शुक्रवार, 23 अगस्त 2013
दूर दृषिट सम्पन्न ऋषि नेता बाबू जगजीवन राम
बाबू जगजीवन राम को 1977 के आम चुनावों में सुनने का अवसर मिला था। तत्कालीन राजनीतिक मसलों के अलावा जो बात ध्यान में रह गयी वह है उनकी भाषा। छोटे, सरल सुस्पष्ट वाक्य। सीधे और साफ ढंग से बिना लाग लपेट के अपनी बातें कह देने और सुनने वाले के तह तक उतर जाने की कला। मेरे किशोर मन में जगजीवन राम की ऐसी छवि बनी जिसने आगे चल कर जाति और वर्ग को योग्यता से जोड़कर देखने वाले पूर्वाग्रहों से मुक्त होने में काफी मदद की।
काफी अन्तराल के बाद सन 2007 में बाबू जी के जीवन और चिन्तन से परिचित होने का अवसर मिला। काशी हिन्दू विश्वविधालय में बाबू जगजीवन राम पीठ कायम हुर्इ। उसका उदघाटन करने तत्कालीन सामाजिक न्याय और सहकारिता मन्त्री श्रीमती मीरा कुमार को आना था। इस कार्यक्रम की आयोजन समिति से मैं भी जुड़ा हुआ था। यह तय हुआ कि 'बाबू जगजीवन राम पीठ की स्थापना के पीछे जो विचार हैं, उन्हें एक ब्रोशर के रूप में प्रकाशित करके वितरित किया जाय। ब्रोशर तैयार करने के क्रम में बाबू जगजीवन राम के व्यकितत्व और विचारों का अध्ययन-अनुशीलन किया।
बाबू जी का जीवन कर्इ कारणों से विलक्षण है। वे अकेले ऐसे दलित नेता हैं जो राष्ट्रीय आन्दोंलन की मुख्यधारा में रहे है। आजादी के पहले स्वाधीनता आन्दोलन में तथा राष्ट्रीय सरकारों मेंं उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाइ±। आजादी के बाद बनी सरकारों में शामिल होकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में योगदान किया। राष्ट्रीयआन्दोलन के नेताओं का मानना था कि आजादी हासिल करना मुख्य लक्ष्य है। आजादी के बाद दलित मुकित के प्रश्न को हल कर लिया जायेगा, जबकि दलित नेतृत्व इसे लेकर सशंकित था। इसलिए दलित नेतृत्व ने दलित मुकित के सवाल को तरजीह दी। गांधी और अम्बेडकर के बीच की बहस मुख्य रूप से यही थी । बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्य धारा में रहते हुए दलित मुकित के लिए काम करने का रास्ता चुना। यह बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण था। राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व पर सवर्ण जातियों का प्रभुत्व था। गांधी के अनुनायी होते हुए भी राष्ट्रीय आन्दोलन के नेतृत्व वर्ग में सभी गांधी नहीं थे। इसलिए अपनी दलित पृष्ठभूमि के नाते बाबू जगजीवन राम को राष्ट्रीय आन्दोलन के नेताओं के साथ काम करते हुए जातीय भेदभाव और विद्वेष का दंश झेलना पड़ा। दूसरी तरफ उन्हें दलित नेतृत्व के व्यंग्य बाण भी सहने पड़े। भीतर और बाहर दोनों तरफ से मिलने वाले व्यंग्य और विद्वेष से विचलित हुए बगैर बाबूजी ने राष्ट्रनिर्माण के वृहत्तर सरोकारों और दलित मुकित के विशेष सरोकारों को दृढ़ता पूर्वक अंजाम दिया।
बाबू जी के जीवन से परिचित होने पर उनके व्यकितत्व की सबसे बड़ी खासियत नजर आती है- वह है विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ संयोग। इस विनम्रता और दृढ़ता का सम्बन्ध संत रविदास की बानी से है :
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी
जाकी अंग अंग बास समानी ।।
अपने प्रभु के साथ रच बस कर संत रविदास एकमेक हो गये थे। इस एकमेक भाव ने उन्हें सहज आत्मविश्वास से भर दिया था जिसके बल पर वे सामाजिक दंश से उपर उठ कर बेगमपुरा शहर के नागरिक बन सके थे। तुलसीदास के रामराज्य की कल्पना की चर्चा करते लोग अघाते नहीं है; पर मेरी राय में रविदास का बेगमपुरा रामराज्य से बेहतर और उन्नत संकल्पना है । (इस पर फिर कभी) संत रविदास का 'बेगमपुरा ऐसा शहर है, एक ऐसा वतन, जिसमें सभी के लिए खैरियत है। बाबू जगजीवन राम भी इसी बेगमपुरा के नागरिक थे। संत रविदास कहते हैं - 'जो हम सहरी सो मीतु हमारा। बेगमपुरा एक संकल्पना है। ऐसी संकल्पना जो मन को भेद बुद्धि से मुक्त करके समतामूलक समाज की संरचना करती है। बाबू जगजीवन राम इन्हीं अथो± में संत रविदास के 'हम सहरी और 'मीत थे।
मुझे याद है, शुरुआती दौर में बहुत से रेडिकल दलित चिन्तकों को संत रविदास की बानी नहीं पसन्द आती थी। उनकी शिकायत थी कि रविदास 'प्रभुजी। तुम चन्दन हम पानी और प्रभुजी! तुम स्वामी हम दासा कहते हैं। उन्हें लगता था इतना विनम्र आदमी दलित आन्दोलन का प्रतीक कैसे हो सकता है। रविदास की विनम्रता दिखार्इ देती थी दृढ़ता नहीं। वर्ण व्यवस्था ने श्रम को हेय करार दे रखा था। रविदास ने श्रम की संस्Ñति को दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठापित किया। जैसे-जैसे दलित आन्दोलन आगे बढ़ा वैसे-वैसे रविदास के बारे में यह समझ विकसित होती गयी।
संत रविदास की यह विनम्रता और दृढ़ता ही है जो बाबू जगजीवन राम को एक ही साथ राष्ट्रीय आन्दोलन के प्रति सहज और दलित सरोकारों के प्रति सजग बनाये रखती है।बाबू जगजीवन राम ने राष्ट्रीय आन्दोलन की मुख्यधारा में रहते हुए, सरकारों में शामिल होकर दलितोत्थान के लिए जो कार्य किये हैं उनका मूल्यांकन होना बाकी है। इसके लिए हमें दलित आन्दोलन के आगामी चरण का इन्तजार करना होगा।
बाबू जी ने अपने एक व्याख्यान में कहा है- 'शरीर को ही गुलाम नहीं, किस तरह हमारे मसितष्क को गुलाम बना दिया गया है कि जो हमारे उपर अत्याचार करता है उसको हम अपने से बड़ा मान लेते हैं। सबसे बड़ा हमारे मसितष्क का ह्रास इसमें किया गया कि हमने अपने आप को छोटा समझ लिया। जो व्यकित खुद अपने आप को छोटा समझता रहेगा, वह कभी बड़ा नहीं बन सकता रविदास प्रसिद्ध और मान्य संत होने के बाद भी बार-बार 'कह रैदास खलास चमारा कहते हैं और जूता सीने का काम करते हुए इसी मानसिक गुलामी को तोड़ते हैं।
बाबू जगजीवन राम भी संत रविदास की भाँति स्वयं को हीन और अत्याचारी को श्रेष्ठ समझने वाली मानसिक गुलामी को तोड़ने का काम करते हैं। वे बार-बार सवाल करते हैं- 'मानव के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत करने का जतन क्या भारतीय समाज में सम्भव है। उनका ध्येय ऐसे समाज की रचना है जिसमें मनुष्य के र्इश्वरत्व को प्रतिषिठत किया जा सके। इसीलिए वे कहते हैं- 'भारतीय समाज ने हमको छोटा बनाकर रख दिया है, मैं किसी को छोटा नहीं बनाना चाहता। यह बहुत गहरे आत्मविश्वास से उपजा हुआ कथन है । हमें छोटा बनाया गया, पर हम किसी को छोटा नहीं बनाना चाहते, हमें घृणित समझा गया पर हम किसी को घृणित नहीं समझते, हमें उत्पीडि़त किया गया पर हम किसी को उत्पीडि़त नहीं करना चाहते, हमारा शोषण किया गया, पर हम किसी का शोषण नहीं करना चाहते। ऐसी अनेक बातें हैं जो इस आत्मविश्वास से निकलती हैं। बाबू जगजीवन राम की समझ है कि शोषण के क्रम को उलट कर शोषण मुक्त और समतामूलक समाज की रचना संभव नहीं है। शोषण और विषमता पर टिके समाज में कोर्इ भी मुक्त नहीं है इसीलिए बाबू जी कहते हैं- 'यदि मैं ब्राहमणवाद को मिटाने का जतन कर रहा हूँ, तो मैं ब्राहमण को भी मुक्त करना चाहता हूँ, ठाकुर को भी मुक्त करना चाहता हूँ सिर्फ दलितों को नहीं। रेडिकल से रेडिकल दलित चिन्तन को एक न एक दिन बाबू जी की इस बात का मर्म समझना होगा कि दलित मुकित अकेले संभव नहीं है। वह तभी संभव है जब ब्राहमणवाद के जाल से स्वयंं ब्राहमण की मुकित हो, क्षत्रिय की मुकित हो, सभी वणो± की मुकित हो, पूरे समाज की मुकित हो। बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर इस बात को ठीक से समझते थे हम शायद इसीलिए उन्होंने बाबू जगजीवन राम को 'दूरदृषिट सम्पन्न ऋषि नेता करार दिया था।
क्या भ्रष्टाचार का वर्ग चरित्र होता है ?
पिछले दिनों प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नन्दी के एक बयान पर काफी हल्ला हंगामा हुआ। उनकी बात राजनीतिक रूप से गलत थी इसलिए उन्हें माफी भी माँगनी पड़ी। लेकिन इस पूरे वाकये ने यह विचार करने के लिए उकसाया कि क्या भ्रष्टाचार का कोर्इ वर्ग चरित्र होता है। समाज वगो± में बँटा हुआ है। क्लासिकल माक्र्सवादी नजरिये से देखें तो शोषक वर्ग और शोषित वर्ग है। आर्थिक नजरिये से देखें तो उच्चवर्ग, मध्यवर्ग और निम्न वर्ग है। सामाजिक नजरिये से देखने पर वर्ग के निर्माण में वर्ण, जाति और धर्म के मामले भी शामिल हो जाते हैं। तब उच्च वर्ग, निम्न वर्ग के साथ अल्पसंख्यक, दलित, वंचित, उपेक्षित आदि अनेक वर्ग दिखार्इ देते हैं। इन सभी सामाजिक समूहों में पर्याप्त राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है। राजनीति सजग होने की वजह से ये सभी समूह राजनीतिक वर्ग हैं। राजनीतिक सजगता इन सभी वगो± को सामाजिक रूप से सहभागी बनाती है और देशसेवा के लिए प्रेरित करती है। यह सहभागिता सभी तरह के समूहों को देश सेवा का अवसर देती है। देश सेवा के भीतर से ही स्वयंसेवा का वह रास्ता निकलता है जो भ्रष्टाचार के राजमार्ग पर ले जाता है। देश सेवा का सबसे सुगम तरीका सत्ता है। राजनीति सत्ता प्रापित का प्रमुख रास्ता है ही नौकरशाही भी खास तरह की सत्ता देती है। सत्ता में सभी वगो± की भागीदारी हो रही है। कहते हैं कि सत्ता भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्रष्ट बनाती है। इसलिए भ्रष्टाचार किसी खास वर्ग जाति या समूह की बपौती नहीं रह गयी है। लोकतानित्रक समाज में भ्रष्टाचार का भी लोकतन्त्रीकरण हुआ है। जैसे हर आदमी के वोट की कीमत बराबर है चाहे वह जिस पृष्ठभूमि से आया हो, हर आदमी के मौलिक अधिकार बराबर हैं उसी तरह हर आदमी को भ्रष्ट होने का हक भी हासिल है। भ्रष्ट होना भी जन्म सिद्ध अधिकार है बात अवसर मिलने की है। हमारे समाज में भ्रष्टाचार जीवन पद्धति की तरह हो गया है। भ्रष्ट होकर ही व्यावहारिक और नीति निपुण हुआ जा सकता है। जब किसी कर्तव्यनिष्ठ, र्इमानदार और मूल्यों और आदशो± वाले युवा अधिकारी को व्यावहारिक बनने की सलाह दी जाती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह भ्रष्टाचार के युग धर्म में शामिल हो जाय। पिछले कुछ सालों से देश भ्रष्टाचार को लेकर उद्वेलित है। यह उद्वेलन समय-समय पर छोटे बड़े आन्दोलनों के माध्यम से प्रकट होता रहा है। मजे की बात यह है कि भ्रष्टाचार ब्रह्म की तरह सर्वव्यापी है और विरोधी आन्दोलनों में भी अपने लिए जगह निकाल ही लेता है। अभी हाल में अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोध के चैमिपयन बन कर उभरे थे। अन्ना हजारे के आयोजनों में भ्रष्ट तरीके से अनाप-शनाप धन बटोरने वाले लोगों की सक्रियताएँ सन्देह पैदा करने वाली थीं। इसी बीच अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के गुब्बारे में पिन चुभो दिया। अरविन्द केजरीवाल इस मामले में तो बिल्कुल सही हैं कि राजनीतिक परिवर्तन राजनीति के माध्यम से ही हो सकता है। लेकिन वे जिस तरह के परिवर्तन का सपना दिखा रहे हैं वह एक और राजनीतिक दल बना लेने मात्र से संभव नहीं होने वाला है। अरविन्द केजरीवाल यह भी जानते हैं। इसलिए अरविन्द केजरीवाल का कोर्इ छुपा उíेश्य भले पूरा होता दिखार्इ दे- वे कोर्इ बड़ा परिवर्तन नहीं करने जा रहे हैं। अलबत्ता वे स्वयं एक तरह का नैतिक भ्रष्टाचार कर रहे हैं। आम तौर पर आर्थिक भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचार माना जाता है। वैचारिक भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार माना ही नहीं जाता है। जबकि भ्रष्टाचार पहले विचारों में घटित होता है फिर आकांक्षाओं में उतरता है और फिर नैतिक रूप से भ्रष्ट बना देता है। आर्थिक भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा खतरनाक नैतिक भ्रष्टाचार है। नैतिक भ्रष्टाचार माने विचार और व्यवहार के बीच का फासला। पहले हम नैतिक और वैचारिक रूप से ही भ्रष्ट होते हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार उसी की अभिव्यकित या लक्षण मात्र है। विचारणीय मुíा यह भी है कि भ्रष्टाचार की जड़ कहाँ है- औपनिवेशिक सत्ता द्वारा बनायी गयी नौकरशाही में या कि उसे हाकने वाली राजनीतिक सत्ता में। सवाल यह भी होता है कि भ्रष्टाचार नीचे से उपर की ओर गया है या कि उपर से नीचे की ओर आया है। इस सवाल का ठीक-ठीक उत्तर भले ही न मिले लेकिन यह तो तय है कि यह उपर से नीचे तक मौजूद है। आजादी के बाद लम्बे समय तक देश की राजनीति पर कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व रहा है। इसलिए यह माना गया कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो कांग्रेस से ही शुरू होती है। इसलिए विपक्ष के राजनीतिक समूह भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए तोप का मुँह कांग्रेस की ओर करते रहे हैं। धीरे-धीरे कांग्रेस की एकछत्र सत्ता कमजोर हुर्इ और दूसरे राजनीतिक दलों की सत्ता में भागीदारी शुरू हुर्इ। तब पता चला कि कल तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले खुद भ्रष्टाचार के दल-दल में धंस गये हैं। इसलिए धीरे-धीरे भ्रष्टाचार का विरोध राजनीतिक दलों के एजेन्डे से बाहर होता गया। राजनीतिक दलों में एक तरह की आम सहमति सी बन गयी है। वे भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करते बलिक चुपचाप अपनी बारी का इन्तजार करते हैं। हमारी महान जनता चुनाव जिता कर न केवल हमारे सब पाप धो देती है बलिक अगले पाँच साल भ्रष्टाचार करने की खुली छूट भी दे देती है। सभी राजनीतिक दलों के अपने-अपने सामाजिक आधार हैं। अपने सामाजिक आधार के वृहत्तर हित में भ्रष्टाचार करना धर्म है। इसलिए जिसे हम भ्रष्टाचार समझते है वह वास्तव में राजनीतिक दलों का अपने सामाजिक आधारों के वृहत्तर हित में किया जाने वाला धर्म पालन मात्र है। कर्इ बार हम आश्चर्य चकित होते हैं कि कैसे कोर्इ इस कदर भ्रष्ट व्यवहार कर सकता है और भ्रष्टाचार के उजागर होने पर भी बिना लजिजत हुए जी सकता है। लेकिन वे हमेशा सही होते हैं। उनके पीछे एक बड़ा समूह होता है जो जय जयकार करता रहता है। मामला भ्रष्टाचार का नहीं भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी का है। हमारे वर्ग, समाज या समूह का आदमी भ्रष्टाचार नहीं कर रहा है, वह तो सिर्फ हिस्सा बँटा रहा है। अगर समाजवाद है तो फिर भ्रष्टाचार में समाजवाद क्यों नहीं । यही बात नौकरशाही पर भी लागू होती है। राजनीतिक दलों की तरह नौकरशाही भी किन्हीं सामाजिक आधारों से आती है। बहुधा- नौकरशाही का हिस्सा बनने के मूल में ही भ्रष्ट तन्त्र में शामिल होने की आकांक्षा होती है। इसलिए वहाँ पहुँच कर रच बस जाने में बहुत समय नहीं लगता। नौकरशाही में जो सामाजिक वर्ग पहले से ही काबिज हैं वे तो इस कला में दक्ष हैं। इधर नौकरशाही के सामाजिक आधार का विस्तार हुआ है। जाहिर है नये रंगरूट लूट की कला में उस तरह दक्ष नहीं हैं, इसीलिए नौसिखिये साइकिल चालक की तरह डममग करते हुए चलते हैं और दिख जाते हैं। आकांक्षा सब की एक होती है। ट्रेनिंग भी एक जैसी होती है। मामला बस दक्षता हासिल करने का है। इसलिए किसी एक वर्ग या समूह को भ्रष्ट कहना या बताना उतना ही गलत है जितना किसी दूसरे वर्ग या सामाजिक समूह को पूरी तरह पाक साफ बताना।
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