कबीर को हुए छ: सौ से ज्यादा साल हो गए हैं .फिर भी कबीर का आकर्षण
बना हुआ है .आखिर कबीर की कविता में ऐसा क्या है जो हमें छ सौ वर्ष बाद भी
आमन्त्रित करता रहता है। कबीर की कविता
हमें अपनी ओर खींचती है। कबीर के पास पहुँच कर हमें सुकून मिलता है,तो दूसरी ओर उनकी कविता बेचैन भी करती
है । प्रेमचन्द की कफन कहानी के घीसू-माधो जब चरम उत्सव और उल्लास में होते हैं, ठीक उसी समय उन्हें अभाव की, दैन्य की काली छाया ग्रस लेती हैं। तब
वे कबीर की शरण में जाते हैं, ‘ठगिनी
क्यों नैना झमकावै’। कबीर से उन्हें ताकत मिलती है। ऐसी
ताकत कि वे निहंगता और दयनीयता के बावजूद माया को ललकारने लगते हैं। घीसू माधो को
हम इसलिए जान पाये कि प्रेमचन्द ने उनसे हमारा परिचय करा दिया। पर घीसू माधो जैसे
हजारों हजार निहंग और असहाय लोग हैं, जिन्हें
कबीर की कविता ताकत देती है, सहारा
देती है।
गोरखपुर शहर में मेरी पढ़ाई लिखाई लिखाई हुई है। वह मगहर के पास है।मगहर
कबीर की निर्वाण भूमि है . मैंने उसी मगहर के आसपास के इलाकों से गोरखपुर शहर आने
जाने वाले मजदूरों को, कर्मचारियों को देखा है। वे रोज सुबह
ट्रेन से गोरखपुर आते हैं। शाम को लौट जाते हैं। इनमें झुन्ड के झुन्ड ऐसे मिल
जायेंगे जो आते-जाते कबीर का भजन गा रहे हैं। कबीर का भजन गाते हुए उनका रास्ता कट
जाता है। कबीर बानी के सहारे रास्ता ही नहीं उनका जीवन भी कटता रहता है।
मैं जिस शहर में रहता हूँ- बनारस, वह
कबीर की जन्मभूमि भी है कर्मभूमि भी। बनारस में लहरतारा है,जहाँ कबीर का जन्म हुआ था .बल्कि यह कहना ज्यादा
सही है कि जहाँ कबीर पाये गए थे। उसी लहर तारा में कबीर का पालन पोषण हुआ था। बनारस
में कबीर चौरा है, जहाँ वे रहे। कबीर के जन्म दिन पर भारी
मेला लगता है। लाखों की भीड़ जुटती है, जो
कबीर की बानी पढ़ती है, सुनती है और गुनती है। लहरतारा तालाब
के निकट खुले मैदान में छोटे-छोटे समूह में लोग बैठे होते हैं। उनमे से कोई एक बीजक बाच रहा होता है। साथ
साथ अर्थ बता रहा होता है और बाकी लोग सुनते हैं। मुझे अचरज होता है कि कबीर की जिन
उलटवासियों पर हम विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोग सिर पटकते रहते हैं और
समझ में नहीं आतीं-वे ही उलटवासियाँ, इस सामान्य
जनता को बखूबी समझ में आ रही हैं । वे
उसकी चर्चा में मगन रहते हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने हमें बताया है कि कबीर की बानी कुछ अनपढ़ लोगों को ही भाती है। विचार करना चाहिए कि कबीर की कविता
में ऐसा क्या है जो अनपढ़ लोगों तक तो पहुँच जाता है। अपने आप! अनायास। लेकिन पढ़े
लिखों तक नहीं पहुँच पाता । यहीं पर यह विचार करने का मन होता है कि दोष कबीर की
कविता में है या हमारे पढ़ने लिखने की विधि में। कहीं ऐसा तो नहीं कि पढे लिखे होने
के गुमान में हम कविता के बगल से निकल जाते हैं।
कबीर की कविता और कबीर का जीवन घुला मिला है .दोनों में भेद नहीं है
.कबीर ने बाभन से सवाल किया था कि अगर तुम बाभन हो तो दूसरी तरह क्यों नहीं पैदा हुए . कबीर का अपना
जन्म अलग तरीके से हुआ था .वे पाए गए थे .उनकी मृत्यु भी अलग तरीके से हुई थी . मगहर
में कबीर की मृत्यु के बाद उनके अंतिम
संस्कार को लेकर हिन्दू और मुसलमान शिष्यों में विवाद हुआ .दोनों अपने ढंग से कबीर
का अंतिम संस्कार करना चाहते थे . जनश्रुति है की एक तरफ विवाद चल रहा था और दूसरी
ओर कबीर का मृत शरीर फूल में बदल गया
.जिसे शिष्यों ने आपस में बाँट लिया .
इसका मतलब यह है कि जन्म और
मृत्यु से कबीर की जाति और धर्म का पता नहीं लगता
. लेकिन जाति और धर्म का पता किये बिना हमारा काम चलता ही नहीं है .कभी हम
उन्हें हिन्दू बनाते हैं तो कभी मुसलमान ,कभी ब्राह्मण तो कभी शूद्र .कभी दलित तो कभी ओ बी सी
तो कभी बनिया .कबीर के आदमी होने से हमारा काम नहीं चलता .हम इतने पढ़े लिखे
हैं की उलझाये बिना हमारा काम ही नहीं चलता .
कभी कभी कबीर की मृत्यु से जुडी
जनश्रुति को रूपक कथा के रूप में पढ़ने का मन करता है . यू आर अनंतमूर्ति के उपन्यास संस्कार की मूल
समस्या अंतिम संस्कार की है .प्रेमचंद की कई रचनाएं अंतिम संस्कार की समस्या से
जुडी हैं .उनके महान उपन्यास गोदान में भी
यही समस्या है. कबीर की मृत्यु के बारे यह जनश्रुति अंतिम संस्कार के औचित्य को ही
प्रश्नांकित करती है .भेद बुद्धि को चुनौती देती है . ..ईश्वर ने हमें एक बनाया
,पर हम उस एकता को नहीं देख पाते .जीते जी अपने –पराये में लगे रहते हैं ,मरने के
बाद भी यह भेद नहीं मिटने देते और अंतिम संस्कार का झगडा खड़ा कर देते हैं .यह
जनश्रुति हमें इस झगड़े से ऊपर उठाती है .
कबीर की कविता केवल माया के मारे हुओं को नहीं, माया से ऊबे हुए लोगों को भी संबल देती
है।झूठ और पाखंड को बरतते ,ढ़ोते आदमी को कबीर की पुकार सुनाई पड जाती है –जो घर
जारे आपना चले हमारे साथ .
कबीर की कविता ऐसी है जिस तक पहुँचने के लिए हमें निहत्थे जाना होगा।
निहत्थे जाने का हमारा साहस नहीं है। हमने जो बहुत सारे हथियार इकट्ठा किये हैं
आलोचनात्मक पंडिताऊ उनके बगैर हमारा काम नहीं चलता। कविता के पास हम आनन्द के लिए
नहीं जाते। नासेह बनकर जाते हैं।उपदेशक बनकर जाते हैं . यही मुश्किल है। कविता को
जाँचने परखने की जो विधियाँ हमने सीख रखी हैं, उन
विधियों को परे रखकर जाना होगा। स्वयं कबीर ने भी इसका संकेत दिया है-
कबिरा
यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं
सीस उतारे भुइं धरे तब पइसे घर माँहि।।
यह प्रेम का घर है। पाण्डित्य के अहंकार को घर के बाहर छोड़ना पड़ेगा।
हमारी मुश्किल है कि पाण्डित्य को छोड़ना नहीं चाहते। इस या उस पाण्डित्य के चक्कर
में रहते ही है। वेद वाला पाण्डित्य छोड़ते हैं तो लोक वाले पाण्डित्य को पकड़ लेते
हैं। वाइजगीरी की ऐसी लत लगी हुई है कि उसके बगैर काम ही नहीं चलता। कबीर तो कह
रहे हैं कि न लोक के चक्कर में पड़ो न वेद के-
पाछे लागा जाइ था लोक वेद के साथ।
पैड़े में सतगुरु मिला दीपक दीन्हा
हाथ।।
लोक और वेद के पीछे भागने से काम नहीं चलेगा। अपने हाथ में दिया
बारना होगा। यहाँ कबीर न तो लोक की भर्त्सना कर रहे हैं न ही वेद की. वे पीछे लागने की आलोचना कर रहे हैं। पिछलग्गूपन की
आलोचना कर रहे हैं। हमारी शिक्षा ने, हमारे
पाण्डित्य ने, हमारे ज्ञान ने, हमारे अहंकार ने हमें पिछलग्गू बना
दिया है। हमारी स्वतन्त्र और उन्मुक्त दृष्टि ही नहीं रह गयी है। कबीर की चिन्ता
यही है। यह चिन्ता वैयक्तिक भी है और सामाजिक भी।हमारा समाज इतने तरह के बन्धनों
में जकड़ा हुआ है ,कबीर की कविता उन्हें शिथिल कराती है और हमारे जीने के लिए स्पेस
रचती है . कबीर मरने के बाद की उम्मीद नहीं दिलाते .वे अपने राम से बार बार कहते हैं -मुए पीछे मति मिलो ,कहै कबीरा
राम /लोहा माटी मिल गया तब पारस कवने काम . राम यानी मुक्ति इसी जीवन में
चाहिये .क्योंकि ग़ालिब की तरह कबीर को भी मालूम है –मुनहसिर मरने पे हो जिसकी
उम्मीद /नाउम्मीदी उसकी देखा चाहिए .
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