सोमवार, 26 अगस्त 2013
विवेकानन्द के शिक्षा-चिन्तन का सामाजिक पहलू
स्वामी विवेकानन्द विश्व नागरिक थे। वे उन लोगों में नहीं थे जो मानते हैं कि भारत विश्व गुरु है और उसे दुनिया को सिखाने का हक हासिल है, सीखने का नहीं। ऐसी फर्जी और एकांगी विश्वगुरुता से विवेकानन्द कोसों दूर रहे। वे पूरब और पशिचम के लोगों से ही नहीं, संस्कृतियों से भी संवादरत थे। भारत से और मुख्यत: वेदान्त दर्शन से उन्होंने जो कुछ सीखा था उसे विश्व मानवता के बीच जाँचा परखा था। इस तरह वे दुनिया विशेषकर पशिचम की दुनिया को जितना सिखा रहे थे, उतना ही सीख रहे थे। भारत में दुनिया को देने लायक जो कुछ था वह दे रहे थे। भारत के लिए दुनिया में जो कुछ उपयोगी लगा उसे भारत के लिए सँजो रहे थे। दुनिया से संवाद करते हुए विवेकानन्द ने अनुभव किया कि भारत की कमजोरी का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है।
इसलिए वे शिक्षा के प्रसार को भारत की मुकित का मार्ग मानते थे। जन सामान्य एवं सित्रयों को भारतीय समाज ने शताबिदयों से शिक्षा से वंचित रखा था। विवेकानन्द का चिन्तन इन्हीं वर्गों को शिक्षा के केन्द्र में ले आता है।
(1)
विवेकानन्द के विचार में जनसमुदाय को शिक्षित करके ही देश को विकसित और उन्नत बनाया जा सकता है। विवेकानन्द की स्पष्ट धारणा थी कि हमारे देश का दुर्भाग्य यही है कि इस देश में कुछ मुटठी भर लोगों ने सम्पूर्ण शिक्षा और बुद्धि पर एकाधिपत्य कर लिया है। इस एकाधिपत्य को तोड़ कर ही देश और समाज को उन्नत बनाया जा सकता है। विवेकानन्द का यह विचार वर्ण व्यवस्था पर करारा प्रहार है। वर्ण व्यवस्था के माध्यम से ही शिक्षा और बुद्धि पर कुछ खास वर्गों का इजारा कायम हुआ।
इस एकाधिपत्य को कायम करने में संस्कृत भाषा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। विवेकानन्द ज्ञान पर किसी भी प्रकार की इजारेदारी के खिलाफ थे। वर्ण व्यवस्था ज्ञान पर कुछ वर्गों या समूहों की इजारेदारी कायम करती रही है। भारत का सारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान संस्कृत भाषा में निबद्ध रहा है। संस्कृत देवभाषा है इसलिए संस्कृत पढ़ने का अधिकार भी कुछ मुटठी भर लोगों के लिए सीमित रहा है। इस तरह एकाधिकार कायम करके कुछ लोग ज्ञान की सŸाा का उपयोग जन सामान्य का शोषण करने में करते रहे हैं। विवेकानन्द इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं। वे इस तथ्य को अच्छी तरह देख पाते हैं कि व्यापक जन समुदाय को शिक्षा से वंचित करके उसका शोषण किया गया। इसलिए वे सबसे पहले शिक्षा की मुकित का सवाल उठाते हैं। शिक्षा की मुकित के लिए उन्होंने जो रास्ता सुझाया वह लोक भाषाओं से होकर निकलता है। विवेकानन्द कहते हैं- 'हमारे शास्त्र ग्रंथों में आध्यातिमकता के जो रत्न विधमान है और जो कुछ ही मनुष्यों के अधिकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, सबसे पहले उन्हें निकालना होगा। जिन लोगों के अधिकार में ये छिपे हुए हैं, केवल वहीं से इस ज्ञान का उद्धार करने से काम न होगा, किन्तु उससे भी दुर्भेध पेटिका अर्थात जिस भाषा में ये सुरक्षित हैं उस शताबिदयों के संस्कृत शब्दों के जाल से उन्हें निकालना होगा। विवेकानन्द का यह वाक्य अनेक दृषिटयों से क्रानितकारी है और कबीर की याद दिलाता है - 'संसकिरत है कूप जल भाषा बहता नीर। कबीर और विवेकानन्द में फर्क यह है कि कबीर संस्कृत में निबद्ध ज्ञान के कायल नहीं थे जबकि विवेकानन्द थे। संस्कृत भाषा में निबद्ध ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते हुए भी विवेकानन्द संस्कृत को ज्ञान की दुर्भेध पेटी मानते हैं। इस पेटी में बँधे ज्ञान को जन साधारण के लिए मुक्त करने का आहवान करते हैं।
संस्कृत की दुर्भेध पेटी से ज्ञान कैसे मुक्त हो? इसके लिए विवेकानन्द लोकभाषाओं के पास जाते हैं। कबीरदास भाषा को बहता नीर कहते हैं। विवेकानन्द की समझ भी यही है। वे ज्ञान को सार्वजनिक सम्पŸाि बनाना चाहते हैं। विवेकानन्द अच्छी तरह जानते थे कि संस्कृत भाषा के माध्यम से ज्ञान को सार्वजनिक सम्पŸाि नहीं बनाया जा सकता। वे स्वीकार करते हैं कि 'जीवन भर संस्कृत भाषा का अध्ययन करने के बावजूद कोर्इ नयी किताब उठाने पर मुझे स्वयं कठिनार्इ होती है। तो फिर जिन्होेंने संस्कृत का अभ्यास नहीं किया है उन्हें कितनी कठिनार्इ होगी। इसीलिए विवेकानन्द जन सामान्य को बोलचाल की भाषा में शिक्षा देने की बात करते हैं। ज्ञान को मातृभाषाओं के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने का आहवाहन करते हंै।
भकितकाल के कवियों ने जिस तरह बोलियों के महत्व को स्वीकार किया और उसे स्थापित किया लगभग उसी तरह विवेकानन्द भी लोक भाषाओं के माध्यम से जनसमुदाय को शिक्षित करने की बात करते हैं। यूनेस्को का कहना है कि मातृभाषाएँ समझ का बेहतर माध्यम हो सकती है। दुनिया भर के शिक्षाविद इस बात पर जोर दे रहे हैं कि मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा देना अधिक उपयोगी है क्योंकि मातृभाषा के ध्वनि प्रतीकों से बालक भली प्रकार परिचित होता है। इससे समझ की प्रक्रिया आसान हो जाती है। विवेकानन्द ज्ञान पर से एकाधिकार खत्म करके उसे सार्वजनिक बनाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें लगता है कि मातृभाषाओं के माध्यम से यह कार्य किया जा सकता है।
विवेकानन्द कोरे धर्मोपदेशक नहीें है। वे देश के यथार्थ से भलीभाँति परिचित हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि हमारे देश की गरीब जनता शिक्षा के लिए स्वत: आगे नहीं आयेगी। क्योंकि गरीब लड़के पाठशाला में आने की अपेक्षा अपने पिता की सहायता करने खेतों में जाना या जीविका के लिए और कोर्इ धन्धा करना पसन्द करेंगे। इस वास्तविकता से परिचित होने के नाते विवेकानन्द दूसरा ही उपाय निकालते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन है कि यदि पहाड़ मुहम्मद के पास नहीं जाता तो पहाड़ ही मुहम्मद के पास क्यों न जायें। यानी हिन्दुस्तान का गरीब मेहनतकश किसान यदि शिक्षा के पास नहीं पहुँचता तो शिक्षा को उसके पास पहुँचना चाहिए। विवेकानन्द इसके लिए धर्मोपदेश करते हुए घूमने वाले सन्यासियों का आहवान करते हैं कि उन्हें अपने को शिक्षक के रूप में संगठित करके धर्मोपदेश करने के साथ लोगों को ज्ञान विज्ञान की शिक्षा भी देनी चाहिए। यह देखकर घोर आश्चर्य होता है कि आज विज्ञान के गर्भ से उपजी हुर्इ तकनीक जन समुदाय के बीच रूढि़ और अन्धविश्वास फैलाने में लगी है जबकि एक संन्यासी जन साधारण को ज्ञान विज्ञान से लैस करना चाहता है बलिक इसके लिए धर्मोपदेशकों एवं संन्यासियों का आहवान करता है।
शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने के लिए विवेकानन्द उसे लोक भाषाओं-मातृभाषाओं के माध्यम से पहुँचाने की बात करते हैं। वे एक घुमन्तू शिक्षालय की कल्पना करते हैं जो गरीब और असहाय लोगों के पास पहुँचकर उन्हें शिक्षित करे।
विवेकानन्द लोकभाषा की बात करते हुए इतिहास से भी सबक लेते हैं। महात्मा बुद्ध ने जनता की भाषा में उपदेश किया और व्यापक जन तक अपनी शिक्षाओं को पहुँचाने में सफल हुए। उनके प्रभाव से संस्कृत की शिक्षा बन्द हो गयी। विवेकानन्द कहते हैं कि इससे संस्कृत का वैशिष्टय कायम रहा और आगे चलकर संस्कृत और संस्कृत में निबद्ध ज्ञान का महत्व फिर से स्थापित हो गया। इसलिए विवेकानन्द संस्कृत को उपेक्षित नहीं छोड़ना चाहते। मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाय, इसके साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी जारी की जाय। इसके पीछे विवेकानन्द जो तर्क देते हैं वह अदभुत है। उन्हें यह आशंका लगती है कि लोकभाषाओं के प्रचार के बाद संभव है, कोर्इ दूसरी जाति संस्कृत में निष्णात हो जाय और विशिष्ट होने का दावा करे। विवेकानन्द संस्कृत की इस विशिष्टता को समाप्त कर देना चाहते है। अगर जन सामान्य संस्कृत में दक्ष होगा तो संस्कृत का अजूबापन या वैशिष्टय अपने आप खत्म हो जायेगा। विवेकानन्द किसी भी तरह संस्कृत का वैशिष्टय और इस बहाने किसी जाति या वर्ण विशेष के वैशिष्टय को समाप्त कर देना चाहते हैं क्योंकि भारत के सामान्य जन के शोषण और दुखों के मूल में यह वैशिष्टय ही है। इसलिए विवेकानन्द किसी भाषा वर्ग या जाति के वैशिष्टय के खिलाफ सामान्य को तरजीह देते हैं। संस्कृत की उपेक्षा भी नहीं और उसे विशेष दर्जा भी नहीं।
(2)
विवेकानन्द इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि इस देश में सित्रयों और पुरुषों में इतना भेद क्यों रखा गया है। वेदान्त की घोषणा है कि सभी प्राणियों में परमात्मा विधमान है। इसलिए विवेकानन्द को यह बात सख्त नागवार लगती है कि सित्रयों को इस देश में महज सन्तानोत्पादक यन्त्र बनाकर रखा गया है। इसके पीछे भी असली वजह उन्हें शिक्षा से वंचित करना रहा है। इसीलिए विवेकानन्द जनसामान्य की शिक्षा पर जितना जोर देते है उतना ही जोर स्त्री शिक्षा पर भी देते हैं। सित्रयों की सिथति के बारे में भी विवेकानन्द के विचार बेहद क्रानितकारी हैं। खासतौर से इसलिए कि अपने को वे परम्परागत संन्यासी के रूप में पेश करते हैं। आम तौर पर हमारे देश के धर्मोपदेशकों, साधु संन्यासियों का नजरिया भी पुरूष प्रधानता वाला रहा है। इसके उलट विवेकानन्द इस बात पर घोर आपŸाि व्यक्त करते हैं कि सित्रयों को हम 'सदैव नि:सहाय अवस्था में रहने और दूसरों पर गुलाम के समान अवलमिबत रहने की शिक्षा देते है।
विवेकानन्द सित्रयों को अबला के रूप में शिक्षित करने के खिलाफ है। वे भारतीय सित्रयों की सभी समस्याओं के मूल में उनके भीतर शिक्षा का अभाव मानते हैं। इसीलिए वे स्पष्ट तौर पर घोषित करते हैं कि सित्रयों की सभी समस्यायें शिक्षा नाम के जादू से खत्म की जा सकती है। यध़पि वे स्त्री शिक्षा के लिए तमाम परम्परागत बातों पर भी जोर देते हैं फिर भी वे स्त्री को स्वाधीन देखता चाहते हैंं। 'सित्रयों को ऐसी अवस्था में रखना चाहिये कि वे अपनी समस्याओं का अपने ही तरीके से हल कर सकें। हमारी भारतीय सित्रयाँ इस कार्य में संसार की अन्य सित्रयों के समान ही दक्ष हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने वेदान्त के ज्ञान को यथार्थ की कसौटी पर कसा था। वे भारतीय समाज में मौजूद पाखण्ड को भली भाँति समझते थे। वे देख रहे थे कि सैद्धानितक रूप से भले ही भेदभाव न बरता गया हो लेकिन व्यावहारिक रूप से भेदभाव मौजूद है। शकित पूजा के केन्द्र बंगाल मे ंरहते हुए विवेकानन्द ने अनुभव किया कि महज प्रतीक रूप मेंं शकित पूजा करने से काम नहीं चलेगा। जरूरत यथार्थ शकितपूजा की है। यथार्थ शकितपूजा को विवेकानन्द इन शब्दो में परिभाषित करते हैं- 'यथार्थ शकित पूजक तो वह है, जो यह जानता है कि र्इश्वर विश्व में सर्वव्यापी शकित है और जो सित्रयों में उस शकित का प्रकाश देखता है। अमेरिका मे पुरुष अपनी महिलाओं को इसी दृषिट से देखते हैं और उनके साथ उŸाम बर्ताव करते हैैं, इसी कारण वे लोग सुसम्पन्न हंै, विद्वान हंै, इतने स्वतन्त्र और शकितशाली हैं।
विवेकानन्द हिन्दुस्तान में इस यथार्थ शकितपूजा के हिमायती थे। इस यथार्थ शकितपूजा का मूल मन्त्र स्त्री शिक्षा में देखते हैं। वे सित्रयोें के लिए अलौकिक और लौकिक दोनों तरह की शिक्षा की जरूरत पर बल देते हैं। ऐसी शिक्षा जो सित्रयों को स्वतंत्र और शकितशाली बनाये, दूसरो गुणों के साथ उनके भीतर शूरता और वीरता का संचार करे।
वास्तव में विवेकानन्द शिक्षा को सर्वजन सुलभ बनाने वाले विचारक हैं। भारतीय समाज मे ंपरम्परा से जिन लोगों को शिक्षा और ज्ञान से वंचित रखा गया और शकितहीन, गुलाम और दरिद्र बनाया गया उन्हें शिक्षित करना। हिन्दुस्तान का किसान, मजदूर, दलित उपेक्षित वर्गों के साथ सित्रयाँ भी शिक्षा के वरदान से वंचित रखी गयी थीं। शिक्षा को ही बन्धन में बांध कर रखा गया था। विवेकानन्द शिक्षा को हर तरह के बन्धन से मुक्त करने का आहवान करते हैं। उसे जाति, धर्म, लिंग, भाषा आदि के बंन्धन से मुुक्त करके सर्वजन सुलभ बनाना चाहते हैं। वे शिक्षा की सार्थकता इसी रूप में देखते हैं।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)