शुक्रवार, 13 जून 2014

(छःसौ सोलहवें वर्ष में कबीर) जीने के लिए स्पेस रचती कविता - सदानन्द शाही



कबीर को हुए छ: सौ से ज्यादा साल हो गए हैं .फिर भी कबीर का आकर्षण बना हुआ है .आखिर कबीर की कविता में ऐसा क्या है जो हमें छ सौ वर्ष बाद भी आमन्त्रित करता रहता  है। कबीर की कविता हमें अपनी ओर खींचती है। कबीर के पास पहुँच कर हमें सुकून  मिलता है,तो दूसरी ओर उनकी कविता बेचैन भी करती है । प्रेमचन्द की कफन कहानी के घीसू-माधो जब चरम उत्सव और उल्लास में होते हैं, ठीक उसी समय उन्हें अभाव की, दैन्य की काली छाया ग्रस लेती हैं। तब वे कबीर की शरण में जाते हैं, ‘ठगिनी क्यों नैना झमकावै। कबीर से उन्हें ताकत मिलती है। ऐसी ताकत कि वे निहंगता और दयनीयता के बावजूद माया को ललकारने लगते हैं। घीसू माधो को हम इसलिए जान पाये कि प्रेमचन्द ने उनसे हमारा परिचय करा दिया। पर घीसू माधो जैसे हजारों हजार निहंग और असहाय लोग हैं, जिन्हें कबीर की कविता ताकत देती है, सहारा देती है।     
गोरखपुर शहर में मेरी पढ़ाई लिखाई लिखाई हुई है। वह मगहर के पास है।मगहर कबीर की निर्वाण भूमि है . मैंने उसी मगहर के आसपास के इलाकों से गोरखपुर शहर आने जाने वाले मजदूरों को, कर्मचारियों को देखा है। वे रोज सुबह ट्रेन से गोरखपुर आते हैं। शाम को लौट जाते हैं। इनमें झुन्ड के झुन्ड ऐसे मिल जायेंगे जो आते-जाते कबीर का भजन गा रहे हैं। कबीर का भजन गाते हुए उनका रास्ता कट जाता है। कबीर बानी के सहारे रास्ता ही नहीं उनका जीवन भी कटता रहता है।
मैं जिस शहर में रहता हूँ- बनारस, वह कबीर की जन्मभूमि भी है कर्मभूमि भी। बनारस में लहरतारा है,जहाँ कबीर का जन्म हुआ था .बल्कि यह कहना ज्यादा सही है कि जहाँ  कबीर पाये गए थे। उसी लहर तारा में कबीर का पालन पोषण हुआ था। बनारस में कबीर चौरा है, जहाँ वे रहे। कबीर के जन्म दिन पर भारी मेला लगता है। लाखों की भीड़ जुटती है, जो कबीर की बानी पढ़ती है, सुनती है और गुनती है। लहरतारा तालाब के निकट खुले मैदान में छोटे-छोटे समूह में लोग बैठे होते  हैं। उनमे से कोई एक बीजक बाच रहा होता है। साथ साथ अर्थ बता रहा होता है और बाकी लोग सुनते  हैं। मुझे अचरज होता है कि कबीर की जिन उलटवासियों पर हम विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोग सिर पटकते रहते हैं और समझ में नहीं आतीं-वे ही उलटवासियाँ, इस सामान्य जनता को बखूबी समझ में आ रही  हैं । वे उसकी चर्चा में मगन रहते हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने हमें बताया  है कि कबीर की बानी कुछ अनपढ़ लोगों को  ही भाती है। विचार करना चाहिए कि कबीर की कविता में ऐसा क्या है जो अनपढ़ लोगों तक तो पहुँच जाता है। अपने आप! अनायास। लेकिन पढ़े लिखों तक नहीं पहुँच पाता । यहीं पर यह विचार करने का मन होता है कि दोष कबीर की कविता में है या हमारे पढ़ने लिखने की विधि में। कहीं ऐसा तो नहीं कि पढे लिखे होने के गुमान में हम कविता के बगल से निकल जाते हैं।
कबीर की कविता और कबीर का जीवन घुला मिला है .दोनों में भेद नहीं है .कबीर ने बाभन से सवाल किया था कि अगर तुम बाभन  हो तो दूसरी तरह क्यों नहीं पैदा हुए . कबीर का अपना जन्म अलग तरीके से हुआ था .वे पाए गए थे .उनकी मृत्यु भी अलग तरीके से हुई थी . मगहर में कबीर की मृत्यु के बाद उनके  अंतिम संस्कार को लेकर हिन्दू और मुसलमान शिष्यों में विवाद हुआ .दोनों अपने ढंग से कबीर का अंतिम संस्कार करना चाहते थे . जनश्रुति है की एक तरफ विवाद चल रहा था और दूसरी ओर कबीर का मृत शरीर फूल में  बदल गया .जिसे शिष्यों ने आपस में बाँट लिया .

इसका मतलब यह है कि  जन्म और मृत्यु से कबीर की जाति और धर्म का पता नहीं लगता  . लेकिन जाति और धर्म का पता किये बिना हमारा काम चलता ही नहीं है .कभी हम उन्हें हिन्दू बनाते हैं तो कभी मुसलमान ,कभी ब्राह्मण तो कभी शूद्र .कभी दलित तो  कभी ओ बी सी  तो कभी बनिया .कबीर के आदमी होने से हमारा काम नहीं चलता .हम इतने पढ़े लिखे हैं की उलझाये बिना हमारा काम ही नहीं चलता .
कभी कभी कबीर की मृत्यु से जुडी  जनश्रुति को रूपक कथा के रूप में पढ़ने का मन करता है  . यू आर अनंतमूर्ति के उपन्यास संस्कार की मूल समस्या अंतिम संस्कार की है .प्रेमचंद की कई रचनाएं अंतिम संस्कार की समस्या से जुडी हैं .उनके  महान उपन्यास गोदान में भी यही समस्या है. कबीर की मृत्यु के बारे यह जनश्रुति अंतिम संस्कार के औचित्य को ही प्रश्नांकित करती है .भेद बुद्धि को चुनौती देती है . ..ईश्वर ने हमें एक बनाया ,पर हम उस एकता को नहीं देख पाते .जीते जी अपने –पराये में लगे रहते हैं ,मरने के बाद भी यह भेद नहीं मिटने देते और अंतिम संस्कार का झगडा खड़ा कर देते हैं .यह जनश्रुति हमें इस झगड़े से ऊपर उठाती है .
कबीर की कविता केवल माया के मारे हुओं को नहीं, माया से ऊबे हुए लोगों को भी संबल देती है।झूठ और पाखंड को बरतते ,ढ़ोते आदमी को कबीर की पुकार सुनाई पड जाती है –जो घर जारे आपना चले हमारे साथ .








 


कबीर की कविता ऐसी है जिस तक पहुँचने के लिए हमें निहत्थे जाना होगा। निहत्थे जाने का हमारा साहस नहीं है। हमने जो बहुत सारे हथियार इकट्ठा किये हैं आलोचनात्मक पंडिताऊ उनके बगैर हमारा काम नहीं चलता। कविता के पास हम आनन्द के लिए नहीं जाते। नासेह बनकर जाते हैं।उपदेशक बनकर जाते हैं . यही मुश्किल है। कविता को जाँचने परखने की जो विधियाँ हमने सीख रखी हैं, उन विधियों को परे रखकर जाना होगा। स्वयं कबीर ने भी इसका संकेत दिया है-            
कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं
                        सीस उतारे भुइं धरे तब पइसे घर माँहि।।
यह प्रेम का घर है। पाण्डित्य के अहंकार को घर के बाहर छोड़ना पड़ेगा। हमारी मुश्किल है कि पाण्डित्य को छोड़ना नहीं चाहते। इस या उस पाण्डित्य के चक्कर में रहते ही है। वेद वाला पाण्डित्य छोड़ते हैं तो लोक वाले पाण्डित्य को पकड़ लेते हैं। वाइजगीरी की ऐसी लत लगी हुई है कि उसके बगैर काम ही नहीं चलता। कबीर तो कह रहे हैं कि न लोक के चक्कर में पड़ो न वेद के-
                        पाछे लागा जाइ था लोक वेद के साथ।
                        पैड़े में सतगुरु मिला दीपक दीन्हा हाथ।।
लोक और वेद के पीछे भागने से काम नहीं चलेगा। अपने हाथ में दिया बारना होगा। यहाँ कबीर न तो लोक की भर्त्सना  कर रहे हैं  न ही वेद की. वे  पीछे लागने की आलोचना कर रहे हैं। पिछलग्गूपन की आलोचना कर रहे हैं। हमारी शिक्षा ने, हमारे पाण्डित्य ने, हमारे ज्ञान ने, हमारे अहंकार ने हमें पिछलग्गू बना दिया है। हमारी स्वतन्त्र और उन्मुक्त दृष्टि ही नहीं रह गयी है। कबीर की चिन्ता यही है। यह चिन्ता वैयक्तिक भी है और सामाजिक भी।हमारा समाज इतने तरह के बन्धनों में जकड़ा हुआ है ,कबीर की कविता उन्हें शिथिल कराती है और हमारे जीने के लिए स्पेस रचती है . कबीर मरने के बाद की उम्मीद नहीं दिलाते .वे अपने राम से बार बार कहते हैं -मुए पीछे मति मिलो ,कहै कबीरा राम /लोहा माटी मिल गया तब पारस कवने काम . राम यानी मुक्ति इसी जीवन में चाहिये .क्योंकि ग़ालिब की तरह कबीर को भी मालूम है –मुनहसिर मरने पे हो जिसकी उम्मीद /नाउम्मीदी उसकी देखा चाहिए .

गुरुवार, 12 जून 2014

हमारे उच्च शिक्षा संस्थान क्यों नहीं हैं विश्व स्तरीय /सदानंद शाही



विश्व स्तरीय शिक्षण संस्थानों की जितनी तरह की सूची बनती है किसी में भी दो सौवें नम्बर तक भारत के किसी संस्थान या विश्वविद्यालय की गिनती नहीं है। इसको लेकर केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलाध्यक्ष और भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी  भी चिंतित  हैं    इसके लिए उन्होंने केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की बैठक बुलाई थी ।यों तो ऐसी बैठकें होती रहती हैं । लेकिन इस मुद्दे को लेकर महामहिम राष्ट्रपति की संजीदगी का एहसास तब हुआ जब बैठक की अनुशंसाओं के अनुरूप वे खुद केंदीय विश्व विद्यालयों में जा रहे हैं । वहाँ छात्रों अध्यापकों से मिल रहे हैं ।  यह एक शुभ संकेत है । जब राष्ट्रपति इस मुद्दे को लेकर इतने गंभीर हैं तो उच्च शिक्षा से जुड़े सभी लोगों को उच्च शिक्षा को बेहतर  बनाने में जुट जाना  चाहिए । इसके लिए जरूरी है कि उन कारणों का जायजा लिया जाय जिनके नाते उच्चशिक्षा कि स्थिति चिंताजनक बनी हुयी है ।
 हमारे शिक्षण संस्थान समाज निर्माण में उपयुक्त भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि हमारे नीति निर्माताओं का ध्यान इस पर नहीं गया है। सरकारों ने शिक्षा की स्थिति  बेहतर बनाने के लिए काफी मगजपच्ची की है। अभी तक हमारी शिक्षा पद्धति मोटे तौर पर इंग्लैण्ड और योरोप का अनुकरण करती रही है। इधर अमेरिकी पैटर्न अपनाकर शिक्षा तंत्र को बेहतर बनाने की कवायद हो रही है। लेकिन यह भी महज कवायद ही साबित हो रही है।
इसमे दो राय नहीं है कि हमारे देश में उच्च शिक्षा के संस्थानों की संख्या में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुर्इ है। खास तौर से यूपीए सरकार के कार्यकाल में। एक समय था जब शिक्षा का बजट बढ़ाने की मांग की जाती थी। बकौल प्रधानमंत्री पिछली पंचवर्षीय योजना में शिक्षा का बजट इतना अधिक था कि लोग इसे शिक्षा की पंचवर्षीय योजना भी कहते रहे हैं। लेकिन केवल बजट बढ़ाकर उच्च शिक्षा को बेहतर नहीं बनाया जा सकता है ।
उच्च शिक्षा केन्द्रों की  स्थिति पर विचार करते हुए हमें एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए कि शिक्षा केन्द्रों का निर्माण अपने समाज के भीतर से ही होता है। इसलिए समाज की विशेषताएँ या दुर्बलताएँ शिक्षा केन्द्रों में भी दिखार्इ पड़ती हैं। हमारा राजनीतिक ढांचा लोकतांत्रिक  है। इसके बावजूद देश में लोकतांत्रिक संस्थानों का अपेक्षित विकास नहीं हो पाया। इसकी सबसे बड़ी वजह है। समाज में लोकतांत्रिक  मूल्यों का अभाव। साठ सत्तर वर्ष पुराने और तथाकथित सफल और सबसे बड़े लोकतन्त्र के बावजूद हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना लोकतांत्रिक  नहीं बन पायी है। हमारी सामूहिक चेतना का स्वरूप अभी तक कमोबेश सामन्ती है। इसीलिए लोकतानित्रक संस्थानों द्वारा मिले उत्तरदायित्वों को नीचे से उपर तक सामन्ती सोच के अनुरूप बरता जाता हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था कोर्इ संवैधानिक दायित्व देती है। हम उसे अधिकार के रूप में देखते हैं। इसीलिए लोकतांत्रिक  संस्थाओं के भीतर भी संवैधानिक दायित्वों का निर्वाह करते हुए हमारी सोच नितान्त सामन्ती और औपनिवेशिक होती है। यही सिथति शिक्षा संस्थाओं के भीतर दिखार्इ पड़ती है। शिक्षा का कन्टेन्ट भले लोकतानित्रक होता हो उसे लागू करने वाला दिलो-दिमाग सामन्ती होता है। इसीलिए शिक्षा व्यवस्था हमें शिक्षित समाज में बदलने में नाकाम रही है। शिक्षण संस्थानों के भीतर की सामन्ती प्रवृत्तियां जड़ता का ऐसा वातावरण रचती हैं कि प्रगतिकामी और अग्रसोची विचार या प्रयास नष्ट हो जाते हैं।
शिक्षा केन्द्रों के मोटा-मोटी तीन घटक होते हैंं- शिक्षक, शिक्षार्थी और सहायक समूह यानी अकादमिक गतिविधियों को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए मौजूद गैर शैक्षणिक कर्मचारी। शिक्षा केन्द्रों की विफलता का आकलन करने के लिए जरूरी है कि इन तीनों ही वर्गों  की भूमिका का अलग-अलग आकलन किया जाय। सबसे पहले शिक्षकों की भूमिका से बात शुरू की जाये। शिक्षक ज्ञान के विकास और प्रसार के माध्यम से समाज को बेहतर बनाने का सामाजिक अभिकर्ता होता है। या उसे होना चाहिए। विडम्बना यह है कि हमारे समाज में एक वर्ग या समुदाय के रूप में शिक्षकों की नैतिक मान्यता ही समाप्तप्राय है। सामाजिक उन्नयन के अभिकर्ता के रूप में शिक्षक की विफलता के मूल में उसकी चेतना में मौजूद सामाजिक जड़ता ही है। इस जड़ता के नाते शिक्षक के ज्ञान और कर्म के भीतर गहरी फाक दिखार्इ पड़ती है। शिक्षक के भीतर मौजूद ज्ञान उसके आचरण में एक खास तरह की गरिमा की अपेक्षा करता है लेकिन विभिन्न सामाजिक विवशताओं के नाते ऐसा हो नहीं पाता। ज्ञान से उत्पन्न चेतना या प्रकाश की सामाजिक स्वीकार्यता नहीं बन पार्इ है। इसलिए ज्ञान को जीवन में उतारने से काफी व्यावहारिक दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। इसीलिए शिक्षक अपने ज्ञान को यथासंभव कक्षाओं और किताबों तक ही सीमित रखते हैं। कर्इ बार इस अभ्यास से स्वयं उनका उस ज्ञान से विश्वास उठ जाता है, जिसे वे बाँटते रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि सामाजिक वर्ग के रूप में शिक्षकों का नैतिक प्रभाव कम या खत्म हो जाय। शिक्षकों के प्रति सामाजिक उदासीनता या नकार की अभिव्यकित छठें वेतन आयोग के बाद बड़े मुखर ढंग से होने लगी है। शिक्षकों को ऊँची तनख्वाह पाने वाले निकम्में और अनुपयोगी वर्ग के रूप में देखा जाने लगा है। यह  स्थिति सामाजिक स्वास्थ्य के लिए बेहद चिन्ताजनक है। सामन्ती पिछड़ेपन के चलते हमारे समाज में प्रोफेशनलिज्म का अभाव है। अपने निर्धारित पेशे या व्यवसाय में अपेक्षित दक्षता हासिल करके भी यह आश्वस्ति नहीं हो पाती कि हमें हमारा दाय मिलेगा ही। जैसा माहौल है उसमें कोर्इ अध्यापक महज अध्ययन -अध्यापन और अनुसंधान में दक्षता के आधार पर पदोन्नति के प्रति आश्वस्त नहीं रह पाता। देखा यह जाता है कि नितान्त अयोग्य और नाकाबिल लोग जीहुजूरी, चाटुकारिता आदि में दक्षता के बल पर पदोन्नति और महत्व के पद  हासिल कर लेते हैं। इससे उच्च शिक्षा केन्द्रों में निराशा और घुटन का माहौल पैदा होता है। र्इमानदारी और निष्ठा से अपना कार्य करने वाले लोग कुण्ठा के शिकार होते हैं। ऐसे माहौल में शिक्षकों से सृजनशील और रचनात्मक होने की अपेक्षा करना बेमानी है। बौद्धिक पलायन की वजह केवल आर्थिक नहीं है। शिक्षण संस्थाओं में मौजूद जड़ता और रचना विरोधी माहौल भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।  शिक्षार्थियों की स्थिति भी कर्इ तरह से विषम है। तमाम लोकतान्त्रिक , समाजवादी और समतावादी नारों के बावजूद माध्यमिक शिक्षा दुर्दशाग्रस्त है। सरकारी स्कूलों से लेकर प्राइवेट स्कूल तक बच्चों का जेहन कुन्द करने में लगे रहते हैं। खास तौर से बच्चों के भीतर की सहज प्रश्नाकुलता ही खत्म हो जाती है। इस नाते एक बड़ा तबका अर्धशिक्षित दशा में उच्च शिक्षा केन्द्रों में लगभग उद्देश्यहीनता की स्थिति में दाखिल होता हैं। प्राय: उसे यह मालूम ही नहीं होता कि वह उच्च शिक्षा किसलिए प्राप्त करना चाहता है। उसे यह भी मालूम नहीं होता कि जो उसकी चाहत है उसे उच्च शिक्षा पूरी कर भी सकती है या नहीं। हमारे तन्त्र में कुछ भी संभव है वाली मूल प्रेरणा के चलते एक बड़ी भीड़ उच्च शिक्षा के लिए आती है और जैसे-तैसे जोड़-तोड़ कर के कुछ न कुछ पा ही लेती  है। इसलिए शिक्षार्थियों के समूह में अधिकांश ऐसे होते हैं जो अधूरी तैयारी और गुमराह मानसिकता के साथ उच्च शिक्षा में आते हैं। ऐसे में वे बहुत थोड़े लोग जो सचमुच उच्च शिक्षा के लिए आते हैं एक तरह की निराशा के शिकार हो जाते हैं। निराशा का यह वातावरण भी उच्च शिक्षा केन्द्रों को विश्वस्तरीय दरजा दिलाने में बहुत बड़ी बाधा है।
शिक्षकों और शिक्षार्थियों  के बीच की कड़ी विश्वविधालयों का व्यवस्था तन्त्र होता है। आमतौर पर इसे गैर शैक्षणिक कर्मचारी या अधिकारी कहा जाता है।  वे 'गैर शैक्षणिक होने की अतिरिक्त नकारात्मकता के शिकार  हैं। सामन्ती मानसिकता की एक बड़ी विशेषता है- पेशे का सामाजिक सम्मान से जुड़ाव। शिक्षा केन्द्रों में शिक्षक को महत्वपूर्ण और सम्मानित वर्ग के रूप में स्वीकृति मिली हुर्इ है। गैर शैक्षणिक वर्ग के भीतर यह एहसास काम करता रहता है कि वह कहीं से हीन है इसलिए अमूमन उसका रवैया गैर शैक्षणिक से शिक्षण और शिक्षक विरोधी हो जाता है। वह शिक्षण संस्थानों में सकारात्मक माहौल बनाने के बजाय तरह-तरह के कागजी खुरपेंच करके अपने अहं की तुषिट करता है। इस तरह वह शिक्षा विरोधी बन जाता है। इधर विश्वविधालयों के संचालन में ऐसे कागजी खुरपेंच करने वालों का प्रभाव बढ़ता गया है। शिक्षा केन्द्रों को जड़ बनाने में काफी हद तक यह स्थिति भी  जिम्मेदार है।
शिक्षा केन्द्रों की यह बहुआयामी जड़ता मौलिक चिंतन एवं शोध की संभावना ही समाप्त कर देती है । ऐसे माहौल मे शिक्षा केन्द्रों के विश्वस्तरीय होने की कल्पना बेमानी है ।