमपुरा के नागरिक थे। संत रविदास कहते हैं - 'जो हम सहरी सो मीतु हमारा। बेगमपुरा एक संकल्पना है। ऐसी संकल्पना जो मन को भेद बुद्धि से मुक्त करके समतामूलक समाज की संरचना करती है। बाबू जगजीवन राम इन्हीं अथो± में संत रविदास के 'हम सहरी और 'मीत थे।
मुझे याद है, शुरुआती दौर में बहुत से रेडिकल दलित चिन्तकों को संत रविदास की बानी नहीं पसन्द आती थी। उनकी शिकायत थी कि रविदास 'प्रभुजी। तुम चन्दन हम पानी और प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा कहते हैं। उन्हें लगता था इतना विनम्र आदमी दलित आन्दोलन का प्रतीक कैसे हो सकता है।  रैदास की विनम्रता दिखार्इ देती थी दृढ़ता नहीं। वर्ण व्यवस्था ने श्रम को हेय करार दे रखा था। रैदास ने श्रम की संस्Ñति को दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठापित किया। जैसे-जैसे दलित आन्दोलन आगे बढ़ा वैसे-वैसे रैदास के बारे में यह समझ विकसित होती गयी।
संत रैदास की यह विनम्रता और दृढ़ता ही है जो बाबू जगजीवन राम को एक ही साथ राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सहज और दलित सरोकारों के प्रति सजग बनाये रखती है।बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा में रहते हुए, सरकारों में शामिल होकर दलितोत्थान के लिए जो कार्य किये हैं उनका मूल्यांकन होना बाकी है। इसके लिए हमें दलित आन्दोलन के आगामी चरण का इन्तजार करना होगा।
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बाबू जी ने अपने एक व्याख्यान में कहा है- 'शरीर को ही गुलाम नहीं, किस तरह हमारे मसितष्क को गुलाम बना दिया गया है कि जो हमारे उपर अत्याचार करता है उसको हम अपने से बड़ा मान लेते हैं। सबसे बड़ा हमारे मसितष्क का ह्रास इसमें किया गया कि हमने अपने आप को छोटा समझ लिया। जो व्यकित खुद अपने आप को छोटा समझता रहेगा, वह कभी बड़ा नहीं बन सकता रविदास प्रसिद्ध और मान्य संत होने के बाद भी बार-बार 'कह रैदास खलास चमारा कहते हैं और जूता सीने का काम करते हुए इसी मानसिक गुलामी को तोड़ते हैं।
बाबू जगजीवन राम भी संत रैदास की भाँति स्वयं को हीन और अत्याचारी को श्रेष्ठ समझने वाली मानसिक गुलामी को तोड़ने का काम करते हैं। वे बार-बार सवाल करते हैं- 'मानव के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत करने का जतन क्या भारतीय समाज में सम्भव है। उनका ध्येय ऐसे समाज की रचना है जिसमें मनुष्य के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत किया जा सके। इसीलिए वे कहते हैं- 'भारतीय समाज ने हमको छोटा बनाकर रख दिया है, मैं किसी को छोटा नहीं बनाना चाहता। यह बहुत गहरे आत्मविश्वास से उपजा हुआ कथन है । हमें छोटा बनाया गया, पर हम किसी को छोटा नहीं बनाना चाहते, हमें घृणित समझा गया पर हम किसी को घृणित नहीं समझते, हमें उत्पीडि़त किया गया पर हम किसी को उत्पीडि़त नहीं करना चाहते, हमारा शोषण किया गया, पर हम किसी का शोषण नहीं करना चाहते। ऐसी अनेक बातें हैं जो इस आत्मविश्वास से निकलती हैं। बाबू जगजीवन राम की समझ है कि शोषण के क्रम को उलट कर शोषण मुक्त और समतामूलक समाज की रचना संभव नहीं है। शोषण और विषमता पर टिके समाज में कोर्इ भी मुक्त नहीं है इसीलिए बाबू जी कहते हैं- 'यदि मैं ब्राहमणवाद को मिटाने का जतन कर रहा हूँ, तो मैं ब्राहमण को भी मुक्त करना चाहता हूँ, ठाकुर को भी मुक्त करना चाहता हूँ सिर्फ दलितों को नहीं। रेडिकल से रेडिकल दलित चिन्तन को एक न एक दिन बाबू जी की इस बात का मर्म समझना होगा कि दलित मुकित अकेले संभव नहीं है। वह तभी संभव है जब ब्राहमणवाद के जाल से स्वयंं ब्राहमण की मुकित हो, क्षत्रिय की मुकित हो, सभी वणो± की मुकित हो, पूरे समाज की मुकित हो।
बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर इस बात को ठीक से समझते थे हम शायद इसीलिए उन्होंने बाबू जगजीवन राम को 'दूरदृषिट सम्पन्न ऋषि नेता करार दिया था।


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महात्मा गाँधी ने बाबू जगजीवन राम को आग में तपा खरा सोना कहा था। स्वाधीनता आन्दोलन की आग में वे कर्इ तरह से तपे थे। एक ओर वे औपनिवेशिक ताकतों के खिलाफ लड़ रहे थे तो दूसरी ओर स्वयं राष्ट्रीय आन्दोलन के भीतर मौजूद वर्णवादी सामन्ती वर्चस्व के खिलाफ भी एक मोर्चा खुला हुआ था। बाबू जगजीवन राम इससे भी दो चार हो रहे थे। भीतरी और बाहरी संघर्ष की इस आग में वे तपते और निखरते रहे।
एक बार  बनारस के बेनियाबाग में बाबू जगजीवन राम आये हुए थे। बी.एच.यू. के छात्रों की जमात भी पहुँची थी। छात्र शोर-गुल कर रहे थे। इस पर बाबू जगजीवन राम ने छात्रों से कहा- बुढ़ापा जवानी देख चुकी होती है पर जवानी को बुढ़ापा देखना बाकी होता है। इसलिए जवानों को बूढ़ों की बातें ध्यान से सुननी चाहिए। बाबूजी की मेघ-मन्द्र आवाज में निकले इस वाक्य का ऐसा असर हुआ कि छात्र शान्त होकर उन्हें सुनने लगे। बाबू जगजीवन राम ने जीवन की एक सहज सामान्य सचार्इ को कुछ इस तरह कहा कि सबने उस सचार्इ का अनुभव किया। वे जिस सहजता के साथ अगली पीढ़ी से संवाद स्थापित करते हैं उसमें एक अनुभव परम्परा की अनुगूँज सुनार्इ पड़ती है। उसमें रैदासके जीवन और वाणी की छाप मौजूद है।
जो सहिष्णु नहीं है वह धर्म नहीं है, जगजीवन राम ने यह रैदास से सीखा था। रैदास की वाणी को समझने के लिए âदय में भकित का होना आवश्यक है। रैदास को अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए बार-बार परीक्षा देनी पड़ी पर इसकी कटुता का कोर्इ चिन्ह रैदास के व्यकितत्व में नहीं मिलता। मंगलकारी व्यकितत्व अपने हिस्से के विष को आत्मसात कर लेते हैं और प्रेम के द्वारा संवेदनशीलता को विकसित करते हैंं। इसीलिए रविदास को बुद्धि से नहीं âदय से समझा जा सकता है। क्या इत्तफाक है कि रविदास की तरह जगजीवन राम को भी बार-बार परीक्षा देनी पड़ी है पर जगजीवन बाबू में भी सामाजिक दंश और अपमान से मिली कटुता का लेश मात्र नहीं है। उन्होंने वाराणसी में रैदास मनिदर का निर्माण कराया। यह रैदास मनिदर सिर्फ मनिदर नहीं है। इसके पीछे एक सुचिनितत दर्शन है। यह रैदास वाणी को जीवन में रोपने का यत्न है।
भारतीय समाज में दलित वर्ग में जन्म लेना अन्तहीन अपमान और यातना का सिलसिला है जिससे समाज ही नहीं, स्वयं वह व्यकित भी अपने को हीन मान लेता है। जगजीवन राम उसे इस हीनताबोध से मुक्त करते हैं। वे बार-बार ऐसे समूहों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं - शरीर को ही गुलाम नहीं, किस तरह हमारे मसितष्क को गुलाम बना दिया गया है कि जो हमारे उपर अत्याचार करता है उसको हम अपने से बड़ा मान लेते
सबसे बड़ा हमारे मसितष्क का ह्रास इसमें किया गया कि हमने अपने आपको छोटा समझ लिया। जो व्यकित खुद अपने आपको छोटा समझता रहेगा, वह कभी बड़ा नहीं बन सकता। इस चीज को याद कर लो। इस दिमागी गुलामी को बाबू जी रैदास के हवाले से समझाते हैं-
पराधीन को दीन नहीं पराधीन बे दीन।
रविदास पराधीन को सबही समझे दीन।

पराधीन का कोर्इ दीन नहीं हो होता, कोर्इ धर्म नहीं होता उसे सभी लोग हीन समझते हैं। इसलिए बाबू जगजीवन राम कहते हैं गुलाम का एक ही धर्म होता है कि वह गुलामी की बेडि़यों को तोड़कर फेंक दें।
हमारे समाज में गुलामी की बेडि़यों के मूल में जाति प्रथा है इसे बाबू जगजीवन राम अच्छी तरह समझ रहे थे। वे सच्चे अथो± में  जनतांत्रिक थे। उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि जनतानित्रक प्रक्रिया ही जाति प्रथा को खत्म कर सकती है। अपने जनतानित्रक मूल्यों, विश्वासों को जीवन में बरतते हुए और जाति प्रथा के दंश को महसूस करते हुए बाबू जगजीवन राम इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि जाति प्रथा और जनतन्त्र साथ-साथ नहीं चल सकते। बाबू जगजीवन राम के लिए जनतन्त्र की हिमायत करना जाति प्रथा को निमर्ूल करने की कोशिश का हिस्सा था।
बाबू जगजीवन राम अच्छी तरह जानते थे कि जाति प्रथा के वरीयता क्रम को बदलने मात्र से जाति दंश खत्म नहीं होने वाला। बलिक यह एक प्रकार के दंश की जगह दूसरे प्रकार के दंश को जन्म देना है। उनके लिए ब्राह्मणवाद के खात्मे का अर्थ केवल दलित मुकित नहीं थी। उनकी तत्वभेदी दृषिट देख पा रही थी कि ब्राह्मणवाद की चक्की में दलित के साथ ब्राह्मण भी पिस रहा है, क्षत्रिय भी पिस रहा है, वैश्य भी पिस रहा है। इसलिए ब्राह्मणवाद का खात्मा दलितों को मुक्त करने के साथ ही ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को भी मुक्त करने वाला है । जगजीवन राम की दलित दृषिट इस अर्थ में व्यापक और उदार थी कि वे सम्पूर्ण मनुष्यता की मुकित के बारे में सोचते थे। उनके लिए दलित मुकित का अर्थ जाति और वर्ण के बंधन में फँसी मनुष्यता की मुकित थी।
अपने सुदीर्घ सामाजिक जीवन में बाबू जगजीवन राम  ने महसूस किया था कि हमारे देश में सोच का अकाल पड़ गया है। आज की राजनीति में व्याप्त संकीर्णता और वैचारिक शून्यता को देखते हुए बाबूजी का यह कथन कहीं ज्यादा अर्थवान लग रहा है। ध्यान से देखें तो जगजीवन राम का जीवन सोच के अकाल के दौर में उदात्त सोच को फिर से रोपने के लिए एक अजस्र प्रेरणा स्रोत है।
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बाबू जगजीवन राम सच्चे अथो± लोकतांत्रिक चेतना के व्यकित थे। लोकतांत्रिक चेतना को भारतीय समाज में विकसित करने में जिन लोगों का योगदान है, उनमें बाबू जगजीवन राम का नाम अगली कतार में आता है। बाबू जगजीवन राम की स्पष्ट राय थी कि भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था और लोकतंत्र साथ-साथ नहीं रह सकते। इसीलिए वे ताजिन्दगी वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करते रहे।   
बाबू जगजीवन राम का आरमिभक जीवन स्वाधीनता संघर्ष में लगा रहा तो परवर्ती जीवन आधुनिक भारत के निर्माण की प्रक्रिया में। आजादी के बाद बने नये राजनीतिक ढ़ांचे के भीतर पुरानी सामाजिक संर्कीणताएं मौजूद थीं। बाबू जगजीवन राम की अन्तदर्ृषिट इस सच्चार्इ को भली प्रकार देख रही थी। राजनैतिक नारे और व्यकितगत आचरण का यह भेद बाबू जगजीवन राम को वैसे ही परेशान करता था, जैसे कथनी और करनी के बीच भेद संतो को परेशान करता था। बाबू जगजीवन राम आधुनिक राजनीतिक मनुष्य के इस दोहरेपन को इन शब्दों में व्यक्त करते हैं- 'हमारी इन आस्थाओं का हमारे दैनिक जीवन और आचरण से अधिक लगाव नहीं। हमारा मसितष्क जैसे अलग-अलग कोठों में बंटा है। एक ओर रूढि़गत संस्कार है, दूसरी ओर मानवतावादी विचार। एक ओर आदर्श, दूसरी ओर लूट खसोट की पाशविक वृत्ति। कहीं इनमें एक सूत्र नहीं, सम्बद्धता नहीं। व्यकित के रूप में भी हम टुकड़े-टुकड़े हैं, पूरे नहीं हैं। हमारे जनतांत्रिक विधान में जो कुछ प्रतिष्ठापित है, उसके लिए दृढ़ आधार, न हमारे दिलों में बन पाया है न दिमाग में। हमारा समाजवादी गणतंत्र और जातिवाद क्या साथ-साथ टिक सकते हैं? लेकिन हमारा विश्वास समाजवादी गणतंत्र में भी है और जातिवाद में भी। परिणाम यह होता है कि जाति पहले आती है, गणतंत्र पीछे खिसकता चलता है।
इसलिए बाबू जगजीवन राम भारतीय चिन्तन परम्परा की बहुत गहरी समीक्षा करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भारतीय समाज में आदर्श चाहें जितने बड़े और महान रहे हों व्यावहारिक धरातल पर उन आदशो± को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है। बाबू जगजीवन राम इसे भारतीय समाज की आन्तरिक निर्बलता मानते हैं- 'हमारे मनीषियों ने 'वसुधैव कुटुम्बकम की उदार कल्पना की थी और आत्मवत सर्व भूतेषु का महान आदर्श हमारे सामने रखा था। इस प्रकार उन मूल विचारों के क्षेत्र में, जिन्हें गणतन्त्र का तत्व कह सकते हैं, हम सदैव अग्रणी रहे हैं। व्यकित की पवित्रता और अद्वितीयता की मान्यता, जिसे फ्रांस और अमेरिकी क्रानितयों से बल मिला,  हमारी प्राचीन विचारधारा की अन्यतम विभूतियां हैं। लेकिन इन चमत्कारिक और महान सत्यों को अपने जीवन का अंग बनाने में हमने कभी सफलता नहीं प्राप्त की। हमारा सामाजिक गठन, व्यवस्थाएं, विधियां, रीतियां, इन विचारों, आदशो± और आस्थाओं से अनुप्राणित नहीं हुर्इ। ऊंचे विचार शरीरविहीन आत्मा की तरह जैसे शून्य आकाश में भटकते रहे। सम्भवत: हमारी लम्बी दासता के मूल में हमारी यही आन्तरिक निर्बलता रही है। बाबू जी, इस आन्तरिक निर्बलता से सतत संघर्ष करते रहे। समाजवाद और लोकतन्त्र के विकास के लिए बराबरी का भाव आवश्यक है। बाबू जगजीवन राम देख रहे थे कि- 'सामाजिक धरातल पर, बड़े और छोटे का भाव, जो समाजवाद तो क्या जनतंत्र का भी बैरी है, हर जगह दृषिटगोचर है। यह छोटे बड़े का भाव समाज में उपर से नीचे तक व्याप्त है। एक तरह से यह मानसिक व्याधि बन गया है। मजे की बात है कि हमारे सामाजिक व्यवहार क्रिया कलाप इसी व्याधि से निर्धारित और संचालित होते हैं। ''यह भाव हमारे âदय के उन अदृश्य तथा गूढ़ स्थलों में है, जहाँ से हमारे व्यवहारों का निर्माण होता है। यह भाव मज्जागत संस्कार का रूप ले चुका है। एक ब्राह्राण या राजपूत एक बनिये के दुकान में दरवानी (चौकीदारी) करता हुआ भी, âदय में यह अनुभव करता है कि वह ''मालिक से श्रेष्ठ है। एक ''चमार एक ''डोम को एक ''मुसहर को ''निम्नतर मानता है। एक ऐसी आश्चर्य जनक मानसिक दासता है जिसका उदाहरण संसार के किसी भी देश के इतिहास में नहीं मिलेगा। समता, भ्रातृत्व, मानव की पवित्रता, नागरिकता इत्यादि परिकल्पनाओं से इस भावना का मेल कहाँ है? जन्म के आधार पर, जाति के आधार पर सामाजिक सोपान बद्धता की जो व्यवस्था है, उसकी सम्भव है, कभी उपादेयता रही हो। लेकिन आज के संसार में इसकी, यह नि:संशय होकर कहा जा सकता है, कोर्इ उपयोगिता नहीं है। मानव के निरन्तर तिरस्कार को, कथन और कार्य के इस दहकते वैषम्य, को इतने बड़े असत्य और इतनी बड़ी प्रवंचना को, जो समाज अपने अन्तरतम का सत्य मान,उसे संजो कर रखता है, उसकी मुकित की संभावना क्या हो सकती है? ऐसी मानसिक दासता पाश में बँधे गुलाम, आजाद कैसे हो सकते है? यह दासता जिस तरह बड़ों को गिराती है, उसी तरह तथाकथित छोटों को भी।
जगजीवन राम इस भयावह सामाजिक सच्चार्इ का समाधान बुद्ध के चिन्तन और महात्मा गाँधी के प्रयोग में देखते हैं। क्योंकि बुद्ध और गाँधी  दोनो ने ही चिन्तन, वाणी, आचरण की पवित्रता और एकरूपता को बड़प्पन का आधार माना था। बाबू जगजीवन राम बहुत संजीदगी से यह सवाल करते हैं-'कितने हैं,  जो इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? आजादी के रूप में हुआ राजनीतिक परिवर्तन अपना वास्तविक जनतानित्रक रूप नही ग्रहण कर सकता जब तक कि सामाजिक परिवर्तन न हो। इसलिए बाबू जगजीवन राम सामाजिक क्रानित की अनिवार्यता महसूस कर रहे थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि 'जातिवाद और जनतंत्र साथ-साथ नहीं चल सकते।
वर्ण और जाति के विरुद्ध बाबू जगजीवन राम का संघर्ष असिमतावादी राजनीति के दायरे में नहीं बलिक राष्ट्रीय दायरे में था। असिमतावादी राजनीति जाति और वर्ण को बनाये और बचाये रख कर ही हो सकती है। उनके लिए जनतन्त्र एक मूल्य व्यवस्था है। इस मूल्य व्यवस्था की अनिवार्य शर्त गैर बराबरी की समापित है। जाति और वर्ण का ध्वंस जनतांत्रिक मूल्यों की रचना के लिए जरूरी है। यही सोच बाबू जगजीवन राम की विचार दृषिट को व्यापक मानवीय आयाम देती है। इसीलिए वे सोच पाते हैं कि  अस्पृश्यता से सिर्फ अस्पृश्यों को ही नुकसान हुआ हो, ऐसी बात नहीं है इससे हमारे समाज को नुकसान हुआ है। इसलिए मैं मानता हूँ कि अस्पृश्यों की समस्या, केवल उनकी ही समस्या नहीं है। यह एक राष्ट्रीय-समस्या है और जब तक हम उसको राष्ट्रीय समस्या मानकर राष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने का व्यापक प्रयत्न नहीं करेंगे, तब तक इसे सुलझाया नहीं जा सकेगा। अस्पृश्यता एक राष्ट्रीय समस्या है। अस्पृश्यों ने अपनी मुकित का संग्राम और मजबूत किया है और अकेले अपनी लड़ार्इ लड़ने की तैयारी की है।बाबू जगजीवन राम कहते हैं ''ऐसी सिथति में यह आवश्यक है कि उनको अकेले न छोड़ा जाए। इसमें पूरे समाज की भागीदारी जरूरी है क्योंकि यह मुकित की साधना है। ऐसी मुकित की साधना जिससे सारा भारतीय समाज मुक्त होगा, इस मुक्त भारतीय समाज में ही सच्चे लोकतंत्र की इमारत बन सकती है। बाबू जगजीवन राम ऐसे ही लोकतंत्र के कीमियागर थे।









संत रैदास के सपनों का समाज : बेगमपुर





रविदास संत कवि हैं। व्यापकता और प्रसार में उनकी होड़ सिर्फ कबीर से है। वाराणसी के आस पास के इस संत कवि का प्रभाव पंजाब और राजस्थान तक व्याप्त है। रविदास की बानी गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित है। जनश्रुति बताती है कि रविदास मीराबार्इ के गुरू थे। पंजाब और राजस्थान से होते हुए रविदास बानी का प्रभाव देश और अब विदेश में दिखार्इ  पड़ रहा है। बनारस का साहित्य समाज इस प्रभाव से अपरिचित नहीं तो तटस्थ जरूर है। रविदास कबीर के समकालीन हंै। उनके हुए छ: सौ से ज्यादा वर्ष बीत चुके हैं। छ: सौ वर्ष बाद भी इस संत कवि की बानी लाखों-करोड़ों लोगों को जीने का सम्बल प्रदान कर रही है। रविदास की बानी में विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ मेल है। वे अपने कवित विवेक के बारे में कोर्इ दावा नहीं करते। कवि होने का कोर्इ दावा नहीं करते। साधु होने का दावा भी नहीं है। उनके यहाँ यदि किसी बात का दावा दिखार्इ पड़ता है तो अपने पेशे का और जाति का। रविदास चमड़े का काम करते थे और जूता सिलते थे। यह कवि ओछी समझी जाने वाली जाति और पेशे का दावा डंके की चोट पर करता है और उसे आत्म गौरव से भर देता है।
तथाकथित छोटी जाति और छोटे पेशे के कारण ही इस कवि के महत्व को स्वीकार नहीं किया गया। कर्इ ऐसी किंवदनितयाँ गढ़ी गर्इ जिसमें कवि के अपने दावे के उलट उसे उच्च वर्ण का साबित करने की कोशिश की गर्इ। इसके पीछे तर्क यह था कि प्रतिभा और महत्ता तो जाति और वर्ण विशेष में ही संभव है- इसलिए इस कवि का संबंध उच्च वर्ण से होगा ही। भले ही यह संबंध पिछले जन्म में रहा हो। कबीर के बारे में यह गुंजाइश थी कि उन्हें विधवा ब्राह्मणी का पुत्र बता कर उच्च वर्ण से जोड़ा जा सके। रविदास के बारे में यह गुंजाइश नहीं थी। इसलिए उन्हें पिछले जन्म का ब्राहमण घोषित करने की कोशिशें हुइ±।
ऐसी कोशिशों के पीछे एक बात तो यह थी कि जाति, वर्ण, चमत्कार आदि की चर्चा करके उनके सामाजिक विमर्श को उपेक्षित कर दिया जाय। रविदास के महत्व का स्वीकार उनके अनुयायियों के भीतर है। धर्म और सम्प्रदाय के दायरे से बाहर उनकी बानी की चर्चा कम होती है। रविदास को संत के रूप में याद करते हुए भी उनके सामाजिक सन्देश की चर्चा करने से लोग कतराते हैं। कहीं यह कहा जाता है कि संतों की बानी के अध्यातिमक अर्थ हैं, उन्हें सामाजिक सन्देश के रूप में सीमित करने का प्रयत्न ठीक नहीं। इस तर्क से संत की महत्ता का स्वीकार भी हो गया और सामाजिक सन्देश पर राख डालने की मन्शा भी पूरी हो गर्इ । यही वजह है कि संत रविदास की कवितार्इ की चर्चा नहीं के बराबर होती है। रविदास की कवितार्इ पर विचार करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि अच्छी कविता और महान कविता के अपने-अपने तर्क होते हैं। अपने काव्यात्मक गुणों के नाते कोर्इ कविता अच्छी कविता हो सकती है लेकिन महान कविता वह तभी होगी जब उसका सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी बड़ा हो। भकितकाल कविता का स्वर्ण युग इसलिए हो सका कि वहाँ एक वृहत्तर सामाजिक सन्दर्भ मौजूद है। समाज की चालक-शकित धर्म था। इसलिए सारा अन्याय और शोषण धर्म के आवरण में हो रहा था। स्वाभाविक रूप से अन्याय और शोषण का प्रतिकार भी धर्म के आवरण में हुआ। इसीलिए भकित काल की कविता धार्मिक नहीं है वह अपने समय के सामाजिक संघर्ष की सांस्Ñतिक अभिव्यकित है।
संंत कवियों को पढ़ते हुए प्राय: हमारा यह विवेक कुन्द हो जाता है और हम उन्हें आध्यातिमक ऊँचाइयों, चमत्कार-कथाआें, करामातों आदि के दायरे में ही पढ़ते गुनते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा करने वाले केवल सवर्ण समूहों के लोग हों।जैसे कुछ दलित चिन्तक अम्बेडकर के समूचे सामाजिक विमर्श को संविधान निर्माण तक ही सीमित करते पाये जाते हैं, वैसे ही कुछ लोग रविदास के सामाजिक अभिप्रायों के बजाय चमत्कार कथाओं में ही उलझ कर रह जाते हैं। जबकि रविदास बानी का मर्म उसके सामाजिक अभिप्रयों के साथ समझने की जरूरत है।
संत रविदास की बानी बेगमपुर के रूप में एक वैकलिपक समाज की प्रस्तावना करती है। कबिरा खड़ा बजार में लिए लुआठा हाथ जो घर जारै आपना चले हमारे साथ पढ़ते हुए अक्सर यह बात मन में उठती है कि कबीर अपने साथ कहाँ ले जाना चाहते हैं। इसका उत्तर रैदास देते हैं। वे अपने पद में बेगमपुर का प्रस्ताव करते हैं। वे कहते हैं- 'मेरा शहर बेगमपुर यहाँ न दुख है न दुख की चिन्ता न माल है न लगान देने की फिक्रन खौफ न खता न गिरने का डर मुझे मिल गया है ऐसा खूबसूरत वतन जहाँ खैरियत ही खैरियत है मजबूत और मुकम्मल है यहाँ की बादशाहत यहाँ न कोर्इ दोयम है न तेयम सब अव्वल हैं यहाँआबोदाना के लिए मशहूर यह शहर दौलतमन्दों से अटा पड़ा हैजिसे जहाँ भावे वहाँ जाये कहीं कोर्इ रोक टोक नहीं है सभी बन्धनों से मुक्त रविदास चमार कहता है इस शहर में रहने वाला ही मेरा मित्र है।
यह बेगमपुर क्या है। क्या इसमें रविदास केवल भाव दशा की चर्चा करते हैं। क्या यह केवल कुण्डलिनी के सहस्रार तक पहुँच जाने की सिथति है ? पूरे पद में लगान अदा करने की चिन्ता से मुकित का आश्वासन है, भय से मुकित का भाव है। आबोदाना और हर तरह के खैरियत की आसूदगी है। कहीं कोर्इ रोक-टोक नहीं है, किसी तरह की भेद बुद्धि और बन्धन नहीं है। यह सिर्फ आध्यातिमक अनुभव नही है। यहाँ जिन दुखों और बन्धनों से मुकित की बात की गर्इ है वे नितान्त इहलौकिक या कि सामाजिक हैं। सामाजिक और आर्थिक विषमता समाज में भेद बुद्धि पैदा करती है और यह भेद बुद्धि विधि निषेध रचती हैं। बेगमपुर इन सबसे मुक्त है। बेगमपुर कवि का स्वप्न है। निष्ठुर, अविवेकी अन्याय पूर्ण सामाजिक यथार्थ के बरक्स कवि एक न्याय संगत, मानवीय और उदात्त समाज का सपना प्रस्तावित कर रहा है। पिछली शताबिदयों में आधुनिक दुनिया ने जिस तरह के वर्ग विहीन समाज का सपना देखा यह वैसा ही सपना है। भविष्य की मानवता यदि समतामूलक समाज की स्थापना कर पायी तो वह रविदास के बेगमपुर जैसा होगा। रविदास की यह कल्पना अमूर्त और अवास्तविक है एक तरह की यूटोपिया। यह ध्यान रहे कि धार्मिक सामाजिक भेदभाव के आधार भी अमूर्त और अवास्तविक हैं। इसके बावजूद वे ठोस सच्चार्इ की तरह हमें बंधनों में जकड़े हुए हैं। रविदास की यह कल्पना मिथ्या चेतना द्वारा रचित बन्धनों की जकड़न से मुक्त करने का विधान रचती है।
तुलसीदास का रामराज्य भी एक तरह की कल्पना ही है पर इसकी व्याख्या और चर्चा जोर शोर से होती है। कुछ लोग राम राज्य कायम करने के लिए यत्नशील भी हैं तो कुछ लोग राजनैतिक नारे के रूप में उपयोग करते हैं। लेकिन बेगमपुर की चर्चा कहीं नहीं होती। रविदास के बेगमपुर और तुलसी के रामराज्य को आमने -सामने  रख कर विचार करने पर इसका कारण समझ में आ जायेगा। रविदास और तुलसीदास के समय में लगभग सौ साल का फर्क है। बहुत संभव है बेगमपुर की धारणा तुलसीदास तक पहुँची हो और उन्हें लगा हो कि बेगमपुर में कुछ ज्यादा ही छूट दे दी गर्इ है। इसलिए इसे दुरुस्त किया जाय। तुलसीदास का संशोधन साफ समझ में आता है। बेगमपुर में सब अव्वल है जबकि रामराज्य में वर्णाश्रम निज निज धरम का पालन हो रहा है। यानी सामाजिक विभेद मौजूद हैं। तुलसी के राम का अवतार ही गो और ब्राह्मण की रक्षा के लिए हुआ था। यह रक्षा वर्णाश्रम धर्म को कायम करके ही की जा सकती थी। इसलिए तुलसीदास के राम कुछ लोगों के प्राइवेट-लिमिटेड बन जाते हैं। रविदास राम की इस इजारेदारी पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि वह (राम) किसी के बाप का नहीं है। उसे प्रेम से कोर्इ पा सकता है। जो लोग राम को प्रेम से पाना चाहते हंै उनका रविदास के बेगमपुर में स्वागत है। इसीलिए रविदास के साथ कबीर भी कह उठते हैं- अवधू बेगम देस हमारा।

रैदास जयंती : यानी श्रम की प्रतिष्ठा का उत्सव





माघी पूर्णिमा के दिन रैदास की जयंती देश विदेश में धूम धाम से मनाई जाती है . रैदास की जन्म और कर्मभूमि बनारस में इन दिनों देश और दुनिया से रैदास के अनुयायी उमड़ पड़ते हैं .सर गोबर्धन और उसके आसपास की जगह एक नया नगर ही बस जाता है .राजघाट के निकट गंगा किनारे बने रैदास मंदिर से लेकर रैदास पार्क होते हुए पुरे बनारस में रैदास के भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है . धर्म की नगरी बनारस में  धार्मिक मेले तो रोज ही लगते हैं .भारी भीड़ आती और जाती रहती है ,पर जैसी वैष्णवता रैदास भक्तों में दिखाई देती है वह अन्यत्र दुर्लभ है . धर्म के कर्म कंडों से जुडी भीड़ जब बनारस या किसी दुसरे शहर पर धावा बोलती है तो वहां का जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है . इसलिए मुझे लगता है सभी तीर्थ यात्रियों को रैदास भक्तों से सीख लेनी चाहिए . जैसा अनुशासन और जैसी सुव्यवस्था इन भक्तों में दिखाई पड़ती है वह बेमिसाल है .विचार करने पर मुझे इसकी वजहें रैदास के जीवन और सन्देश में ही दिखाई देती है .
रैदास का जीवन और काव्य इस तरह घुला मिला है जैसे चन्दन और पानी मिल जाता है। रैदास अपनी भक्ति और कर्म साधना से अपने र्इश्वर को प्रत्यक्ष करने वाले संत थे। प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी गाने वाले रैदास का व्यकित्व भले ही कबीर की तुलना में विनम्र और साधु लगता हो- वैचारिक दृढ़ता में सिर्फ रैदास ही हैं जो कबीर से होड़ लेते हैं।
रैदास अपनी साधना में मन के चंगा होने की बात करते हैं। यदि मन पवित्र है तो सामने की कठवत का पानी ही गंगा की तरह पवित्र है। मन की शुद्धता, वाणी की शुद्धता और कर्म की शुद्धता रैदास की वाणी का मर्म है। रैदास जिस समय और समाज में हुए थे उसमें मनुष्य के श्रम को अवमानित किया जाता था।जो जितना ही  उपयोगी श्रम करता है वह सामजिक ढांचे में उतना ही हिन् माना जाता है . ६५ -७० बरस क्ले लोकतंत्र ने भी इस धरना में कोई खास रद्दोबदल नहीं किया है .रैदास ने अपनी मानसिक और वैचारिक दृढ़ता से श्रम को प्रतिष्ठा दी । उनके लिए कर्ममय जीवन ही पूजा है- जहँ जहँ डोलउ सोर्इ     परिक्ररमा जो कुछ करौं सो पूजा।  सहज जीवन क्रम में हम जहाँ कहीं भी जाते हैं वही परिक्रमा है, जो कुछ करते हैं वह पूजा की तरह पवित्र है। जिस श्रम को समाज ने हेय बना रखा था रैदास ने उसे प्रतिष्ठित करके श्रमशील जनता को गरिमा और सम्मान दिया .
रैदास श्रम करि खाइहि जौलों पार बसाय।
नेक कमार्इ जउ करइ कबहुं न निहफल जाय ।।वे अपने भक्तों को श्रम करके अपना पालन पोषण करने का सन्देश देते हैं .  खास बात यह है कि आम तौर पर हमारे समाज में अकर्मण्य साधुता का प्रचलन रहा है .इसके बरक्स रैदास श्रमशील साधुता का आह्वान करते हैं .और कहते हैं की इश्वर किसी के बाप का नहीं है वह हर उस उस व्यक्ति का है जो अपने कर्ममाय जीवन के भीतर उसे (ईश्वर को ) मन प्राण से चाहता है . उनका  साहित्य वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम को चुनौती देता है . वर्ण व्यवस्था  सामाजिक श्रम के अपहरण का ही एक रूप है .इसलिए श्रम की सामजिक प्रतिष्ठा का जो सन्देश रैदास की कविता और जीवन से   मिलता है वह आज भी हमारे समाज की परम कामना है.

खेद की बात है कि  हमारी अविकसित सामजिक चेतना मानवीय श्रम और श्रमशील जनता को गरिमा और सम्मान देने को तैयार नहीं है। इसीलिए  संत रैदास का जीवन और साहित्य आज की मनुष्यता के विकास के लिए मार्ग दर्शक है  .  रैदास की जयंती श्रमजीवी साधुता की प्रतिष्ठा का उत्सव है . आइए हम भी इस उत्सव में शामिल हों .

सोमवार, 10 मार्च 2014

नालंदा के लोग क्यों डरते हैं ?




किस्सा है
नालंदा के एक शख्स का
बड़े काबिल थे
इल्मी थे
शायर थे
दाना थे

नालंदा में प्रोफ़ेसर थे


दूर दूर तक उनकी दानाई के किस्से
मशहूर थे
लोग आते थे
लोग जाते थे
अखबारों में चर्चे थे

नादान दोस्तों से घिरा एक परदेशी
किसी दाना की तलाश में
नालंदा आ पंहुचा

किसी बच्चे से पूछा -
यहाँ कोई दाना रहता है

बच्चे ने उनके घर की ओर इशारा करते हुए कहा
वहां ,वहां

परदेशी फट पंहुच गया दाना के घर
और बोला
मैं नादान दोस्तों से घिरा हूँ
मुझे एक ऐसे शख्स की तलाश है जो
दाना हो
दोस्त हो या दुश्मन
बड़ी उम्मीद से आया हूँ
आपके पास
बच्चा बच्चा जानता है कि आप दाना है

वे खुश हुए
यह जानकार कि
बच्चा बच्चा जानता है वे दाना है
अपनी दानाई पर रीझते चले गए वे

इस कदर रीझे कि
खुद को
दाना और सिर्फ दाना के रूप में जानने लगे

यहीं एक गड़बड़ हुयी
दाना का एक पुराना अर्थ
चुपचाप चिपक गया
दाना से

वे सोचने लगे
चिड़िया तो दाना का बस एक ही अर्थ जानती है
अगर उसने मुझे दाना समझा और
चुग गयी तो

मेरा तो सब गड़बड़ हो जाएगा
सारा इल्म
सारा ज्ञान सारी दानाई धरी रह जायेगी
उन्हें चिड़िया की भाषा आती थी पर चिड़िया को उनकी भाषा नहीं आती थी

वे चिड़िया से डरने लगे
घर बाहर निकलना हुआ बंद
ले जाये गए पागलखाने
इलाज हुआ
ठीक हुए

छुट्टी होने को थी
खुश थे डॉक्टर ने पूछा
अब कैसा लगता है
बोले ठीक लगता है
लगता है की मैं मुकम्मल आदमी हूँ
किसी अनाज का दाना नहीं हूँ

डॉक्टर खुश था अपनी सफलता पर

कि वे पूछ बैठे
डॉक्टर साहेब एक मुश्किल है

क्या ?
यह तो ठीक है कि मैं आदमी हू
किसी अनाज का दाना नहीं हूँ

लेकिन यह बात चिड़िया को कैसे पता चलेगी
और वे फिर डर गए .

शताब्दियाँ बीत गयीं
तब से
नालंदा के लोगों में
डर का जींस समाया हुआ है
इसीलिए डरते हैं नालंदा के लोग