सोमवार, 20 जनवरी 2014

रामनवल मिश्र की व्यंग्य रचनाएँ



गोरखपुर और आस-पास के कई छोटे बड़े कवि सम्मेलनों में पण्डित रामनवल मिश्र की व्यंग्य रचनाएँ सुनने को मिलती रही हैं। रामनवल जी चाहे जो कविता सुना रहे हों, लेकिन श्रोता उनसे- खा कउवा मामा गदा गईल जोन्हरी’ या हम गहर के घूर बना दे ई ब त तोरे बाप क का जैसी रचनाओं की माँग करते रहते। जैसे ही रामनवल जी अपनी ये व्यंग्य रचनाएँ पढ़ना शुरू करते वैसे ही श्रोताओं में उत्साह ही लहर दौड़ पड़ती। आधी कविता रामनवल जी पढ़ते और आधी श्रोतागण दोहराने  लगते । साधारणीकरण की जबरदस्त क्षमता इन व्यंग्य रचनाओं में है।
दरअसल भोजपुरी भाषा की सबसे बड़ी ताकत उसकी व्यंग्यधर्मिता में है। भोजपुरी के आदि कवि कबीर हों,  लिजेंड का दर्जा प्राप्त कर चुके  भिखारी ठाकुर हों  या फिर  रामेश्वर सिंह कश्यप उर्फ लोहा सिंह। भोजपुरी भाषा और भोजुपरी समाज अनेक तरह की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शोषण का शिकार रहा है .यहाँ  बहुस्तरीय  विषमता का ऐसा विषम जाल है जिसमे यह समाज जी रहा है ।इस बहुस्तरीय विषमता और शोषण के खिलाफ इस भाषा ने व्यंग्य को हथियार के रूप में सहज ही विकसित कर लिया।
एक ओर भोजपुरी समाज का बुनियादी ढांचा श्रमजीवी लोगों का है। यह समाज  देश और दुनिया में  श्रमिकों की आपूर्ति करता रहा है।दूसरी ओर इसी समाज में ऐसे पाखंडियों का समूह भी सक्रिय रहा है जो दूसरों के श्रम का शोषण करता रहा है .केवल शोषण कहने से बात पूरी नहीं होती .रीति  रिवाज ,अंध विश्वास ,कर्मकांडों का पूरा संजाल बिछा हुआ है . इसलिए इस समाज के लोग जो श्रम करते हैं ,उद्दयम करते हैं ,सृजन करते हैं उसका फल  चखने के लिए कोई न कोई कौवा घात लगाये बैठा रहता है। बचपन में हम लोग कौआ और गिलहरी की कहानी पढ़ते थे जिसमे गिलहरी तो  श्रम कर के अनाज उगाती है कौवा चुपड़ी रोटी खाता हरी डाल पर बैठा रहता है। भोजपुरी  ऐसी विडम्बनामूलक स्थितियों  के विरूद्ध व्यंग्य की धार से लड़ाई लड़ता है। इसीलिए भोजपुरी भाषा में मिठास के साथ-साथ व्यंग्य का बांकपन निरन्तर मौजूद है। औपनिवेशिक भाषा नीति के चलते भोजपुरी पर पिछड़े और गंवार होने का जो ठप्पा लगा उसकी वजह से भोजपुरी के सौंदर्य और सामर्थ्य को न तो पहचानने की कोशिश की गयी और न ही उसकी    क्षमताओं  का भरपूर रचनात्मक उपयोग हुआ ।
रामनवल मिश्र ऐसे कवी हैं जो भोजपुरी भाषा की व्यंग्य क्षमता का भरपूर पता देते हैं .कभी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने अंधेर नगरी में ताका सेर  भाजी ताका सेर खाजा का उपयोग किया था .रामनवल मिश्र का प्रयोग देखें -
टकासेर भाजी हऽ टका सेर खाजा
नगरी अन्हेर हउवे धम धूसर राजा
अइसन ना अवसर पइबे भरिलऽ अजुरी
खा कउवा माना, गदा गइल जोन्हरी।
मासू क मोटरी ह गीध रखवार बा
चामे कऽ बेरहा  कूकूर रखवार बा
नाथ नाहीं पगहा खेत खाला गदहा
बकुलन के संउपल बा ताले  कऽ मछरी।

किसान दिन रात श्रम करके जोन्हरी पैदा करता है। इधर जनाब  कउवा हैं  जो ताक लगाये रहते हैं. कब जोन्हरी गदाये और हम भोग लगायें। इस पूरे प्रसंग को एक रूपक के तौर पर भी  देख सकते हैं। हमारी सामाजिक संरचना के भीतर इस तरह की प्रवृत्ति आम  दिखाई पड़ती है। श्रम और निष्ठा के बल पर सृजन और उत्पादन से जुड़े लोग देखते रह जाते हैं. और कउवे और बगुले भोग लगाने के लिए सबसे आगे आ जाते हैं। इस सचाई को रामनवल मिश्र ने बड़े ही मारक ढंग से व्यक्त किया है।
लोकतांत्रिक समाज के भीतर भी सामन्ती चेतना बची और बनी हुई है। इसलिए अधिकार मिल जाने के बाद उसका अहंकार  स्वाभाविक रूप से आ जाता है।यह अहंकार व्यवस्था के हर अंग में मौजूद है .यह अहंकार मनमानेपन को जन्म देता है . यही वह निरंकुश मनमानापन है जो सामाजिक संस्थाओं को तबाह किये हुए है . रामनवल मिश्र की कविता ‘तोरे बाप कऽ का’ इस मनमानेपन पर चोट कराती है .   घर बनाना कितनी मेहनत और लगन का काम है। एक नहीं दो दो स्वाधीनता संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली।इसके लिए कितने लोगों ने कुर्बानी दी . तब जाकर  यह देश घर के रूप में हासिल हुआ . देश के नये सरपरस्तों  ने उसके साथ का कैसा व्यवहार किया,इसे हम हर क्षेत्र में देखते और महसूस करते हैं . इसे ही रामनवल जी बड़े साधारण किन्तु अत्यंत मारक  शब्दावली में बयान करते  हैं-
हम घर के घूर बना देइब त तोरे बाप कऽ का
ओमे भाँगि धतूर बोआ देइब तऽ तोरे बाप कऽ काऽ
+++++
हम गोहूँ भूजि भूजि बोइब
अपने मन क रोटी पोइ ब
आटा में धूरि मिला देइब, तऽ तोरे बाप कऽ काऽ।
जिस घर को  मेहनत , लगन और कुर्बानी  से बनाया गया उसे कूड़े का ढेर बना देने पर आमादा अधिकार भावना पर मिश्र जी सीधा प्रहार  करते हैं। इस अधिकार भावना में तार्किकता का घोर अभाव है। किसी को सवाल पूछने का अधिकार नहीं है। गलती से अगर किसी ने सवाल कर दिया तो एक ही बेशर्म जवाब-‘तोरे बाप कऽ काऽ‘.रामनवल मिश्र इस बेशर्मी पर चोट करते हैं . इस कविता में मिश्र जी ने अन्धे और विनाशकारी विकास की अवधारणा पर करारा  व्यंग्य किया है। एक ऐसा विकास जो धरती, प्रकृति, पर्यावरण, मनुष्य सबको तबाही के रास्ते पर ले जा रहा है उसकी निरंकुशता पर यह कविता जबरजस्त  प्रहार करती है।सहरिया में मोर गउवाँ हेराइलभी इसी तरह के विकास का शोकगीत है-
अमरइया ना सुहाय टूटल नाता
कागद के फुलवन से बंगला सजा ताऽ
गमलन में नागफनी बिहँसे फुलाइल

और सबसे अन्त में यह कि-
पइसा के पाछे  बा आचरण बिकाइल।

यह वही सभ्यता है जिसे  प्रेमचन्द ने महाजनी सभ्यता कहा था .इस सभ्यता में  आचरण का, चरित्र का, त्याग का, मेहनत का,समर्पण का  कोई मूल्य नहीं रह गया है। सब पैसे से खरीदे और बेचे जा  रहे हैं । व्यंग्य की यही  धार रामनवल मिश्र की गजलों में भी दिखाई देती है-
खूब हवे चैन क बजत बँसुरी
धिव में पायों बूडल बाटे अंगुरी।
+++
आजु सभै सिर चढ़ा लिहल उनके
काल्हि जेह पर उठत रहल अंगुरी।

रामनवल मिश्र किसी छुपे  हुये सत्य का उद्घाटन नहीं कर रहे हैं .वे एक खुले हुए  सत्य को, वीभत्स सत्य को चुनौती दे रहे हैं। कल तक जिन लोगों पर उगंली उठाई जा रही थी आज उन्हें सभी लोग अपना सिरमौर बनाये बैठे हैं। इसी भीषण बिडम्बनामूलक स्थिति को रामनवल मिश्र अपने व्यंग्य का निशाना बना रहे हैं।
उनके पूछे लऽ का उनके चाही हवे
देस सगरो भइल जजमानी हवे।

यों तो वे (ऐसे लोग) देश की सेवा का दावा करते हुए आये थे । राजधानी में जगह मिलते ही पूरा  देश उनके लिए जजमानी हो गया है। जजमानी एक खास शब्द है। कर्मकाण्डी ब्राहमणों की अपनी जजमानी होती है जहाँ वे हर तरह के  संस्कार में,जीवन मरण में, अनुष्ठान में, दक्षिणा लेते रहते हैं। दक्षिणा लेने का अधिकार धर्म देता है। धार्मिक मान्यताएँ देती हैं । इसी तरह देश के तथाकथित कर्णधार  देश को जजमानी मानकर लूट रहे हैं . क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था उन्हें यह छूट या अधिकार  देती है?या स्वघोषित कर्णधारों ने   निर्भ्रांत होकर देश को लूटने को हैं लोकतांत्रिक अधिकार मान लिया है ! रामनवल मिश्र की कवितायें यह सवाल भी करती हैं .
 सबसे अच्छी बात यह है कि रामनवल मिश्र की व्यंग्य कविताओं में निराशाजनित कटुता या कुंठा का नामोंनिशान  नहीं है। वे सहज आत्मविश्वास के साथ हर तरह के शोषण पर प्रहार करते हैं . इस आत्म विश्वास के चलते ही वे व्यवस्था के कर्णधारों को साफ-साफ कह देते हैं-
काम न हमरे बिनु चली इ मति पालि गुमान
मुरगा ना बोलत जहाँ उहवों होत विहान।
आप चाहें कितने भी विशेष क्यों न हों, यह न समझें कि आप  अपरिहार्य हैं। आप के बगैर दुनिया नहीं चलेगी । मुर्गा नहीं बोलता है तब भी सुबह होती ही है। रामनवल मिश्र की व्यंग्य कविताएँ इस सुबह का भरोसा दिलाने वाली कविताएँ है।