बुधवार, 17 दिसंबर 2014

सभ्यता समीक्षा का दिन /सदानंद शाही


आज फिर सोलह दिसंबर है .यह हमारे लिए  सभ्यता समीक्षा का दिन है .दो साल पहले राजधानी दिल्ली में बलात्कार के प्रयास का विरोध कर रही लड़की की जघन्य हत्या की घटना मन  को कचोटती है .नर पशुओं की हवस के आगे आत्मसमर्पण करने की बजाय उसने प्रतिरोध का साहस दिखाया और अपने सम्मान के लिए जान गवाना कुबूल किया .दिसंबर की कडकडाती ठंढ में पूरे देश में उबाल आ गया था .इस शहादत के साथ पूरा देश खड़ा हो गया  .धरने हुए ,प्रदर्शन हुए ,चुनावी मुद्दा बना ,क़ानून बने ,निर्भया  फंड बना ,यहाँ तक कि देश की सरकार भी  बदल गयी .लेकिन आज दो साल बाद भी ढाक के वही तीन पात बचे हुए हैं  .मीडिया और सरकार ने उस लड़की को निर्भया या दामिनी कह कर महिमा मंडित तो किया लेकिन उसकी मूल पहचान दुनिया से गायब कर दी गयी .
ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि हमारा समाज यह सोचता है कि लडकी के साथ अगर छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार हुआ है तो कहीं न कहीं वह खुद  ही दोषी है .जब यह शर्मशार कर देने वाली घटना हुयी थी उस समय भी  कुछ नासेह जगह जगह उपदेश देने में लगे हुए थे कि महिलाओं को कैसे रहना चाहिए, कैसे व्यवहार करना चाहिए आदि आदि .महिलाओं के लिए ड्रेस कोड तय करने वालों की कमी न तब थी न अब है .हमारे समाज का सामान्य बोध (कोमन सेंस )आज भी यही बना हुआ है कि महिलायें अपने हाव भाव और परिधान से पुरुषों को अभद्र व्यवहार करने के लिए उकसाती हैं और जब कुछ हो जाता है तो बेवजह हल्ला मचाती हैं.
इसी  सामान्य बोध के नाते स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार और अपराध आये दिन हो रहे हैं .   इसी महीने  टैक्सी में हुयी बलात्कार की घटना ने दिल्ली को फिर शर्मसार किया है .सड़क से संसद तक फिर हंगामा हुआ .लेकिन दुर्भाग्य से इसकी परिणति भी ऐसे ही प्रश्नों में  उलझकर रह  गयी कि इतनी रात गए वह लड़की क्यों यात्रा कर रही थी?क्यों नहीं उसने अपने घर से किसी को बुला लिया या फिर अपने ब्वाय फ्रेंड को बुला लिया  .अब पुरुष तो ऐसे हैं ही ,समाज तो ऐसा है ही ,इसलिए महिलाओं को अपना ख्याल रखना चाहिए आदि आदि . यानी हमारी रूचि ऐसा समाज बनने की नहीं है जिसमे कोई महिला कहीं भी बेख़ौफ़ आ जा सके.ऐसे में  चाहे लाख क़ानून बन जाएँ ,  जब तक ऐसी असभ्य दलीलें दी जाती रहेंगी तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है .
सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जितनी बहस हो जाए ,हमारी आत्मा की कालिमा को दूर करने के लिए चाहे जितनी मोमबत्तियां जला दी जाएँ ,ऐसी घटनाओं से उपजे  तात्कालिक उबाल के शांत होते ही घटना की जिम्मेदारी अनिवार्यत: पीड़ित स्त्री पर डाल दी जाती है .जले पर नमक यह कि अपराधी पुरुष को महिला के उकसावे का मासूम शिकार मान लिया जाता है .
नवम्बर में हरियाणा में दो बहनों पूजा और आरती के साथ घटी घटना भी इसी बात को पुष्ट करती है .सार्वजनिक  स्थानों पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बेहूदगी की वारदात मानसिक महामारी की तरह फैली है .यातायात के साधनों में ही नहीं कार्यस्थल से लेकर सामान्य बाजार मेले ठेले और अत्याधुनिक शोपिंग माल तक इस महामारी के दर्शन होते रहते हैं .लेकिन ऐसा कम होता है कि लड़कियों की ओर से जवाबी कारवाई हो और वह भी ऐसी जोरदार कि शोहदों के पसीने छूट जाएँ .दो-तीन दिन तक तो  इलेक्ट्रानिक मीडिया पर सबसे पहले यह वीडियो दिखाने और बहस करने की होड़ लगी हुई थी .लेकिन जैसे ही एक दूसरा वीडियो सामने आया बहस की दिशा ही बदल गयी .कहा और बताया जाने लगा कि दर असल दोनों बहने ही गडबड हैं . उन्हें कोर खोज कर मार पीट करने और विडिओ बनाने की लत है .हरियाणा सरकार को भी इस मामले में पलटी खाने में तनिक देर नहीं लगी .हमारा सामान्य बोध एक बार फिर हाबी हो गया –‘दोष तो लड़कियों का ही होगा’ .
हमारे समाज में लड़कियां तभी तक दोषी नहीं हैं जब तक वे शर्मीली लजीली बनी रहें और चुपचाप अन्याय सहती रहें .आये दिन होने वाली छेड़छाड़ से लेकर गंभीर और हिंसक अपराधों  को बर्दाश्त करती रहें .लोकलाज के डर से कुछ न कहें .ऐसी ही लड़कियों या महिलाओं को भली होने के ख़िताब से नवाजा जायेगा .
समय बदला ,समाज बदला लेकिन स्त्री सुबोधिनी का पाठ नहीं बदला .इस पाठ का लब्बोलुबाब यह कि समाज में जिसकी सत्ता है उसका दोष देखना हिमाकत है .महिलाओं को  अपना दोष देखना चाहिए और ऐसा कुछ भी करने से बाज आना चाहिए जिससे बेचारे पुरुष को बलात्कार या छलात्कार करने का उकसावा मिलता हो .फिर भी अगर उसने कोई हरकत कर ही दी तो ‘समरथ के नहि दोस गुसाईं जैसी पंक्य्तियाँ याद करके चुप लगा लेना चाहिए .स्त्री सुबोधिनी का यह पाठ आज भी हमारा सामान्य बोध बना हुआ है .
वक्त आ गया है की स्त्री सुबोधिनी का यह पाठ बदल दिया जाए .इन पंक्तियों को लिखते समय मुझे पंजाबी लेखक गुरुबख्श सिंह प्रीतलड़ी का एक लेख याद आ रहा है –‘स्त्री के प्रति व्यवहार सभ्यता की परीक्षा है’ .इस लेख में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू का यह वक्तव्य उद्धृत किया है –“किसी जाति में स्त्रियों का स्थान उस जाति की प्रगति के सबसे जरुरी  मापदंडों में से एक है .राजनीतिक क्रांति से कहीं अधिक आर्थिक क्रांति की आवश्यकता है .परन्तु सामजिक क्रांति इन दोनों से भी कहीं अधिक अनिवार्य है .इस प्रकार की क्रांति केवल नारी द्वारा ही संभव है .ऐसी क्रांति के योग्य बनने के लिए उन्हें उन बंधनों से मुक्त होना आवश्यक है जिन बंधनों में समाज ने उन्हें जकड रखा है .........मुझे इसमें रंच मात्र भी शंका नहीं है की भारत भी अपनी उन्नति को स्त्री की स्वतंत्रता के साथ नापा करेगा .’
विकास की जिस महायात्रा में हमारा देश हांक दिया गया है उसमे थोडा ठहर कर उन्नति शब्द पर विचार करें और देखें की क्या हमारा  समाज उन्नत समाज कहलाने का हक़दार है ?स्त्री के साथ दुर्व्यवहार और अपराध के सामाजिक ,आर्थिक,कर्मकांडी और आध्यात्मिक सभी तरह के सन्दर्भ मौजूद हैं .इन सन्दर्भों ने हमारे दिमाग को इस तरह अनुकूलित कर दिया है की हम यह सोच ही नहीं पाते कि हम जो कह या कर रहे हैं- वह असभ्यता है .अपने किये को महिमा मंडित करने के इतने आप्त  वचन हमारे पास हैं कि घृणित से घृणित आचरण करते हुए हम कुंठित या अवमानित नहीं होते .उलटे हम भुक्तभोगी को ही लांछित करार दे देते हैं .दामिनी या निर्भया जैसे शब्दों से उस लड़की का मूल नाम छिपाने के पीछे हमारा यही मनोविज्ञान काम कर रहा है .

मेरा प्रस्ताव है कि आज के दिन को हम सभ्यता समीक्षा के दिन के तौर पर देखें .अपने चेतन और अवचेतन को झकझोर कर देखें कि वहां स्त्री के लिए कैसे भाव मौजूद हैं ?.क्या हमारे भाव सभ्य कहे जाने योग्य हैं ?क्या बिना किसी पाखण्ड के हम स्त्री के प्रति बराबरी का भाव विकसित कर पाए हैं ? 

भिखारी ठाकुर की आवाज/सदानंद शाही



अभी अभी मैं भिखारी ठाकुर की जन्मभूमि और कर्मभूमि छपरा से लौटा हूँ ।मेरे मित्र और भिखारी ठाकुर रचनावली के प्रधान संपादक प्रो वीरेंद्र नारायण यादव ने बताया कि यहाँ भिखारी ठाकुर की जयंती मनाने की तैयारियां ज़ोर शोर से चल रही हैं । छपरा, सिवान आरा से लेकर पटना तक एक साथ नौ-दस नगरों और उपनगरों मे तरह तरह के आयोजन हो रहे हैं । ठिठुरते जाड़े में खुले मैदान में नाट्य प्रस्तुतियाँ होने वाली हैं । यह सारा आयोजन स्वत:स्फूर्त है । मुझे अपने बचपन की कुछ बातें याद हो आयीं । गाँव में जब तब भिखारी ठाकुर की चर्चा करते हुये लोग मिल जाते थे ।  चर्चा इस बात की होती कि भिखरिया के नांच में किस कदर भीड़ उमड़ती थी और किस तरह लोग पागल हो उठते थे और कैसे व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासन को नाकों चना  चबाना  पड़ता  था । भिखारी ठाकुर दिलोदिमाग में किसी लिजेंड की तरह बने  हुये हैं ।  केदारनाथ सिंह की कविता  भिखारी ठाकुर ने  इस भाव को और गहन बनाया  है ।  उनकी कविता  भिखारी ठाकुर के नांच को आजादी की लड़ाई से और विदेशिया  की लय को राष्ट्रगान की लय से ही नहीं बल्कि भिखारी ठाकुर को  गांधी से जोड़ती  है। गांधी और भिखारी ठाकुर में  क्या समानता हो सकती है ,इस पर विचार करने का मन हो रहा है ?


छपरा जिले के छोटे से गाँव कुतुबपुर से भिखारी ठाकुर खड़गपुर (पश्चिम बंगाल )गए ।  उन दिनों  आजीविका की तलाश में  लोग बाग कलकत्ता (अब कोलकाता )जाते थे । वहीं पर भिखारी ठाकुर को नाटक नौटंकी की लगन लगी । वहाँ से  थोड़े दिन बाद भिखारी कुतुबपुर लौट आए । विदेसिया के प्रमुख पात्र विदेसी की तरह भिखारी को भी यकीन हो चला था -क़हत भिखारी भिखार होई गइलीं दौलत बहुत कमा के । बहुत दौलत कमा लेने के बाद  मैं दरिद्र हो गया हूँ  । जैसे दौलत की अधिकता दरिद्रता की निशानी हो यह दरिद्रता सांस्कृतिक दरिद्रता है । दौलत ने मानवीय सम्बन्धों का अपहरण  कर लिया है ।
प्रेमचंद ने अपने समय में विकसित हो रही  महाजनी सभ्यता  के लक्षणों  को ठीक से पहचाना था-धन लोभ ने मानव –भावों को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया है । कुलीनता और शराफत ,गुण और कमाल की कसौटी पैसा और केवल पैसा है । जिसके पास पैसा है वह देवता स्वरूप है ,उसका अंत:करण कितना भी काला क्यों न हो । साहित्य संगीत और काला सभी धन की देहली पर माथा टेकने वालों में  हैं /   प्रेमचंद ने देखा कि महाजनी सभ्यता में मानवीय मूल्य और व्यक्तिगत कौशल की वकत घटती गयी है ।धन की चमक  अंत:करण की कालिमा को छुपा दे रही है । मानवीय गरिमा चंद सिक्कों के सामने अपना अस्तित्व खो बैठी है । इस सभ्यता में धनलिपसा इस कदर बढ़ी हुयी है कि मनुष्यता ,मित्रता ,स्नेह सहानुभूति सबको निगल गयी है ।
यह देख कर सुखद आश्चर्य होता है कि   भिखारी ठाकुर भी  महाजनी सभ्यता की खूबियों को बखूबी पहचानते हैं । महज इस एक पंक्ति से वे  महाजनी सभ्यता की अत्यंत  मार्मिक आलोचना प्रस्तुत करते हैं  । वे अच्छी तरह जानते हैं कि पूंजी केन्द्रित विकास की अवधारणा हमें सांस्कृतिक रूप से दरिद्र बनाए दे रही है । हमारी मानवीय संवेदना महज अकादमिक चर्चा तक  महदूद रह  गयी  है । भिखारी ठाकुर अपने पूरे साहित्य में सांस्कृतिक विपन्नता को जन्म देने वाली ऐसी सभ्यता की आलोचना करते हैं । बिरहा बहार रचना में भिखारी ठाकुर ने लक्ष्मी की वंदना में एक अद्भुत छंद लिखा   है-
सिंधु की कुमारी देख दीनता हमारी ,वर्षा औ धूप जाड़ा तीनों सहना पड़ा।
जोहना पड़ा आनंदहि दिमागदार लोगन को ,अधम अबुधन को बोल सहना पड़ा ।
कहे बिहारी कवि लछमी तुम्हारे हेतु ,भारी भारी चूतियन को चतुर कहना पड़ा ।
हे लक्ष्मी ! हमारी दीनता देखो कि जाड़ा गर्मी बरसात सब सहन करना  पड़ रहा है। दिमाग वाले लोगों का जोहार करना पड़ रहा है। अधम और मूर्ख लोगों का बोल सुनना पड़ रहा है । तुम्हारे लिए बड़े बड़े मूर्खों और दुष्ट जनों को चतुर कहना पड़ रहा है ।   इस सभ्यता  ने धन का महत्व इतना बढ़ा दिया है कि उन्नत से उन्नत मानवीय गुण ,कला ,संगीत, साहित्य सब के सब हीन हो गए हैं ।
फैज अहमद फैज ने गालिब की मशहूर गजल –मुद्दत हुयी है यार को मेहमाँ किए  हुए /जोशे-कदह से बज़्म चरागां किए हुए  की व्याख्या के क्रम में बताते हैं कि-गालिब एक खास जीवन व्यवस्था के और जीने के तौर तरीके से वाकिफ थे । अंग्रेजों के आने और मुल्क के गुलामी में चले जाने कि वजह से वह पुरानी व्यवस्था ,वह पुराने तौर तरीके ,वह पुराने अदबे-महफिल रुखसत हो चुके थे,और उनकी जगह कोई नयी व्यवस्था या जीवन के नए आचार व्यवहार समाज में नहीं आए थे । चुनांचे उन्नीसवीं सदी में सन 1857 के हंगमों से पहले और उन हंगमों के बाद का जो ज़माना है,और उस जमाने के लोगों की जो सामाजिक बौद्धिक और भावनात्मक कैफियत है उसे एक तरीके से गालिब ने शेर में बयान किया है –कि,मुद्दत से न वो महफिलें रहीं ,न वो आदाब (शिष्टाचार )बाक़ी हैं और न वो यार दोस्त बचे हैं ,जिनकी वजह से हमारी जिंदगी में हरियाली थी और उमंग और आनंद के सामान ।   अंग्रेजों ने  एक अत्यंत विकसित  तहजीब को निर्ममता पूर्वक खत्म कर दिया था । जिसके खत्म होने और उसकी जगह कोई नयी तहजीब विकसित न हो पाने से उपजे दर्द का बयान गालिब की कविता में है ।प्रेमचंद और भिखारी ठाकुर के सामने वह नयी तहजीब आ गयी है । यह ऐसी तहजीब है जो मानसिक –सांस्कृतिक दारिद्र्य पैदा कर रही है। प्रेमचंद और भिखारी ठाकुर के सामने इस  मानसिक –सांस्कृतिक दारिद्र्य   की चुनौती है ।    
 भिखारी ठाकुर इस चुनौती को बेहद ठेठ तरीके से स्वीकार करते हैं । वे राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के केंद्र  कलकत्ता से अपने गाँव कुतुबपुर लौट आते हैं ।कुतुबपुर आकर  भिखारी ने अपनी नाटक मंडली बनायी  और उसके माध्यम से नयी पनप रही सभ्यता की समीक्षा करने लगे   । व्यंग्य उनका सबसे प्रमुख औज़ार  है ।   भिखारी ठाकुर का  व्यंग्य दरअसल  भोजपुरी भाषा की अपार रचनात्मक संभावना का अर्क है ।  भोजपुरी जीवन और समाज को भिखारी ठाकुर अच्छी तरह जानते तो  थे ही ,कुछ दिन कलकत्ता रहकर  उसे पहचान भी गए । उसकी खूबियों को ही नहीं खामियों को भी ,सरल सरस जीवन संगीत में छुपी विसंगतियों और विडंबनाओं को भी ।कठिन बीहड़ जीवन स्थितियों की दयनीयता और बेचारगी को धता बताती उद्दाम जिजीविषा को भी  । जिस तरह गांधी को भारत को देखने की नज़र दक्षिण अफ्रीका में  मिली उसी तरह भिखारी ठाकुर को खड़गपुर -कलकत्ता प्रवास में अपने समाज को देखने की नजर हासिल हुयी । प्रिय और अतिपरिचित को देखने के लिए एक वस्तुगत दूरी चाहिए ही होती है ।  अपने नाटकों में भिखारी ठाकुर ने नयी नज़र से देखे सुने अपने गाँव-समाज का अंकन किया है ।इसीलिए भिखारी ठाकुर के नांच में  लोगों को मुक्ति का संगीत सुनाई पड़ा । उन्हें लोगों का बेशुमार प्यार हासिल हुआ ।  गांधी की तरह भिखारी ठाकुर को इस बात का इल्म था कि गांवों को बेहाल कर के देश का विकास नहीं हो सकता । दिल्ली कलकत्ता और पटना से गाँव को देखना एक बात है ,गाँव मे जाकर उसे देखना बिलकुल अलग बात है । गाँव  की आवाज दुनिया को सुनाने के लिए गांधी सेवाग्राम से बोलते हैं तो भिखारी ठाकुर कुतुबपुर से –क़हत भिखारी कुतुबपुर के नया गीत बनवइयासेवाग्राम से  गांधी की आवाज सारी दुनिया के साम्राज्यवादियों ने सुना  उनके चेलों को छोडकर । क्या वैसे ही हम भिखारी ठाकुर की आवाज को अनसुना कर रहे हैं ?
यह बात मेरे मन में इसलिए आ रही है कि भोजपुरी के नए उभार के दौर में भिखारी ठाकुर की आवाज गांवों से गायब हो गयी है । भोजपुरी के चालू फूहड़   गीतों के माध्यम से गाँव गाँव में वही  सांस्कृतिक विपन्नता और दैन्य  परोसा  जा रहा  है जिसे  भिखारी ठाकुर  ने चुनौती दी थी ।   

भिखारी ठाकुर की आवाज/सदानंद शाही



अभी अभी मैं भिखारी ठाकुर की जन्मभूमि और कर्मभूमि छपरा से लौटा हूँ ।मेरे मित्र और भिखारी ठाकुर रचनावली के प्रधान संपादक प्रो वीरेंद्र नारायण यादव ने बताया कि यहाँ भिखारी ठाकुर की जयंती मनाने की तैयारियां ज़ोर शोर से चल रही हैं । छपरा, सिवान आरा से लेकर पटना तक एक साथ नौ-दस नगरों और उपनगरों मे तरह तरह के आयोजन हो रहे हैं । ठिठुरते जाड़े में खुले मैदान में नाट्य प्रस्तुतियाँ होने वाली हैं । यह सारा आयोजन स्वत:स्फूर्त है । मुझे अपने बचपन की कुछ बातें याद हो आयीं । गाँव में जब तब भिखारी ठाकुर की चर्चा करते हुये लोग मिल जाते थे ।  चर्चा इस बात की होती कि भिखरिया के नांच में किस कदर भीड़ उमड़ती थी और किस तरह लोग पागल हो उठते थे और कैसे व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासन को नाकों चना  चबाना  पड़ता  था । भिखारी ठाकुर दिलोदिमाग में किसी लिजेंड की तरह बने  हुये हैं ।  केदारनाथ सिंह की कविता  भिखारी ठाकुर ने  इस भाव को और गहन बनाया  है ।  उनकी कविता  भिखारी ठाकुर के नांच को आजादी की लड़ाई से और विदेशिया  की लय को राष्ट्रगान की लय से ही नहीं बल्कि भिखारी ठाकुर को  गांधी से जोड़ती  है। गांधी और भिखारी ठाकुर में  क्या समानता हो सकती है ,इस पर विचार करने का मन हो रहा है ?


छपरा जिले के छोटे से गाँव कुतुबपुर से भिखारी ठाकुर खड़गपुर (पश्चिम बंगाल )गए ।  उन दिनों  आजीविका की तलाश में  लोग बाग कलकत्ता (अब कोलकाता )जाते थे । वहीं पर भिखारी ठाकुर को नाटक नौटंकी की लगन लगी । वहाँ से  थोड़े दिन बाद भिखारी कुतुबपुर लौट आए । विदेसिया के प्रमुख पात्र विदेसी की तरह भिखारी को भी यकीन हो चला था -क़हत भिखारी भिखार होई गइलीं दौलत बहुत कमा के । बहुत दौलत कमा लेने के बाद  मैं दरिद्र हो गया हूँ  । जैसे दौलत की अधिकता दरिद्रता की निशानी हो यह दरिद्रता सांस्कृतिक दरिद्रता है । दौलत ने मानवीय सम्बन्धों का अपहरण  कर लिया है ।
प्रेमचंद ने अपने समय में विकसित हो रही  महाजनी सभ्यता  के लक्षणों  को ठीक से पहचाना था-धन लोभ ने मानव –भावों को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लिया है । कुलीनता और शराफत ,गुण और कमाल की कसौटी पैसा और केवल पैसा है । जिसके पास पैसा है वह देवता स्वरूप है ,उसका अंत:करण कितना भी काला क्यों न हो । साहित्य संगीत और काला सभी धन की देहली पर माथा टेकने वालों में  हैं /   प्रेमचंद ने देखा कि महाजनी सभ्यता में मानवीय मूल्य और व्यक्तिगत कौशल की वकत घटती गयी है ।धन की चमक  अंत:करण की कालिमा को छुपा दे रही है । मानवीय गरिमा चंद सिक्कों के सामने अपना अस्तित्व खो बैठी है । इस सभ्यता में धनलिपसा इस कदर बढ़ी हुयी है कि मनुष्यता ,मित्रता ,स्नेह सहानुभूति सबको निगल गयी है ।
यह देख कर सुखद आश्चर्य होता है कि   भिखारी ठाकुर भी  महाजनी सभ्यता की खूबियों को बखूबी पहचानते हैं । महज इस एक पंक्ति से वे  महाजनी सभ्यता की अत्यंत  मार्मिक आलोचना प्रस्तुत करते हैं  । वे अच्छी तरह जानते हैं कि पूंजी केन्द्रित विकास की अवधारणा हमें सांस्कृतिक रूप से दरिद्र बनाए दे रही है । हमारी मानवीय संवेदना महज अकादमिक चर्चा तक  महदूद रह  गयी  है । भिखारी ठाकुर अपने पूरे साहित्य में सांस्कृतिक विपन्नता को जन्म देने वाली ऐसी सभ्यता की आलोचना करते हैं । बिरहा बहार रचना में भिखारी ठाकुर ने लक्ष्मी की वंदना में एक अद्भुत छंद लिखा   है-
सिंधु की कुमारी देख दीनता हमारी ,वर्षा औ धूप जाड़ा तीनों सहना पड़ा।
जोहना पड़ा आनंदहि दिमागदार लोगन को ,अधम अबुधन को बोल सहना पड़ा ।
कहे बिहारी कवि लछमी तुम्हारे हेतु ,भारी भारी चूतियन को चतुर कहना पड़ा ।
हे लक्ष्मी ! हमारी दीनता देखो कि जाड़ा गर्मी बरसात सब सहन करना  पड़ रहा है। दिमाग वाले लोगों का जोहार करना पड़ रहा है। अधम और मूर्ख लोगों का बोल सुनना पड़ रहा है । तुम्हारे लिए बड़े बड़े मूर्खों और दुष्ट जनों को चतुर कहना पड़ रहा है ।   इस सभ्यता  ने धन का महत्व इतना बढ़ा दिया है कि उन्नत से उन्नत मानवीय गुण ,कला ,संगीत, साहित्य सब के सब हीन हो गए हैं ।
फैज अहमद फैज ने गालिब की मशहूर गजल –मुद्दत हुयी है यार को मेहमाँ किए  हुए /जोशे-कदह से बज़्म चरागां किए हुए  की व्याख्या के क्रम में बताते हैं कि-गालिब एक खास जीवन व्यवस्था के और जीने के तौर तरीके से वाकिफ थे । अंग्रेजों के आने और मुल्क के गुलामी में चले जाने कि वजह से वह पुरानी व्यवस्था ,वह पुराने तौर तरीके ,वह पुराने अदबे-महफिल रुखसत हो चुके थे,और उनकी जगह कोई नयी व्यवस्था या जीवन के नए आचार व्यवहार समाज में नहीं आए थे । चुनांचे उन्नीसवीं सदी में सन 1857 के हंगमों से पहले और उन हंगमों के बाद का जो ज़माना है,और उस जमाने के लोगों की जो सामाजिक बौद्धिक और भावनात्मक कैफियत है उसे एक तरीके से गालिब ने शेर में बयान किया है –कि,मुद्दत से न वो महफिलें रहीं ,न वो आदाब (शिष्टाचार )बाक़ी हैं और न वो यार दोस्त बचे हैं ,जिनकी वजह से हमारी जिंदगी में हरियाली थी और उमंग और आनंद के सामान ।   अंग्रेजों ने  एक अत्यंत विकसित  तहजीब को निर्ममता पूर्वक खत्म कर दिया था । जिसके खत्म होने और उसकी जगह कोई नयी तहजीब विकसित न हो पाने से उपजे दर्द का बयान गालिब की कविता में है ।प्रेमचंद और भिखारी ठाकुर के सामने वह नयी तहजीब आ गयी है । यह ऐसी तहजीब है जो मानसिक –सांस्कृतिक दारिद्र्य पैदा कर रही है। प्रेमचंद और भिखारी ठाकुर के सामने इस  मानसिक –सांस्कृतिक दारिद्र्य   की चुनौती है ।    
 भिखारी ठाकुर इस चुनौती को बेहद ठेठ तरीके से स्वीकार करते हैं । वे राजनीतिक और आर्थिक सत्ता के केंद्र  कलकत्ता से अपने गाँव कुतुबपुर लौट आते हैं ।कुतुबपुर आकर  भिखारी ने अपनी नाटक मंडली बनायी  और उसके माध्यम से नयी पनप रही सभ्यता की समीक्षा करने लगे   । व्यंग्य उनका सबसे प्रमुख औज़ार  है ।   भिखारी ठाकुर का  व्यंग्य दरअसल  भोजपुरी भाषा की अपार रचनात्मक संभावना का अर्क है ।  भोजपुरी जीवन और समाज को भिखारी ठाकुर अच्छी तरह जानते तो  थे ही ,कुछ दिन कलकत्ता रहकर  उसे पहचान भी गए । उसकी खूबियों को ही नहीं खामियों को भी ,सरल सरस जीवन संगीत में छुपी विसंगतियों और विडंबनाओं को भी ।कठिन बीहड़ जीवन स्थितियों की दयनीयता और बेचारगी को धता बताती उद्दाम जिजीविषा को भी  । जिस तरह गांधी को भारत को देखने की नज़र दक्षिण अफ्रीका में  मिली उसी तरह भिखारी ठाकुर को खड़गपुर -कलकत्ता प्रवास में अपने समाज को देखने की नजर हासिल हुयी । प्रिय और अतिपरिचित को देखने के लिए एक वस्तुगत दूरी चाहिए ही होती है ।  अपने नाटकों में भिखारी ठाकुर ने नयी नज़र से देखे सुने अपने गाँव-समाज का अंकन किया है ।इसीलिए भिखारी ठाकुर के नांच में  लोगों को मुक्ति का संगीत सुनाई पड़ा । उन्हें लोगों का बेशुमार प्यार हासिल हुआ ।  गांधी की तरह भिखारी ठाकुर को इस बात का इल्म था कि गांवों को बेहाल कर के देश का विकास नहीं हो सकता । दिल्ली कलकत्ता और पटना से गाँव को देखना एक बात है ,गाँव मे जाकर उसे देखना बिलकुल अलग बात है । गाँव  की आवाज दुनिया को सुनाने के लिए गांधी सेवाग्राम से बोलते हैं तो भिखारी ठाकुर कुतुबपुर से –क़हत भिखारी कुतुबपुर के नया गीत बनवइयासेवाग्राम से  गांधी की आवाज सारी दुनिया के साम्राज्यवादियों ने सुना  उनके चेलों को छोडकर । क्या वैसे ही हम भिखारी ठाकुर की आवाज को अनसुना कर रहे हैं ?
यह बात मेरे मन में इसलिए आ रही है कि भोजपुरी के नए उभार के दौर में भिखारी ठाकुर की आवाज गांवों से गायब हो गयी है । भोजपुरी के चालू फूहड़   गीतों के माध्यम से गाँव गाँव में वही  सांस्कृतिक विपन्नता और दैन्य  परोसा  जा रहा  है जिसे  भिखारी ठाकुर  ने चुनौती दी थी ।