गुरुवार, 31 जुलाई 2014

भारतीय समाज के भीतरी आलोचक हैं-प्रेमचंद/ सदानंद शाही



प्रेमचंद का नाम हिंदी के उन महबूब लेखकों में शुमार हैं जिनकी पंहुच केवल  साहित्य समाज तक महदूद नहीं है.वे हिंदी-उर्दू  भाषी समाज के वृहत्तर दायरे में याद किये जाते हैं .हिंदी और उर्दू दोनों के साहित्य में प्रेमचंद का योगदान युग निर्माता जैसा है, इसलिए वहां तो वे अपनी साहित्यिक खूबियों के नाते याद किये जाते हैं .जिस आधुनिक हिंदी का हम आज प्रयोग कर रहे हैं उसे यदि प्रेमचंद का हाथ न मिला होता तो वह कैसी होती  यह कल्पना करना मुश्किल होता .प्रेमचंद के आगमन से हिंदी गद्य अचानक इतना विकसित और टकसाली हो गया कि वह दुनिया की अनेक समर्थ भाषाओँ के साथ होड़ लेने लगा .प्रेमचंद ने यह कमाल सादगी से हासिल किया .उनका रचनात्मक लेखन हमें यह सिखाता है कि सादगी में सौन्दर्य कैसे पैदा किया जा सकता है .प्रेमचंद की कलम हमें साधारण के सौन्दर्य को देखने की आँख देती है.प्रेमचंद की लेखनी के स्पर्श से चिमटा जैसी साधारण वस्तु भी सुन्दर लगने लगती है .ईदगाह कहानी के हामिद के हाथ से एक बार चिमटा लेकर देखने के लिए उसके हमउम्र साथियों का ही नहीं हमारा मन भी मचल उठता है .प्रेमचंद के रचना संसार में हमारी भेट जिन लोगों से होती है वे हमारे रोजमर्रा के जीवन के ही पात्र होते हैं .ऐसे पात्र जिन्हें हम  अति परिचय के नाते जानते हुए भी नहीं पहचान पाते हैं ,उन्हें पहचानने में प्रेमचंद हमारी मदद करते हैं . पंच परमेश्वर के जुम्मन शेख और अलगू चौधरी ,बूढी काकी के बुद्धिराम, नशा कहानी के बीर या फिर स्वयं बड़े भाई साहेब जैसे अनेक पात्र हमारी अपनी दुनिया में मिल जाया करते हैं.
मुक्तिबोध न प्रेमचंद को आत्मा का शिल्पी बताया था. आत्मा पर संस्कारों की गर्द जम जाया करती है .प्रेमचंद उस गर्द और गुबार को साफ करके आत्मा को गढ़ते  हैं. भारत जैसे प्राचीन देश में परम्पराएं और संस्कार बेहद  जटिल और उलझाऊ हैं . जाति और वर्ण के संस्कार हैं तो कहीं स्त्री और पुरुष के .गरीबी –अमीरी ,शिक्षित अशिक्षित से लेकर सभ्य-असभ्य तक के अनेक सवाल संस्कारों और परम्पराओं से ही उपजते हैं .संस्कार और परम्पराएं बद्धमूल होकर समाज को कुंठित और गतिहीन बना देती हैं .ऐसे में समाज के भीतर से आलोचक पैदा होते हैं  जो परंपरा के शुभ तत्व को पहचान कर आगे ले जाते हैं तथा जड़ और अशुभ का साहस के साथ खंडन करते हैं .कबीर और गाँधी हमारे समाज के  ऐसे ही आलोचक थे  .प्रेमचंद भी इसी कड़ी में भारतीय समाज के भीतरी आलोचक हैं । प्रेमचंद साहित्य को जीवन की आलोचना मानते हैं.यह वही कह सकता है जो जीवन से बहुत गहरे जुड़ा हो  .प्रेमचंद जीवन से बहुत गहरे जुड़े हुए थे .जीवन के विविध रंग ही नहीं उसकी विसंगतियां भी प्रेमचंद के सामने प्रकट थीं ,प्रेमचंद ने उनकी बेलौस आलोचना की है. आलोचना करते हुए प्रेमचंद कभी भी  ऊंचे आसन पर बैठे उपदेशक  नहीं लगते. वे समाज के भीतर से समाज को देख रहे हैं । इसीलिए उनकी आलोचना मर्म को छूती है .प्रेमचंद की आलोचना एक तरफ जड़ मानसिकता को उद्वेलित करती है तो दूसरी तरफ सामान्य मनुष्य को प्रेरित और प्रभावित करती है ।
प्रेमचंद की पहली लड़ाई जन्म के संस्कारों से है .क्या हम जन्म के संस्कारों से ऊपर उठ सकते हैं ?क्या हमारी शिक्षा दीक्षा हमें जन्म के संस्कारों से मुक्त कर सकती है ?प्रेमचंद की एक अपेक्षाकृत कम पढ़ी गयी कहानी है ‘आगा पीछा’,जिसमे प्रेमचंद ने सवाल उठाया है –‘क्या कोई औषधि नहीं जो जन्म के संस्कारों को ख़त्म कर दे’ .कहानी का नायक  भगत राम  दलित है . वह स्वयं जन्म के नाते समाज में उपेक्षा और घृणा का शिकार  है .फिर भी वह  जहर खाकर जान दे देता है,परअपनी प्रेमिका श्रद्धा जो  वेश्या की पुत्री है , से विवाह करने को तैयार नहीं हो पाता.प्रेम और जन्म के संस्कार के इस द्वंद्व में प्रेमचंद संस्कार की जड़ता को उजागर करते हैं और दिखाते  हैं कि जन्म का संस्कार किस तरह प्रेम और मनुष्यता का गला घोंट देते हैं. ‘पशु से मनुष्य’ कहानी में प्रेमचंद जड़ संस्कारों की चूल हिलाते नजर आते हैं .डॉ मेहता बार एट ला मामूली गलती पर अपने माली पर कोड़े बरसाते हैं और उसे नौकरी से निकाल देते हैं जबकि स्वयं बड़े बड़े अपराध करते हैं .बाद में डॉ मेहता माली को प्रेमशंकर के सहकारी बागवानी में काम करते और खुशहाल देखकर चिढ जाते हैं और उसकी शिकायत करते हैं .शिकायत का असर होता न देखकर वे जाते जाते प्रेमशंकर से कहते हैं –‘इससे होशियार रहिएगा .यूजेनिक्स (सुप्रजनन शास्त्र)अभी तक किसी ऐसे प्रयोग का आविष्कार नहीं कर सका है ,जो जन्म के संस्कारों को मिटा दे!’
जन्म के संस्कार के नाम पर मनुष्य को मनुष्य से हीन  बनाने वाली  व्यवस्था प्रेमचंद के निशाने पर रहती है.यह जन्म का ही संस्कार है जो श्रम को हेय और त्याज्य बताता है . सदगति कहानी में लकड़ी की एक बड़ी कडियल  गांठ है जिसे पंडित घासीराम दुखी को फाड़ने के लिए देते हैं. उस गांठ पर दुखी जी जान लगाकर चोट करता है लेकिन उसे फाड़ नहीं पाता.लकड़ी को फाड़ने के चक्कर में अपनी जान जरूर गँवा देता है.कई बार मुझे सदगति कहानी की यह गांठ जन्म के संस्कारों में बंधे भारतीय समाज के रूपक की तरह लगती है .यह जड़ सामाजिक संस्कारों की ही गाँठ है जिस पर प्रेमचंद निरंतर प्रहार करते हैं . दूध का दाम कहानी में भूंगी महेशनाथ से कहती है –‘मालिक,भंगी तो बड़े बड़ों को आदमी बनाते हैं, उन्हें  कोई क्या आदमी बनाएगा’ .अपनी एक कहानी  ‘सभ्यता का रहस्य’ में  प्रेमचंद कहते हैं कि  ‘सभ्यता केवल ऐब को हुनर के साथ करने का नाम है .आप बुरे से बुरा काम करें ,लेकिन अगर आप उस पर परदा डाल सकते हैं तो आप सभ्य हैं ,सज्जन हैं ,जेंटिलमैंन   हैं’ .प्रेमचंद मनुष्य की गरिमा को किसी भी तरह ठेस पहुँचाने वाली सभ्यता के हर ढकोसले को उजागर करते हैं और पाखण्ड के समाजशास्त्र को बेपर्दा करते हैं. प्रेमचंद हमें यह भी बताते हैं कि महाजनी सभ्यता के साथ आया  ‘समय ही धन है’ जैसा  जुमला आदमीयत को ख़त्म कर रहा है. यहाँ प्रेमचंद लोककवि भिखारी ठाकुर की याद दिलाते हैं –‘कहत भिखारी भिखार होई गइलीं दौलत बहुत कमा  के’(भिखारी कहते हैं कि बहुत दौलत कमाने के चक्कर में हम आदमीयत के मामले में बेहद  दरिद्र हो जाते  है.)
हर वो विचार  हर वो कार्य जो मनुष्य को बेहतर बना सकता है प्रेमचंद को भाता है । अगर वे कभी आर्य समाज के निकट गए तो इसलिए कि एक दौर में आर्य समाज ने हिन्दू समाज की संकीर्णताओं पर प्रहार किया था । गांधी की पुकार में उन्हें भारतीय समाज की मुक्ति की आहट सुनाई पड़ रही थी, इसीलिए वे गांधी के पास गए . ।प्रेमचंद को अंबेडकर इसलिए पसंद थे कि वे(अम्बेडकर) हिन्दू समाज के जड़ बंधनों को काटकर दलितों के लिए  मुक्ति- मार्ग प्रशस्त कर रहे थे । इसी तरह प्रेमचंद ने  प्रगतिशील लेखक संघ की सदारत करना इसलिए स्वीकार  किया कि उन्हें लगा कि यह संगठन सौंदर्य के मानदंड में बदलाव करके भारत की सांस्कृतिक चेतना को उन्नत करेगा । अपने अध्यक्षीय  उद्बोधन में जब प्रेमचंद ने कहा कि साहित्यकार स्वभाव से ही प्रगतिशील होता है तो वे अपने स्वभाव का ही परिचय दे रहे थे । प्रेमचंद के  स्व-भाव  का बयान ग़ालिब के इस शेर में बखूबी होता है-चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेज रौ  के साथ /पहचानता नहीं हूँ ,अभी राहबर को मैं। 

बुधवार, 30 जुलाई 2014

हमारे उच्च शिक्षा संस्थान क्यों नहीं हैं विश्व स्तरीय/सदानंद शाही





विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थानों की जितनी तरह की सूची बनती है किसी में भी दो सौवें नम्बर तक भारत के किसी संस्थान या विश्वविद्यालय की गिनती नहीं है। इसको लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष और भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी  भी चिंतित  हैं    इसके लिए उन्होंने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक बुलाई थी ।यों तो ऐसी बैठकें होती रहती हैं । लेकिन इस मुद्दे को लेकर महामहिम राष्ट्रपति की संजीदगी का एहसास तब हुआ जब बैठक की अनुशंसाओं के अनुरूप वे खुद केंदीय विश्व विद्यालयों में जा रहे हैं । वहाँ छात्रों अध्यापकों से मिल रहे हैं ।  यह एक शुभ संकेत है । जब राष्ट्रपति इस मुद्दे को लेकर इतने गंभीर हैं तो उच्च शिक्षा से जुड़े सभी लोगों को उच्च शिक्षा को बेहतर  बनाने में जुट जाना  चाहिए । इसके लिए जरूरी है कि उन कारणों का जायजा लिया जाय जिनके नाते उच्चशिक्षा कि स्थिति चिंताजनक बनी हुयी है ।
 हमारे शिक्षण संस्थान समाज निर्माण में उपयुक्त भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे नीति निर्माताओं का ध्यान इस पर नहीं गया है। सरकारों ने शिक्षा की स्थिति  बेहतर बनाने के लिए काफी मगजपच्ची की है। अभी तक हमारी शिक्षा पद्धति मोटे तौर पर इंग्लैण्ड और योरोप का अनुकरण करती रही है। इधर अमेरिकी पैटर्न अपनाकर शिक्षा तंत्र को बेहतर बनाने की कवायद हो रही है। लेकिन यह भी महज कवायद ही साबित हो रही है।
इसमे दो राय नहीं है कि हमारे देश में उच्च शिक्षा के संस्थानों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुर्इ है। खास तौर से यूपीए सरकार के कार्यकाल में। एक समय था जब शिक्षा का बजट बढ़ाने की मांग की जाती थी। बकौल प्रधानमंत्री पिछली पंचवर्षीय योजना में शिक्षा का बजट इतना अधिक था कि लोग इसे शिक्षा की पंचवर्षीय योजना भी कहते रहे हैं। लेकिन केवल बजट बढ़ाकर उच्च शिक्षा को बेहतर नहीं बनाया जा सकता है ।
उच्च शिक्षा केन्द्रों की  स्थिति पर विचार करते हुए हमें एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि शिक्षा केन्द्रों का निर्माण अपने समाज के भीतर से ही होता है। इसलिए समाज की विशेषताएँ या दुर्बलताएँ शिक्षा केन्द्रों में भी दिखार्इ पड़ती हैं। हमारा राजनीतिक ढांचा लोकतांत्रिक  है। इसके बावजूद देश में लोकतांत्रिक संस्थानों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह है। समाज में लोकतांत्रिक  मूल्यों का अभाव। साठ सत्तर वर्ष पुराने और तथाकथित सफल और सबसे बड़े लोकतन्त्र के बावजूद हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना लोकतांत्रिक  नहीं बन पायी है। हमारी सामूहिक चेतना का स्वरूप अभी तक कमोबेश सामन्ती है। इसीलिए लोकतानित्रक संस्थानों द्वारा मिले उत्तरदायित्वों को नीचे से उपर तक सामन्ती सोच के अनुरूप बरता जाता हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था कोर्इ संवैधानिक दायित्व देती है। हम उसे अधिकार के रूप में देखते हैं। इसीलिए लोकतांत्रिक  संस्थाओं के भीतर भी संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए हमारी सोच नितान्त सामन्ती और औपनिवेशिक होती है। यही सिथति शिक्षा संस्थाओं के भीतर दिखार्इ पड़ती है। शिक्षा का कन्टेन्ट भले लोकतानित्रक होता हो उसे लागू करने वाला दिलो-दिमाग सामन्ती होता है। इसीलिए शिक्षा व्यवस्था हमें शिक्षित समाज में बदलने में नाकाम रही है। शिक्षण संस्थानों के भीतर की सामन्ती प्रवृत्तियां जड़ता का ऐसा वातावरण रचती हैं कि प्रगतिकामी और अग्रसोची विचार या प्रयास नष्ट हो जाते हैं।
शिक्षा केन्द्रों के मोटा-मोटी तीन घटक होते हैंं- शिक्षक, शिक्षार्थी और सहायक समूह यानी अकादमिक गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मौजूद गैर शैक्षणिक कर्मचारी। शिक्षा केन्द्रों की विफलता का आकलन करने के लिए जरूरी है कि इन तीनों ही वर्गों  की भूमिका का अलग-अलग आकलन किया जाय। सबसे पहले शिक्षकों की भूमिका से बात शुरू की जाये। शिक्षक ज्ञान के विकास और प्रसार के माध्यम से समाज को बेहतर बनाने का सामाजिक अभिकर्ता होता है। या उसे होना चाहिए। विडम्बना यह है कि हमारे समाज में एक वर्ग या समुदाय के रूप में शिक्षकों की नैतिक मान्यता ही समाप्तप्राय है। सामाजिक उन्नयन के अभिकर्ता के रूप में शिक्षक की विफलता के मूल में उसकी चेतना में मौजूद सामाजिक जड़ता ही है। इस जड़ता के नाते शिक्षक के ज्ञान और कर्म के भीतर गहरी फाक दिखार्इ पड़ती है। शिक्षक के भीतर मौजूद ज्ञान उसके आचरण में एक खास तरह की गरिमा की अपेक्षा करता है लेकिन विभिन्न सामाजिक विवशताओं के नाते ऐसा हो नहीं पाता। ज्ञान से उत्पन्न चेतना या प्रकाश की सामाजिक स्वीकार्यता नहीं बन पार्इ है। इसलिए ज्ञान को जीवन में उतारने से काफी व्यावहारिक दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। इसीलिए शिक्षक अपने ज्ञान को यथासंभव कक्षाओं और किताबों तक ही सीमित रखते हैं। कर्इ बार इस अभ्यास से स्वयं उनका उस ज्ञान से विश्वास उठ जाता है, जिसे वे बाँटते रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि सामाजिक वर्ग के रूप में शिक्षकों का नैतिक प्रभाव कम या खत्म हो जाय। शिक्षकों के प्रति सामाजिक उदासीनता या नकार की अभिव्यकित छठें वेतन आयोग के बाद बड़े मुखर ढंग से होने लगी है। शिक्षकों को ऊँची तनख्वाह पाने वाले निकम्में और अनुपयोगी वर्ग के रूप में देखा जाने लगा है। यह  स्थिति सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बेहद चिन्ताजनक है। सामन्ती पिछड़ेपन के चलते हमारे समाज में प्रोफेशनलिज्म का अभाव है। अपने निर्धारित पेशे या व्यवसाय में अपेक्षित दक्षता हासिल करके भी यह आश्वस्ति नहीं हो पाती कि हमें हमारा दाय मिलेगा ही। जैसा माहौल है उसमें कोर्इ अध्यापक महज अध्ययन -अध्यापन और अनुसंधान में दक्षता के आधार पर पदोन्नति के प्रति आश्वस्त नहीं रह पाता। देखा यह जाता है कि नितान्त अयोग्य और नाकाबिल लोग जीहुजूरी, चाटुकारिता आदि में दक्षता के बल पर पदोन्नति और महत्व के पद  हासिल कर लेते हैं। इससे उच्च शिक्षा केन्द्रों में निराशा और घुटन का माहौल पैदा होता है। र्इमानदारी और निष्ठा से अपना कार्य करने वाले लोग कुण्ठा के शिकार होते हैं। ऐसे माहौल में शिक्षकों से सृजनशील और रचनात्मक होने की अपेक्षा करना बेमानी है। बौद्धिक पलायन की वजह केवल आर्थिक नहीं है। शिक्षण संस्थाओं में मौजूद जड़ता और रचना विरोधी माहौल भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।  शिक्षार्थियों की स्थिति भी कर्इ तरह से विषम है। तमाम लोकतान्त्रिक , समाजवादी और समतावादी नारों के बावजूद माध्यमिक शिक्षा दुर्दशाग्रस्त है। सरकारी स्कूलों से लेकर प्राइवेट स्कूल तक बच्चों का जेहन कुन्द करने में लगे रहते हैं। खास तौर से बच्चों के भीतर की सहज प्रश्नाकुलता ही खत्म हो जाती है। इस नाते एक बड़ा तबका अर्धशिक्षित दशा में उच्च शिक्षा केन्द्रों में लगभग उद्देश्यहीनता की स्थिति में दाखिल होता हैं। प्राय: उसे यह मालूम ही नहीं होता कि वह उच्च शिक्षा किसलिए प्राप्त करना चाहता है। उसे यह भी मालूम नहीं होता कि जो उसकी चाहत है उसे उच्च शिक्षा पूरी कर भी सकती है या नहीं। हमारे तन्त्र में कुछ भी संभव है वाली मूल प्रेरणा के चलते एक बड़ी भीड़ उच्च शिक्षा के लिए आती है और जैसे-तैसे जोड़-तोड़ कर के कुछ न कुछ पा ही लेती  है। इसलिए शिक्षार्थियों के समूह में अधिकांश ऐसे होते हैं जो अधूरी तैयारी और गुमराह मानसिकता के साथ उच्च शिक्षा में आते हैं। ऐसे में वे बहुत थोड़े लोग जो सचमुच उच्च शिक्षा के लिए आते हैं एक तरह की निराशा के शिकार हो जाते हैं। निराशा का यह वातावरण भी उच्च शिक्षा केन्द्रों को विश्वस्तरीय दरजा दिलाने में बहुत बड़ी बाधा है।
शिक्षकों और शिक्षार्थियों  के बीच की कड़ी विश्वविधालयों का व्यवस्था तन्त्र होता है। आमतौर पर इसे गैर शैक्षणिक कर्मचारी या अधिकारी कहा जाता है।  वे 'गैर शैक्षणिक होने की अतिरिक्त नकारात्मकता के शिकार  हैं। सामन्ती मानसिकता की एक बड़ी विशेषता है- पेशे का सामाजिक सम्मान से जुड़ाव। शिक्षा केन्द्रों में शिक्षक को महत्वपूर्ण और सम्मानित वर्ग के रूप में स्वीकृति मिली हुर्इ है। गैर शैक्षणिक वर्ग के भीतर यह एहसास काम करता रहता है कि वह कहीं से हीन है इसलिए अमूमन उसका रवैया गैर शैक्षणिक से शिक्षण और शिक्षक विरोधी हो जाता है। वह शिक्षण संस्थानों में सकारात्मक माहौल बनाने के बजाय तरह-तरह के कागजी खुरपेंच करके अपने अहं की तुषिट करता है। इस तरह वह शिक्षा विरोधी बन जाता है। इधर विश्वविधालयों के संचालन में ऐसे कागजी खुरपेंच करने वालों का प्रभाव बढ़ता गया है। शिक्षा केन्द्रों को जड़ बनाने में काफी हद तक यह स्थिति भी  जिम्मेदार है।
शिक्षा केन्द्रों की यह बहुआयामी जड़ता मौलिक चिंतन एवं शोध की संभावना ही समाप्त कर देती है । ऐसे माहौल मे शिक्षा केन्द्रों के विश्वस्तरीय होने की कल्पना बेमानी है ।

राजेंद्र यादव के निधन पर शोक .

आज की सुबह राजेंद्र यादव के निधन की खबर से शुरू हुयी ।
 नयी कहानी के स्तंभों मे से एक राजेंद्र यादव ने 1986 से हंस पत्रिका का सम्पादन अपने हाथ मे लिया और तब से निरंतर हंस निकालते  रहे । हंस का अनवरत प्रकाशन हिमालय जैसे संकल्प की मांग करता है ।राजेंद्र यादव के आलोचकों का कहना था कि कहानीकार के रूप में चुक जाने के बाद उन्होने हंस का प्रकाशन शुरू किया ।यह ठीक है कि हंस के प्रकाशन से राजेंद्र यादव का अपना लेखन काफी  प्रभावित हुआ लेकिन नयी रचनाशीलता को विकसित ,प्रोत्साहित और स्थापित करने में हंस की  भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है ।तीन दशकों की  सुदीर्घ यात्रा मे हंस   ने कम से कम कथाकारों की  तीन पीढ़ियों के विकास में योगदान दिया ।
हंस पत्रिका जब शुरू हो रही थी तब एक एक कर बड़े घरानो से निकालने वाली साहित्यिक पत्रिकाएँ  बंद हो रही थीं । धर्मयुग ,साप्ताहिक हिंदुस्तान ,दिनमान ही नहीं कहानियों की  पत्रिका सारिका भी बंद हो चली थी ।इन सभी पत्रिकाओं की जगह  अकेले हंस ने भरी । सच बात तो ये है कि हंस ने केवल खाली जगह नहीं भरी बल्कि अपने लिए अलग से जगह बनाई । राजेन्द्र यादव ने हिन्दी मे मौजूद सामंती चेतना से लगातार संघर्ष किया । हंस ने स्त्री और दलित लेखन को प्रकाशित और स्थापित ही नहीं किया बल्कि  इसके लिए  एक आंदोलन जैसा चलाया । राजेंद्र यादव ने यह करके साहित्य के दायरे को विस्तारित ही नहीं  किया बल्कि उसके सरोकारों  को भी फिर से परिभाषित किया  । 

मुझे याद आता है कि 90 में एक बार वे गोरखपुर आए थे ।गोरखपुर विश्वविद्यालय में तब प्रेमचंद पीठ की  स्थापना हुयी हुयी थी । प्रेमचंद पीठ के निदेशक प्रोफ परमानद श्रीवास्तव ने 'प्रेमचंद और भारतीय उपन्यास "पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी  आयोजित की थी । इस संगोष्ठी में राजेंद्र यादव और नामवर सिंह दोनों उपस्थित थे । दोनों में तीखी नोकझोक हुयी थी । तब नामवर सिंह ने कथासाहित्य को मृत या मरणासन्न कह दिया था । इस  पर राजेंद्र यादव काफी खफा हुये थे । संगोष्ठी मे दोनों एक दूसरे पर खड्गहस्त  थे और बाद में एक साथ बैठे और दोस्तों की तरह बात कर रहे थे । इस पूरे वाकये पर  कुछ लोगों ने भगवती चरण वर्मा की कहानी के  दो बाँको  को याद किया । असल मे पिछड़ी सामंती चेतना के लिए  वैचारिक असहमति और व्यक्तिगत संबंध दोनों को एक साथ स्वीकार करना असंभव लग रहा था । राजेंद्र यादव जीवन भर इस सामंती चेतना से संघर्ष करते रहे ।  स्त्री लेखिकाओं के बारे मे  होने वाले प्रवादों को वे हमेशा पुरुष मन की कुंठाओ से जोड़ कर देखने के  हामी थे ॥ 

...... राजेन्द्र यादव के जाने से हिन्दी साहित्य के सिगार से उठता धुंवा हमेशा के लिए खत्म हो गया लेकिन उनकी याद पिछड़ी सामंती,स्त्री और दलित विरोधी चेतना को खत्म करने की प्रेरणा देती रहेगी । 

(इसे पूरा करना है )

सदानंद शाही 
निदेशक 
प्रेमचंद सहित्य संस्थान 
संपादक ,साखी 
प्रोफ  हिन्दी विभाग 
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 
वाराणसी