कविता भाषा में संभव होती है. भाषा की उत्पति
सम्बन्धी एक सिद्धांत यह बताता है कि भाषा
की उत्पति के मूल में मानवीय श्रम है . कविता का श्रम से बहुत निकट का सम्बन्ध है.
जैसे जैसे हमारे समाज में श्रम की प्रतिष्ठा कम होती गयी कविता और श्रम में भेद
बढ़ता चला गया. रैदास की कविताई श्रम को प्रतिष्ठित करने वाली कविताई है.
रैदास
का व्यक्तित्व निर्मल भक्ति का प्रतीक है।
रैदास का जीवन और काव्य इस तरह घुला मिला है जैसे चन्दन और पानी मिल जाता है। वे
अपने प्रभु के साथ केवल चन्दन और पानी का ही नहीं बल्कि और भी कई रिश्ते बनाते हैं
. गिरिवर और मोर ,चंदा और चकोर ,दिया और बाती,तीर्थ और यात्री का रिश्ता. वे यहीं नहीं रुकते एवे कह उठाते हैं कि मेरे और
तुम्हारे बीच कोई अंतर ही नहीं है ण्कहने को तो यह बात बहुतों ने कही होगी लेकिन
इस कहनी पर रैदास को पूरा भरोसा था ण् इसीलिए उन्होंने भक्ति के साथ साथ कर्म
साधना जारी रखी और उसी के सहारे अपने
र्इश्वर को प्रत्यक्ष कियाण् इसीलिए प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी गाने वाले
इस संत कवि का व्यक्तित्व भले ही कबीर की
तुलना में विनम्र और साधु लगता हो. वैचारिक दृढ़ता में उनकी तुलना सिर्फ कबीर से हो सकती है .
रैदास अपनी कविता में मन के चंगा होने की बात करते हैं। यदि मन
पवित्र है तो सामने की कठवत का पानी ही गंगा की तरह पवित्र है। मन की शुद्धता,
वाणी की शुद्धता और कर्म की शुद्धता रैदास की वाणी का मर्म है।रैदास ने अपनी
मानसिक और वैचारिक दृढ़ता से श्रम को प्रतिष्ठा दी । उनके लिए कर्ममय जीवन ही पूजा
है. जहँ जहँ डोलउ सोर्इ परिक्ररमा जो
कुछ करौं सो पूजा। सहज जीवन क्रम में हम
जहाँ कहीं भी जाते हैं वही परिक्रमा है, जो कुछ करते हैं वह पूजा की तरह पवित्र
है।
जिस श्रम को समाज ने हेय बना रखा था रैदास ने
उसे गरिमा प्रदान कर श्रमशील जनता को गरिमा और प्रतिष्ठा दी. भारतीय समाज में श्रम
को अवमानित करने की अनेक विधियाँ विकसित की गयी, वर्ण श्रेष्ठता उनमे से एक है.
रैदास जिस समय और समाज में हुए थे उसमें मनुष्य के श्रम को अवमानित किया जाता
था।जो जितना ही उपयोगी श्रम करता है वह
सामजिक ढांचे में उतना ही हीन माना जाता
है . रैदास ने अपनी काव्य साधना से वर्ण श्रेष्ठता को चुनौती दी और मानवीय श्रम को
प्रतिष्ठित किया .
आम तौर पर हमारे समाज में अकर्मण्य साधुता का प्रचलन
रहा है .इसके बरक्स रैदास श्रमशील साधुता का आह्वान करते हैं और कहते हैं कि ईश्वर
किसी के बाप का नहीं है. वह हर उस उस व्यक्ति का है जो अपने कर्ममय जीवन के भीतर
उसे ;ईश्वर को मन प्राण से चाहता
है .उनका साहित्य वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम
को चुनौती देता है . वर्ण व्यवस्था दर असल सामाजिक श्रम के अपहरण का ही एक रूप है,इसलिए
श्रम की सामाजिक प्रतिष्ठा का जो सन्देश
रैदास की कविता और जीवन से मिलता है वह
आज भी हमारे समाज की परम कामना है.
.रैदास
ने बेगमपुर की कल्पना