रविवार, 3 मई 2015

राजनीतिक -सामाजिक विचारक बुद्ध /शैलेंद्र प्रताप सिंह



बुद्ध अपने समय में पश्चिम एवं पूर्व के सबसे महान विचारक थे। उनका जन्म 566 0 पू0 में हुआ, कनफ्यूशियस 522 0 पू0 में और सुकरात 484 0 पू0 में पैदा हुए। सुकरात का शिष्य प्लेटो और प्लेटो का शिष्य अरस्तू था। बुद्ध ने न केवल राज्य, प्रजातंत्र, अधिकार व कर्त्तव्य, जाति, वर्ण एवं नारियों पर विचार व्यक्त किए वरन् अपने विचारों को अमली जामा पहनाने का भी प्रयास किया। यह कार्य उस समय तक शायद ही किसी अन्य विचारक ने किया हो।
      पश्चिमी विद्वान बुद्ध को एक संत एवं धार्मिक विचारक ही मानते हैं, न कि क्रांतिकारी राजनीतिक चिंतक। इंटरनेशनल एनसाइक्लोपीडिया इन सोशल साइंसेज में भी बुद्ध को नैतिक उपदेशक, कौटिल्य को चालाक चिंतक और कनफ्यूशियस को आचार नियमावली बनानेवाला बताया गया है। भारत के राजनीतिक विचारक मनु तथा कौटिल्य को ही राजनीतिक चिंतक के रूप में स्वीकार करते हैं, किन्तु यदि बुद्ध के राजनीतिक विचारों पर सही तरीके से शोध किया जाए तो वे सभी राजनीतिक विचारकों में सर्वोपरि हैं।
      बुद्ध के समकालीन विचारक मुख्यतः तत्वमीमांसीय रहस्यों की खोज में लगे थे। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों से अनुमान होता है कि बुद्ध तत्कालीन समाज में हो रहे गहन परिवर्तनों को समझना और इनके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान करना चाहते थे। अतः आधुनिक अर्थ में न सही, अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध पहले समाजशास्त्री थे, किन्तु उनके उपदेशों की भव्यता एवं सीमाओं को हम आधुनिक समाजशास्त्र की सहायता से ही समझ सकते हैं। बौद्धधर्म की अपार सफलता का कारण तत्कालीन समाज में प्रचलित मूल्यों के स्थान पर नए मूल्य प्रस्तुत करना था। अतः बुद्ध के अभिप्रायों की वास्तविक सफलता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि कबीलाई समाजों के ध्वंसावशेषों पर उठ खड़ी होने वाली राजसत्ताओं के साथ कबीलाई जीवन के पुराने मूल्य नष्ट हो गए थे। बुद्ध ने इस बात को समझा और अपने समाज को दुखों के समुद्र में तैरते देखा। उन्हें प्रतीत हुआ कि जीवन का मूलतत्व दुख के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।
      एक सुत्त (सूत्र) में बुद्ध कहते हैं, इस संसार में मैं धनिकों को देख रहा हूँ। वे जो वस्तुएं प्राप्त करते हैं, उनमें से कुटिलतावश किसी को कुछ नहीं देते। वे अधिकाधिक धन एकत्र करते जाते हैं और अनंत उपभोग में लीन रहते हैं। राजा धरती के राज्य जीतकर भी, समुद्र के इस पार की धरती का-समुद्र के किनारे तक का-स्वामी होकर भी अतृप्त रहता है और उसकी कामना करता है जो समुद्र के उस पार है। राजा तथा अन्य लोग अतृप्त इच्छाओं के साथ ही मृत्यु के शिकार हो जाते हैं.......न संबंधी, न मित्र, न ही परिचित मरते हुए व्यक्ति को बचाते हैं। उसकी धन-संपत्ति को उत्तराधिकारी ले लेते हैं, किन्तु अपने कर्मों का फल वही भोगता है। कोई भी खजाना, पत्नी या संतान, धन-संपत्ति या राज्य मरनेवाले के साथ नहीं जाता।
      एक अन्य सुत्त में बुद्ध कहते हैं : राज्यों का शासन करने वाले धन-संपत्तिशाली जो नृपति एक-दूसरे को अपने लोभ का शिकार बनाते हैं, वे अतृप्त रूप से अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में लगे रहते हैं।
      बुद्ध अपने मित्र प्रसेनजित् के पुत्र को पिता से विश्वासघात करते देखा। उनके एक अन्य मित्र सम्राट बिंबसार को उसके पुत्र अजातशत्रु ने कारागृह में भूखा रखकर मार डाला। अजातशत्रु का बध उसके पुत्र उदयभद्र ने किया, उदयभद्र का वध उसके पुत्र अनुरुद्धक ने किया, अनुरुद्धक का बध उसके पुत्र मुंड ने किया और मुंड का वध उसके पुत्र नागदस्सक ने किया।
      ये घटनाएं उन नए मूल्यों की अभिव्यक्ति मात्र थीं, जो राजसत्ता के उदय के साथ समाज में प्रविष्ट हुईं। दूसरे शब्दों में, राज्य के लिए पिता का वध आकस्मिक तथ्य न होकर इन नए मूल्यों के उदय का अनिवार्य परिणाम था। कोसांबी कहते हैं : अर्थशास्त्र (चाणक्य) में राजा व युवराज के बीच इस प्रकार का तनाव सामान्य रूप से स्वीकृत है। राजा को सलाह दी गई है कि युवराज पर कैसे कड़ी नजर रखी जाए और युवराज को सलाह दी गई है कि वह कैसे अपने संशयी पिता को चकमा दे।
      बुद्ध ने इन शक्तियों को देखा था, जो अब जीवन को शासित करने लगी थीं, अतः स्वाभाविक था कि वे हृदय की शांति की इच्छा करते। उन्होंने दीर्घ काल तक घोर चिंतन किया और अंततः उस शांति को पा लिया, जिसकी उन्हें खोज थी। उन्होंने कहा : मैं उस सत्य को जान गया हूं जो गहन है, देखने व समझने में कठिन है, जो हृदय को शांति देता है, जो श्रेष्ठ है। दूसरी ओर लोग वासना के दास हैं, उनका मन वासना में रमता है और वासना में ही उन्हें आनंद मिलता है। उनके लिए कारणकार्य-शृंखला को समझना कठिन होगा। उनके लिए समस्त संस्कारों के अवसान, हृदय की शांति एवं निर्वाण को समझना सबसे कठिन होगा। यदि मैं अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करूं और अन्य लोग मेरे उपदेशों को न समझें, तो इससे मुझे थकान तथा क्रोध ही होगा।
      एक महान संकट उत्पन्न हुआ। तथागत का चित्त शांत रहना चाहता है और सिद्धांत का उपदेश नहीं करना चाहता।
      ऐसी कथा मिलती है कि दैवी हस्तक्षेप ने बुद्ध को उठ खड़े होने तथा अपने सिद्धांत का उपदेश करने के लिए प्रेरित किया और लोगों ने उनकी बात सुनी।
निरंकुशता, दमन लोभ, वासना एवं घृणा की शक्तियों से विभाजित विश्व के लिए यह एक न्याय प्रिय राज्य का संदेश था।
काशी नगरी में उन्होंने घोषणा की : यदि तुम मेरे बताए मार्ग पर चलोगे तो शीघ्र ही सत्य को जान लोगे। तुम स्वयं इसे जान लोग और इसका साक्षात्कार करोगे। तुम पवित्र जीवन का वह सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त कर जीवन बिताओ, जिसे प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ युवा संसार का परित्याग करके गृहहीन हो जाते हैं।
दुखों से बचने के लिए बुद्ध ने जो मार्ग दिखाया, उसे प्रायः अष्टांगिक मार्ग (अर्थात् सम्यक् विचार, सम्यक् आचार, सम्यक् वाणी आदि) कहा जाता है, जिसका उनके समकालीन समाज में हनन हो रहा था। कदाचित् बुद्ध स्वयं इस बात को जानते थे कि समाज से समस्त दुखों को हटाने का प्रयास निरर्थक है। अतः उन्होंने सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि नए वर्ग-समाज में ही एक प्रकार के निर्लिप्त जीवों का विकास किया जाए, ताकि स्वतंत्रता, समता तथा बंधुत्व के व्यापक मूल्यों को व्यवहार में लाया जा सके।
महापरिनिव्वान सुत्त में हमें इसका संकेत मिलता है। सम्राट अजातशत्रु वज्जियों के विरुद्ध आक्रमण के लिए कृतसंकल्प था। उसने अपने ब्राह्मण मंत्री को इस प्रकार संबोधित कियाः आनंद, जब तक वज्जि बैठक करते रहेंगे और गण की सभाओं में जाते रहेंगे, (तब तक) आनंद वज्जियों की वृद्धि को समझना, हानि नहीं। इसके अतिरिक्त बुद्ध ने छह अन्य बातें भी बताईं। गणतंत्र प्रणाली के पक्ष में उनका यह समर्थन माना जा सकता है,
भारतीय इतिहास के ऐसे संकटपूर्ण चरण में जबकि तत्कालीन स्वतंत्र कबीलों को निर्दयतापूर्वक नष्ट किया जा रहा था और विस्तृत होती राजसत्तओं के घेरे में लोग नए मूल्यों के उदय का अनुभव कर रहे थे, बुद्ध अपने संघ का संगठन अपने मौलिक सिद्धांतों के आधार पर कर रहे थे और भिक्षुओं को उपदेश दे रहे थे कि वे अपने जीवन को इन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप ढालें। बुद्ध ने न केवल सफलतापूर्वक अपने संघों को वर्गपूर्व समाज के सांचे में ढाला अपितु इस बात की भी पूरी सावधानी रखी कि संघों के सदस्य भिक्षु पूर्णतः निर्लिप्त जीवन व्यतीत करें अर्थात् निजी संपत्ति से निर्लिप्त रहें।
दिलचस्प बात यह है कि निजी संपत्ति के प्रति इसी घृणा के कारण बुद्ध ने किसी स्थाई आत्मा की धारणा से इनकार किया। इस बात को श्रेच्रबात्सकी ने स्पष्ट किया हैः आत्मा के अस्तित्व से इनकार करके बौद्धमत निजी संपत्ति के निषेध को एक गहन दार्शनिक आधार प्रदान करता है। जब व्यक्तित्व ही न हो तो निजी संपत्ति कैसी। इस कारण एक सच्चा बौद्व वही है जो निजी संपत्ति का और निजी संपत्ति की नहीं बल्कि परिवार व घर आदि का भी सदा-सदा के लिए त्याग कर चुका हो। विश्व-धर्मों-ईसायत व इस्लाम-के इतिहास में अक्सर संपत्ति का निषेध करने और उसे त्यागने की सलाह देने वाले सिद्धांत मिलते हैं, लेकिन बौद्धमत इस प्रश्न की सर्वाधिक मूलगामी विवेचना करता है।
      बुद्ध का मत बिल्कुल स्पष्ट है कि राजा का कर्त्तव्य नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा देना हैं वह अपने नागरिकों के लिए ऐसी राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था करे, जिसमें रहकर गृहस्थ एवं प्रव्रजित सभी लोग धर्म के अनुसार अपना जीवनयापन कर सकें। बुद्ध ने जाति प्रथा का विरोध करते हुए प्रचलित धर्म व न्याय को एक नया रूप दिया है। उन्होंने राजनीति को धर्म से, विज्ञान को मिथकों से, बोध को विश्वास से, वर्ग को वर्ण से, सही को गलत से बिल्कुल अलग किया।
बुद्ध पहले महान चिंतक थे, जिन्होंने ब्राह्मणवादी दर्शन और उसके सिद्धांतों का विरोध करते हुए नितांत मौलिक तथा वैज्ञानिक उपदेश दिए। उनके धर्म तथा दर्शन ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ललकारा। उन्होंने समझा कि समाज के तमाम तबके धार्मिक तानाशाही का शिकार होने वाले हैं। एक जाति या संगठन के लोग शेष समाज में जनता तथा ईश्वर के बीच संवाद के अधिकार पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहे थे, इसलिए उन्होंने नियोजित रूप से पुरोहितों के अधिकार समाप्त करने और एक ऐसे समाज का निर्माण करने पर बल दिया, जहां मानवता अपने को प्रस्फुटित कर सके। किसी जाति-विशेष की जगह उन्होंने बहुजन हिताय बहुजन सुखायकी पैरवी की। जाति के स्थान पर उन्होंने जनता को प्रधानता दी। यहां बुद्ध ने अपना दर्शन ग्रीक दार्शनिक-विचारकों की वर्ग-नैतिकता तथा पूर्वी जगत के कन्फ्यूशियस, कौटिल्य एवं मनु की ऊंच-नीचवादी नैतिकता के विरुद्ध खड़ा किया। यथार्थ के धरातल पर उनका मध्यम मार्ग जन-आंदोलन बन गया।
बुद्ध के मार्ग की आधारशिला आदमी-आदमी का परस्पर मधुर संबंध ही है।
भिक्षु-संघ की स्थापना का उद्देश्य एक वर्ग निरपेक्ष आदर्श मनुष्य का निर्माण अथवा आदर्श समाज-सेवकों की रचना करना था, जो जनता के सहायक, मित्र मार्गदर्शक तथा दार्शनिक एक साथ हों। एक भिक्षु के जीवन का लक्ष्य व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ लोगों की सेवा भी है। बिना व्यक्तिगत साधना के वह नेतृत्व नहीं कर सकता, इसलिए उसे एक संपूर्ण सर्वश्रेष्ठ धार्मिक तथा ज्ञानसंपन्न व्यक्ति बनना ही होगा। इसके लिए व्यक्तिगत साधना करनी ही होगी। भिक्षु गृहत्याग करता है, संसारत्याग नहीं करता। वह अपने घर को इसलिए छोड़ता है ताकि उसे उन लोगों की सेवा करने का अवसर मिल सके, जो बुरी तरह आसक्त हैं और जो दुख में पड़े हैं, चिंता में पड़े हैं, जिन्हें चैन नहीं है और जिन्हें सहायता की अपेक्षा है।
      यदि भिक्षु एक संपूर्ण मनुष्य मात्र बना रहे तो उसका धर्म-प्रचार के कार्य में कोई उपयोग नहीं, क्योंकि वह संपूर्ण मनुष्य होने के बावजूद एक स्वार्थी आदमी ही बना रहेगा। दूसरी ओर यदि वह समाज-सेवक भी है, तो उससे बौद्धधर्म भी कुछ आशा रख सकता है।
      राज्य और बुद्ध-अनुयाइयों का आपसी संबंध इस प्रकार होना चाहिए कि अनुयाइयों को अपने सिद्धांतों के अनुसार जीवन-यापन करने की और उनका प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो। बौद्धधर्म अपने अनुयाइयों के लौकिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। वह केवल सत्य का उपदेश देता है।
     
      डॉ0 अंबेडकर ने निष्कर्ष निकाला कि बौद्धधर्म प्रजातंत्रात्मक विचारों का स्कूल था। अंबेडकर के अनुसार, गौतम बुद्ध प्राचीन भारत के पहले चिंतक थे, जिन्होंने जातिप्रथा के विरोध में अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीय समाज की तमाम विडंबनाओं को देखा और उनके विरोध में खड़े हुए।
      बुद्ध का संघम् शरणम् गच्छामिस्पष्ट करता है कि वह राज्य के या व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के विरुद्ध थे। संघ के मूल में सादगी थी। आवश्यकताएं कम-से-कम थीं। सब जातियों के लोग एक समान जीवन जीते थे। कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं।

      सिद्धांतों के स्तर पर स्त्रियों को संघ में शामिल करके बुद्ध ने पुरुषों तथा स्त्रियों की समानता के संबंध में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया। ब़ुद्ध ने कहा कि स्त्रियाँ भी निर्वाण प्राप्त कर सकती हैं। स्त्री-बुद्धजीवियों की पहली खेप संघ से ही निकली, जिसमें आम्रपाली, सुमनाला, मथिका, ईसीदासी, शुभा आदि प्रमुख थीं।
(शैलेंद्र प्रताप सिंह की किताब -बुद्ध के बढ़ते कदम से साभार )

राजनीतिक -सामाजिक विचारक बुद्ध /शैलेंद्र प्रताप सिंह



बुद्ध अपने समय में पश्चिम एवं पूर्व के सबसे महान विचारक थे। उनका जन्म 566 0 पू0 में हुआ, कनफ्यूशियस 522 0 पू0 में और सुकरात 484 0 पू0 में पैदा हुए। सुकरात का शिष्य प्लेटो और प्लेटो का शिष्य अरस्तू था। बुद्ध ने न केवल राज्य, प्रजातंत्र, अधिकार व कर्त्तव्य, जाति, वर्ण एवं नारियों पर विचार व्यक्त किए वरन् अपने विचारों को अमली जामा पहनाने का भी प्रयास किया। यह कार्य उस समय तक शायद ही किसी अन्य विचारक ने किया हो।
      पश्चिमी विद्वान बुद्ध को एक संत एवं धार्मिक विचारक ही मानते हैं, न कि क्रांतिकारी राजनीतिक चिंतक। इंटरनेशनल एनसाइक्लोपीडिया इन सोशल साइंसेज में भी बुद्ध को नैतिक उपदेशक, कौटिल्य को चालाक चिंतक और कनफ्यूशियस को आचार नियमावली बनानेवाला बताया गया है। भारत के राजनीतिक विचारक मनु तथा कौटिल्य को ही राजनीतिक चिंतक के रूप में स्वीकार करते हैं, किन्तु यदि बुद्ध के राजनीतिक विचारों पर सही तरीके से शोध किया जाए तो वे सभी राजनीतिक विचारकों में सर्वोपरि हैं।
      बुद्ध के समकालीन विचारक मुख्यतः तत्वमीमांसीय रहस्यों की खोज में लगे थे। प्राचीन बौद्ध ग्रंथों से अनुमान होता है कि बुद्ध तत्कालीन समाज में हो रहे गहन परिवर्तनों को समझना और इनके परिणामस्वरूप उत्पन्न होने वाली समस्याओं का समाधान करना चाहते थे। अतः आधुनिक अर्थ में न सही, अपने समय की परिस्थितियों के अनुसार बुद्ध पहले समाजशास्त्री थे, किन्तु उनके उपदेशों की भव्यता एवं सीमाओं को हम आधुनिक समाजशास्त्र की सहायता से ही समझ सकते हैं। बौद्धधर्म की अपार सफलता का कारण तत्कालीन समाज में प्रचलित मूल्यों के स्थान पर नए मूल्य प्रस्तुत करना था। अतः बुद्ध के अभिप्रायों की वास्तविक सफलता को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि कबीलाई समाजों के ध्वंसावशेषों पर उठ खड़ी होने वाली राजसत्ताओं के साथ कबीलाई जीवन के पुराने मूल्य नष्ट हो गए थे। बुद्ध ने इस बात को समझा और अपने समाज को दुखों के समुद्र में तैरते देखा। उन्हें प्रतीत हुआ कि जीवन का मूलतत्व दुख के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।
      एक सुत्त (सूत्र) में बुद्ध कहते हैं, इस संसार में मैं धनिकों को देख रहा हूँ। वे जो वस्तुएं प्राप्त करते हैं, उनमें से कुटिलतावश किसी को कुछ नहीं देते। वे अधिकाधिक धन एकत्र करते जाते हैं और अनंत उपभोग में लीन रहते हैं। राजा धरती के राज्य जीतकर भी, समुद्र के इस पार की धरती का-समुद्र के किनारे तक का-स्वामी होकर भी अतृप्त रहता है और उसकी कामना करता है जो समुद्र के उस पार है। राजा तथा अन्य लोग अतृप्त इच्छाओं के साथ ही मृत्यु के शिकार हो जाते हैं.......न संबंधी, न मित्र, न ही परिचित मरते हुए व्यक्ति को बचाते हैं। उसकी धन-संपत्ति को उत्तराधिकारी ले लेते हैं, किन्तु अपने कर्मों का फल वही भोगता है। कोई भी खजाना, पत्नी या संतान, धन-संपत्ति या राज्य मरनेवाले के साथ नहीं जाता।
      एक अन्य सुत्त में बुद्ध कहते हैं : राज्यों का शासन करने वाले धन-संपत्तिशाली जो नृपति एक-दूसरे को अपने लोभ का शिकार बनाते हैं, वे अतृप्त रूप से अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने में लगे रहते हैं।
      बुद्ध अपने मित्र प्रसेनजित् के पुत्र को पिता से विश्वासघात करते देखा। उनके एक अन्य मित्र सम्राट बिंबसार को उसके पुत्र अजातशत्रु ने कारागृह में भूखा रखकर मार डाला। अजातशत्रु का बध उसके पुत्र उदयभद्र ने किया, उदयभद्र का वध उसके पुत्र अनुरुद्धक ने किया, अनुरुद्धक का बध उसके पुत्र मुंड ने किया और मुंड का वध उसके पुत्र नागदस्सक ने किया।
      ये घटनाएं उन नए मूल्यों की अभिव्यक्ति मात्र थीं, जो राजसत्ता के उदय के साथ समाज में प्रविष्ट हुईं। दूसरे शब्दों में, राज्य के लिए पिता का वध आकस्मिक तथ्य न होकर इन नए मूल्यों के उदय का अनिवार्य परिणाम था। कोसांबी कहते हैं : अर्थशास्त्र (चाणक्य) में राजा व युवराज के बीच इस प्रकार का तनाव सामान्य रूप से स्वीकृत है। राजा को सलाह दी गई है कि युवराज पर कैसे कड़ी नजर रखी जाए और युवराज को सलाह दी गई है कि वह कैसे अपने संशयी पिता को चकमा दे।
      बुद्ध ने इन शक्तियों को देखा था, जो अब जीवन को शासित करने लगी थीं, अतः स्वाभाविक था कि वे हृदय की शांति की इच्छा करते। उन्होंने दीर्घ काल तक घोर चिंतन किया और अंततः उस शांति को पा लिया, जिसकी उन्हें खोज थी। उन्होंने कहा : मैं उस सत्य को जान गया हूं जो गहन है, देखने व समझने में कठिन है, जो हृदय को शांति देता है, जो श्रेष्ठ है। दूसरी ओर लोग वासना के दास हैं, उनका मन वासना में रमता है और वासना में ही उन्हें आनंद मिलता है। उनके लिए कारणकार्य-शृंखला को समझना कठिन होगा। उनके लिए समस्त संस्कारों के अवसान, हृदय की शांति एवं निर्वाण को समझना सबसे कठिन होगा। यदि मैं अपने सिद्धांत का प्रतिपादन करूं और अन्य लोग मेरे उपदेशों को न समझें, तो इससे मुझे थकान तथा क्रोध ही होगा।
      एक महान संकट उत्पन्न हुआ। तथागत का चित्त शांत रहना चाहता है और सिद्धांत का उपदेश नहीं करना चाहता।
      ऐसी कथा मिलती है कि दैवी हस्तक्षेप ने बुद्ध को उठ खड़े होने तथा अपने सिद्धांत का उपदेश करने के लिए प्रेरित किया और लोगों ने उनकी बात सुनी।
निरंकुशता, दमन लोभ, वासना एवं घृणा की शक्तियों से विभाजित विश्व के लिए यह एक न्याय प्रिय राज्य का संदेश था।
काशी नगरी में उन्होंने घोषणा की : यदि तुम मेरे बताए मार्ग पर चलोगे तो शीघ्र ही सत्य को जान लोगे। तुम स्वयं इसे जान लोग और इसका साक्षात्कार करोगे। तुम पवित्र जीवन का वह सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त कर जीवन बिताओ, जिसे प्राप्त करने के लिए श्रेष्ठ युवा संसार का परित्याग करके गृहहीन हो जाते हैं।
दुखों से बचने के लिए बुद्ध ने जो मार्ग दिखाया, उसे प्रायः अष्टांगिक मार्ग (अर्थात् सम्यक् विचार, सम्यक् आचार, सम्यक् वाणी आदि) कहा जाता है, जिसका उनके समकालीन समाज में हनन हो रहा था। कदाचित् बुद्ध स्वयं इस बात को जानते थे कि समाज से समस्त दुखों को हटाने का प्रयास निरर्थक है। अतः उन्होंने सारा ध्यान इस बात पर केंद्रित किया कि नए वर्ग-समाज में ही एक प्रकार के निर्लिप्त जीवों का विकास किया जाए, ताकि स्वतंत्रता, समता तथा बंधुत्व के व्यापक मूल्यों को व्यवहार में लाया जा सके।
महापरिनिव्वान सुत्त में हमें इसका संकेत मिलता है। सम्राट अजातशत्रु वज्जियों के विरुद्ध आक्रमण के लिए कृतसंकल्प था। उसने अपने ब्राह्मण मंत्री को इस प्रकार संबोधित कियाः आनंद, जब तक वज्जि बैठक करते रहेंगे और गण की सभाओं में जाते रहेंगे, (तब तक) आनंद वज्जियों की वृद्धि को समझना, हानि नहीं। इसके अतिरिक्त बुद्ध ने छह अन्य बातें भी बताईं। गणतंत्र प्रणाली के पक्ष में उनका यह समर्थन माना जा सकता है,
भारतीय इतिहास के ऐसे संकटपूर्ण चरण में जबकि तत्कालीन स्वतंत्र कबीलों को निर्दयतापूर्वक नष्ट किया जा रहा था और विस्तृत होती राजसत्तओं के घेरे में लोग नए मूल्यों के उदय का अनुभव कर रहे थे, बुद्ध अपने संघ का संगठन अपने मौलिक सिद्धांतों के आधार पर कर रहे थे और भिक्षुओं को उपदेश दे रहे थे कि वे अपने जीवन को इन्हीं सिद्धांतों के अनुरूप ढालें। बुद्ध ने न केवल सफलतापूर्वक अपने संघों को वर्गपूर्व समाज के सांचे में ढाला अपितु इस बात की भी पूरी सावधानी रखी कि संघों के सदस्य भिक्षु पूर्णतः निर्लिप्त जीवन व्यतीत करें अर्थात् निजी संपत्ति से निर्लिप्त रहें।
दिलचस्प बात यह है कि निजी संपत्ति के प्रति इसी घृणा के कारण बुद्ध ने किसी स्थाई आत्मा की धारणा से इनकार किया। इस बात को श्रेच्रबात्सकी ने स्पष्ट किया हैः आत्मा के अस्तित्व से इनकार करके बौद्धमत निजी संपत्ति के निषेध को एक गहन दार्शनिक आधार प्रदान करता है। जब व्यक्तित्व ही न हो तो निजी संपत्ति कैसी। इस कारण एक सच्चा बौद्व वही है जो निजी संपत्ति का और निजी संपत्ति की नहीं बल्कि परिवार व घर आदि का भी सदा-सदा के लिए त्याग कर चुका हो। विश्व-धर्मों-ईसायत व इस्लाम-के इतिहास में अक्सर संपत्ति का निषेध करने और उसे त्यागने की सलाह देने वाले सिद्धांत मिलते हैं, लेकिन बौद्धमत इस प्रश्न की सर्वाधिक मूलगामी विवेचना करता है।
      बुद्ध का मत बिल्कुल स्पष्ट है कि राजा का कर्त्तव्य नैतिक तथा आध्यात्मिक मूल्यों को बढ़ावा देना हैं वह अपने नागरिकों के लिए ऐसी राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था करे, जिसमें रहकर गृहस्थ एवं प्रव्रजित सभी लोग धर्म के अनुसार अपना जीवनयापन कर सकें। बुद्ध ने जाति प्रथा का विरोध करते हुए प्रचलित धर्म व न्याय को एक नया रूप दिया है। उन्होंने राजनीति को धर्म से, विज्ञान को मिथकों से, बोध को विश्वास से, वर्ग को वर्ण से, सही को गलत से बिल्कुल अलग किया।
बुद्ध पहले महान चिंतक थे, जिन्होंने ब्राह्मणवादी दर्शन और उसके सिद्धांतों का विरोध करते हुए नितांत मौलिक तथा वैज्ञानिक उपदेश दिए। उनके धर्म तथा दर्शन ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को ललकारा। उन्होंने समझा कि समाज के तमाम तबके धार्मिक तानाशाही का शिकार होने वाले हैं। एक जाति या संगठन के लोग शेष समाज में जनता तथा ईश्वर के बीच संवाद के अधिकार पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर रहे थे, इसलिए उन्होंने नियोजित रूप से पुरोहितों के अधिकार समाप्त करने और एक ऐसे समाज का निर्माण करने पर बल दिया, जहां मानवता अपने को प्रस्फुटित कर सके। किसी जाति-विशेष की जगह उन्होंने बहुजन हिताय बहुजन सुखायकी पैरवी की। जाति के स्थान पर उन्होंने जनता को प्रधानता दी। यहां बुद्ध ने अपना दर्शन ग्रीक दार्शनिक-विचारकों की वर्ग-नैतिकता तथा पूर्वी जगत के कन्फ्यूशियस, कौटिल्य एवं मनु की ऊंच-नीचवादी नैतिकता के विरुद्ध खड़ा किया। यथार्थ के धरातल पर उनका मध्यम मार्ग जन-आंदोलन बन गया।
बुद्ध के मार्ग की आधारशिला आदमी-आदमी का परस्पर मधुर संबंध ही है।
भिक्षु-संघ की स्थापना का उद्देश्य एक वर्ग निरपेक्ष आदर्श मनुष्य का निर्माण अथवा आदर्श समाज-सेवकों की रचना करना था, जो जनता के सहायक, मित्र मार्गदर्शक तथा दार्शनिक एक साथ हों। एक भिक्षु के जीवन का लक्ष्य व्यक्तिगत साधना के साथ-साथ लोगों की सेवा भी है। बिना व्यक्तिगत साधना के वह नेतृत्व नहीं कर सकता, इसलिए उसे एक संपूर्ण सर्वश्रेष्ठ धार्मिक तथा ज्ञानसंपन्न व्यक्ति बनना ही होगा। इसके लिए व्यक्तिगत साधना करनी ही होगी। भिक्षु गृहत्याग करता है, संसारत्याग नहीं करता। वह अपने घर को इसलिए छोड़ता है ताकि उसे उन लोगों की सेवा करने का अवसर मिल सके, जो बुरी तरह आसक्त हैं और जो दुख में पड़े हैं, चिंता में पड़े हैं, जिन्हें चैन नहीं है और जिन्हें सहायता की अपेक्षा है।
      यदि भिक्षु एक संपूर्ण मनुष्य मात्र बना रहे तो उसका धर्म-प्रचार के कार्य में कोई उपयोग नहीं, क्योंकि वह संपूर्ण मनुष्य होने के बावजूद एक स्वार्थी आदमी ही बना रहेगा। दूसरी ओर यदि वह समाज-सेवक भी है, तो उससे बौद्धधर्म भी कुछ आशा रख सकता है।
      राज्य और बुद्ध-अनुयाइयों का आपसी संबंध इस प्रकार होना चाहिए कि अनुयाइयों को अपने सिद्धांतों के अनुसार जीवन-यापन करने की और उनका प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता हो। बौद्धधर्म अपने अनुयाइयों के लौकिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता। वह केवल सत्य का उपदेश देता है।
     
      डॉ0 अंबेडकर ने निष्कर्ष निकाला कि बौद्धधर्म प्रजातंत्रात्मक विचारों का स्कूल था। अंबेडकर के अनुसार, गौतम बुद्ध प्राचीन भारत के पहले चिंतक थे, जिन्होंने जातिप्रथा के विरोध में अपने विचार रखे। उन्होंने भारतीय समाज की तमाम विडंबनाओं को देखा और उनके विरोध में खड़े हुए।
      बुद्ध का संघम् शरणम् गच्छामिस्पष्ट करता है कि वह राज्य के या व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के विरुद्ध थे। संघ के मूल में सादगी थी। आवश्यकताएं कम-से-कम थीं। सब जातियों के लोग एक समान जीवन जीते थे। कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं।

      सिद्धांतों के स्तर पर स्त्रियों को संघ में शामिल करके बुद्ध ने पुरुषों तथा स्त्रियों की समानता के संबंध में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया। ब़ुद्ध ने कहा कि स्त्रियाँ भी निर्वाण प्राप्त कर सकती हैं। स्त्री-बुद्धजीवियों की पहली खेप संघ से ही निकली, जिसमें आम्रपाली, सुमनाला, मथिका, ईसीदासी, शुभा आदि प्रमुख थीं।
(शैलेंद्र प्रताप सिंह की किताब -बुद्ध के बढ़ते कदम से साभार )