रविवार, 7 सितंबर 2014

शिक्षक सम्मान के लिए एक दिन/ सदानन्द शाही



बहुदेवोपासना वाले देश में देवताओं का दिवस मनाने का संस्कार हमें घुट्टी में मिला है। प्रमुख देवी-देवताओं के अलावा छोटे-छोटे देवताओं के भी दिन बहुरते हैं। उन्हें पूजा जाता है फिर अगले वर्ष के लिए सहेज कर रख दिया जाता हैं।
तमाम दिवसों की तरह साल में एक दिन शिक्षकों के नाम भी है। 5 सितम्बर को प्रसिद्ध दार्शनिक राधाकृष्णन का जन्मदिन है। अध्यापक, दार्शनिक और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डाॅ0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने। शिक्षक देश का प्रथम नागरिक बन जाय, शिक्षकों के लिए  उससे ज्यादा गौरव की बात क्या हो सकती है। इसीलिए राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
शिक्षक भावी पीढि़यों का निर्माण करता है, इसीलिए समाज में उसको विशेष सम्मान हासिल हैै। वैसे भी हम गुरुमहिमा के कायल हैं। शिक्षक और गुरु में काफी समानताएँ हैं, इसीलिए परम्परा से शिक्षक को गुरु जैसा सम्मान प्राप्त है। शिक्षक दिवस इस सम्मान भाव को संस्थागत रूप देता है। आखिर भावी पीढि़यों को शिक्षित करने वाले समुदाय के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की कुछ भूमिका बनती ही है । इसीलिए आज के दिन विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। विद्यालय, विश्वविद्यालय अवकाश प्राप्त शिक्षकों को सम्मानित करते हैं।विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से लेकर राज्य और केन्द्र सरकार भी शिक्षकों पर मेहरबान होती है। विशिष्ट सेवा के लिए उन्हें कई तरह के इनाम इकराम दिये जाते हैं। इधर बाजार ने भी इस अवसर के लिए कुछ खास उत्पाद तैयार किये हैं जिन्हें छात्र अपने शिक्षकों को भेंट करते हैं और गुरुऋण से मुक्त होने का एहसास करते हैं। फोन, एसएमएस और तमाम इलेक्ट्रानिक माध्यम भी शिक्षक को सम्मानित करने के आसान उपाय मुहैय्या कराते हैं। इस तरह शिक्षक समुदाय को सम्मानित करने के लिए शिक्षक दिवस आता है।
एक स्वस्थ और विकसित लोकतान्त्रिक समाज में शिक्षक की भूमिका बुद्धिधर्मी  ;प्दजमससमबजनंसद्ध की होती है। इस रूप में उसे सच कहना   और सच को बरतना चाहिए  । दुर्भाग्य से हमारा लोकतन्त्र इतना विकसित नहीं हुआ है कि वह सच सुन सके। यदि ऐसा होता तो ऐसी संस्थाएँ विकसित होतीं जहाँ सच के लिए अवकाश होता। लेकिन ऐसी संस्थाएं विकसित नहीं हुई है जहाँ सच के लिए गुन्जाइश हो। कम से कम शिक्षण-संस्थाओं में हम  सच के लिए गुन्जाइश बना सकते थे। लेकिन ऐसा होने के अपने खतरे हैं। यदि शिक्षण संस्थाओं में ऐसा माहौल होगा तो ऐसे छात्र भी निकलेंगे जो समाज में जाकर सच  को बरतने और स्थापित करने के लिए कटिबद्ध होंगे ।
अगर शिक्षक ऐसे बुद्धिधर्मी की भूमिका निभाये और अपने छात्रों को बुद्धिधर्मी बनाने लगे तभी हमारा लोकतन्त्र सच्चे अर्थों में विकसित होगा।  लेकिन मौजूदा हालात मेँ यह एक असुविधाजनक  प्रस्ताव है।  जिस तरह का हमारा  समाज हैं वैसे ही हमारे संस्थान भी होंगे ।  वैसे ही शिक्षक  और वैसे ही छात्र होंगे । क्योकि यह हमारे समाज की जरूरत है ।  अपने आप में सीमित रहने वाले शिक्षक  और छात्र ही मौजूदा दौर के लिए मुफीद पाये जाते हैं । वैचारिक स्वतन्त्रता तो बहुत आगे की बात है एहमें विचारविहीन शिक्षकों की दरकार है । ऐसी विचारहीनता जो शिक्षकों को धीरे-धीरे एक निरीह प्राणी में बदल दे ।
सच्चा निरीह वह होता है जो और कुछ करे या न करे किसी का नुकसान न कर सके। ध्यान से देखें तो शिक्षक इसी कसौटी पर खरा उतरने लगा है। कभी कभी ऐसा लगता है कि   शिक्षकों  का सम्मान उसकी निरीहता के लिए ही  करते हैं । बाज दफे यह देखने में आता है कि सम्मानित होकर निरीह प्राणी और निरीह हो जाता है। अपनी निरीहता को बचाये और बनाये रखने की सतर्क कोशिश करता है। जिस तरह शिक्षक दिवस मनाया जाता है और शिक्षक को सम्मानित किया जाता है वह उसे निरीह बनाये रखने में मददगार साबित होेता है। एक समूह के रूप में शिक्षक को निरीह और सामाजिक प्रक्रिया से अलग-थलग रखना मौजूदा सामाजिक ढाँचे के लिए उपयुक्त है।
शिक्षा जगत में वैचारिक स्वतन्त्रता के लिए गुन्जाइश सिमटती गयी है। उपर से नीचे तक पूरा माहौल विचार विरोधी हो गया है। इसलिए विचार सम्पन्न शिक्षक अपने  धर्म का पालन करते हुये तंत्र के लिए असुविधाजनक हो जाता है । इसलिए कोशिश होती है की ऐसे शिक्षकों को इस कदर उपेक्षित कर दिया जय की वह  हास्यास्पद हो जाए । जाहिर है ऐसी स्थिति मेँ पड़ना किसी को गंवारा नहीं होगा  । इसीलिए धीरे.धीरे लोग तंत्र के साथ अनुकूलित होते चले जाते हैं । बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग भी आस-पास के सत्ता केन्द्रों के सामने दुम हिलाते नजर आते हैं। अस्ल में सच का विकल्प हिलती हुई दुम बन गया है। शिक्षकों की तनख्वाहें बढ़ी हैं और सुविधाएँ भी, पर उसी अनुपात में वैचारिक स्वतन्त्रता छीजती चली गयी है। इससे कल्पनाशीलता और नवोन्मेष के रास्ते भी बन्द होते गये हैं।इसी का परिणाम है कि एक वर्ग के रूप मे शिक्षकों की सामाजिक  स्वीकार्यता खत्म हो गयी है । उन्हें मोटी तंख्वाह पाने वाले गैरज़रूरी वर्ग के रूप मे देखा जाने लगा है ।
प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक यही हाल है। प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों के लिए जनगणना, बी.पी.एल कार्ड, मिड डे मील से लेकर स्कूल की इमारत बनवाने तक इतने काम हैं कि वह भूल ही गया है कि वह शिक्षक भी है। माध्यमिक शिक्षकों के लिए भी इतने तरह की औपचारिकताएँ बढ़ी हैं कि शिक्षा और शिक्षण गौण कार्य हो गये हैं। उच्च शिक्षा में थोड़ी बहुत गुन्जाइश थी। सेमेस्टर सिस्टम लागू करके शिक्षक को  वहाँ भी कागजी कारवाइयों मेँ उसे उलझा दिया गया है ।े  जहाँ छात्र संख्या सीमित है वहाँ तो फिर भी गनीमत है । पर जहाँ छात्र संख्या आधिक है वहाँ शिक्षक क्रेडिट का हिसाब किताब करने, एसाइनमेण्ट देखने और सेमेस्टर की कापियाँ जाँचने मेँ लगे रहते हैं । बाकी बचा समय  झूठी सच्ची ए.पी.आई. बनाने और बढ़ाने मेँ लग जाता  हैं। ऐसे माहौल में शिक्षकों से कोई बड़ी उम्मीद करना बेमानी है ।
हमें यह बात समझनी होगी कि महज शिक्षक दिवस पर होने वाले समारोहों से शिक्षकों का सम्मान नहीं बढ़ाने वाला । शिक्षकों को वैचारिक और बौद्धिक स्वतन्त्रता देनी होगी । विचारों और बौद्धिक क्रिया कलापों के लिए शिक्षण संस्थाओं समुचित माहौल बनाना होगा । तभी शिक्षक समाज को नयाए उपयोगी और अग्रगामी विचारों एवं ज्ञान दे सकेगा । शिक्षक का वास्तविक सम्मान इसी मे है ।
अमेरिका जैसा बन जाने की हड़बड़ी में हम रहते हैं । लेकिन हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता है कि अमेरिकी विश्वविद्यालयों में धुर आलोचकों के लिए जगह ही नहीं पर्याप्त सम्मान भी है। इसीलिए  वहाँ के संस्थानों मेँ एडवर्ड सईद और नोम चोम्स्की जैसे स्वतंत्र विचारों वाले बुद्धिधर्मी हो सकते हैं ।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को लिखे पत्र में कहा था कि आप मेरे बेटे को ऐसी शिक्षा दीजिए कि उसमें अकेले पड़ जाने पर भी सच को कहने का साहस हो और वह गलत लोगों और गलत बातों का विरोध कर सके। क्या हम शिक्षक दिवस पर अपने शिक्षकों से ऐसी अपेक्षा कर पाने की स्थिति में हैं ?जिस दिन इस प्रश्न का उत्तर हाँ मेँ दे सकेंगे एशिक्षक का सम्मान अपने आप बढ़ जाएगा ।