बुधवार, 17 दिसंबर 2014

सभ्यता समीक्षा का दिन /सदानंद शाही


आज फिर सोलह दिसंबर है .यह हमारे लिए  सभ्यता समीक्षा का दिन है .दो साल पहले राजधानी दिल्ली में बलात्कार के प्रयास का विरोध कर रही लड़की की जघन्य हत्या की घटना मन  को कचोटती है .नर पशुओं की हवस के आगे आत्मसमर्पण करने की बजाय उसने प्रतिरोध का साहस दिखाया और अपने सम्मान के लिए जान गवाना कुबूल किया .दिसंबर की कडकडाती ठंढ में पूरे देश में उबाल आ गया था .इस शहादत के साथ पूरा देश खड़ा हो गया  .धरने हुए ,प्रदर्शन हुए ,चुनावी मुद्दा बना ,क़ानून बने ,निर्भया  फंड बना ,यहाँ तक कि देश की सरकार भी  बदल गयी .लेकिन आज दो साल बाद भी ढाक के वही तीन पात बचे हुए हैं  .मीडिया और सरकार ने उस लड़की को निर्भया या दामिनी कह कर महिमा मंडित तो किया लेकिन उसकी मूल पहचान दुनिया से गायब कर दी गयी .
ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि हमारा समाज यह सोचता है कि लडकी के साथ अगर छेड़छाड़ या दुर्व्यवहार हुआ है तो कहीं न कहीं वह खुद  ही दोषी है .जब यह शर्मशार कर देने वाली घटना हुयी थी उस समय भी  कुछ नासेह जगह जगह उपदेश देने में लगे हुए थे कि महिलाओं को कैसे रहना चाहिए, कैसे व्यवहार करना चाहिए आदि आदि .महिलाओं के लिए ड्रेस कोड तय करने वालों की कमी न तब थी न अब है .हमारे समाज का सामान्य बोध (कोमन सेंस )आज भी यही बना हुआ है कि महिलायें अपने हाव भाव और परिधान से पुरुषों को अभद्र व्यवहार करने के लिए उकसाती हैं और जब कुछ हो जाता है तो बेवजह हल्ला मचाती हैं.
इसी  सामान्य बोध के नाते स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार और अपराध आये दिन हो रहे हैं .   इसी महीने  टैक्सी में हुयी बलात्कार की घटना ने दिल्ली को फिर शर्मसार किया है .सड़क से संसद तक फिर हंगामा हुआ .लेकिन दुर्भाग्य से इसकी परिणति भी ऐसे ही प्रश्नों में  उलझकर रह  गयी कि इतनी रात गए वह लड़की क्यों यात्रा कर रही थी?क्यों नहीं उसने अपने घर से किसी को बुला लिया या फिर अपने ब्वाय फ्रेंड को बुला लिया  .अब पुरुष तो ऐसे हैं ही ,समाज तो ऐसा है ही ,इसलिए महिलाओं को अपना ख्याल रखना चाहिए आदि आदि . यानी हमारी रूचि ऐसा समाज बनने की नहीं है जिसमे कोई महिला कहीं भी बेख़ौफ़ आ जा सके.ऐसे में  चाहे लाख क़ानून बन जाएँ ,  जब तक ऐसी असभ्य दलीलें दी जाती रहेंगी तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है .
सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया पर जितनी बहस हो जाए ,हमारी आत्मा की कालिमा को दूर करने के लिए चाहे जितनी मोमबत्तियां जला दी जाएँ ,ऐसी घटनाओं से उपजे  तात्कालिक उबाल के शांत होते ही घटना की जिम्मेदारी अनिवार्यत: पीड़ित स्त्री पर डाल दी जाती है .जले पर नमक यह कि अपराधी पुरुष को महिला के उकसावे का मासूम शिकार मान लिया जाता है .
नवम्बर में हरियाणा में दो बहनों पूजा और आरती के साथ घटी घटना भी इसी बात को पुष्ट करती है .सार्वजनिक  स्थानों पर महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बेहूदगी की वारदात मानसिक महामारी की तरह फैली है .यातायात के साधनों में ही नहीं कार्यस्थल से लेकर सामान्य बाजार मेले ठेले और अत्याधुनिक शोपिंग माल तक इस महामारी के दर्शन होते रहते हैं .लेकिन ऐसा कम होता है कि लड़कियों की ओर से जवाबी कारवाई हो और वह भी ऐसी जोरदार कि शोहदों के पसीने छूट जाएँ .दो-तीन दिन तक तो  इलेक्ट्रानिक मीडिया पर सबसे पहले यह वीडियो दिखाने और बहस करने की होड़ लगी हुई थी .लेकिन जैसे ही एक दूसरा वीडियो सामने आया बहस की दिशा ही बदल गयी .कहा और बताया जाने लगा कि दर असल दोनों बहने ही गडबड हैं . उन्हें कोर खोज कर मार पीट करने और विडिओ बनाने की लत है .हरियाणा सरकार को भी इस मामले में पलटी खाने में तनिक देर नहीं लगी .हमारा सामान्य बोध एक बार फिर हाबी हो गया –‘दोष तो लड़कियों का ही होगा’ .
हमारे समाज में लड़कियां तभी तक दोषी नहीं हैं जब तक वे शर्मीली लजीली बनी रहें और चुपचाप अन्याय सहती रहें .आये दिन होने वाली छेड़छाड़ से लेकर गंभीर और हिंसक अपराधों  को बर्दाश्त करती रहें .लोकलाज के डर से कुछ न कहें .ऐसी ही लड़कियों या महिलाओं को भली होने के ख़िताब से नवाजा जायेगा .
समय बदला ,समाज बदला लेकिन स्त्री सुबोधिनी का पाठ नहीं बदला .इस पाठ का लब्बोलुबाब यह कि समाज में जिसकी सत्ता है उसका दोष देखना हिमाकत है .महिलाओं को  अपना दोष देखना चाहिए और ऐसा कुछ भी करने से बाज आना चाहिए जिससे बेचारे पुरुष को बलात्कार या छलात्कार करने का उकसावा मिलता हो .फिर भी अगर उसने कोई हरकत कर ही दी तो ‘समरथ के नहि दोस गुसाईं जैसी पंक्य्तियाँ याद करके चुप लगा लेना चाहिए .स्त्री सुबोधिनी का यह पाठ आज भी हमारा सामान्य बोध बना हुआ है .
वक्त आ गया है की स्त्री सुबोधिनी का यह पाठ बदल दिया जाए .इन पंक्तियों को लिखते समय मुझे पंजाबी लेखक गुरुबख्श सिंह प्रीतलड़ी का एक लेख याद आ रहा है –‘स्त्री के प्रति व्यवहार सभ्यता की परीक्षा है’ .इस लेख में उन्होंने जवाहर लाल नेहरू का यह वक्तव्य उद्धृत किया है –“किसी जाति में स्त्रियों का स्थान उस जाति की प्रगति के सबसे जरुरी  मापदंडों में से एक है .राजनीतिक क्रांति से कहीं अधिक आर्थिक क्रांति की आवश्यकता है .परन्तु सामजिक क्रांति इन दोनों से भी कहीं अधिक अनिवार्य है .इस प्रकार की क्रांति केवल नारी द्वारा ही संभव है .ऐसी क्रांति के योग्य बनने के लिए उन्हें उन बंधनों से मुक्त होना आवश्यक है जिन बंधनों में समाज ने उन्हें जकड रखा है .........मुझे इसमें रंच मात्र भी शंका नहीं है की भारत भी अपनी उन्नति को स्त्री की स्वतंत्रता के साथ नापा करेगा .’
विकास की जिस महायात्रा में हमारा देश हांक दिया गया है उसमे थोडा ठहर कर उन्नति शब्द पर विचार करें और देखें की क्या हमारा  समाज उन्नत समाज कहलाने का हक़दार है ?स्त्री के साथ दुर्व्यवहार और अपराध के सामाजिक ,आर्थिक,कर्मकांडी और आध्यात्मिक सभी तरह के सन्दर्भ मौजूद हैं .इन सन्दर्भों ने हमारे दिमाग को इस तरह अनुकूलित कर दिया है की हम यह सोच ही नहीं पाते कि हम जो कह या कर रहे हैं- वह असभ्यता है .अपने किये को महिमा मंडित करने के इतने आप्त  वचन हमारे पास हैं कि घृणित से घृणित आचरण करते हुए हम कुंठित या अवमानित नहीं होते .उलटे हम भुक्तभोगी को ही लांछित करार दे देते हैं .दामिनी या निर्भया जैसे शब्दों से उस लड़की का मूल नाम छिपाने के पीछे हमारा यही मनोविज्ञान काम कर रहा है .

मेरा प्रस्ताव है कि आज के दिन को हम सभ्यता समीक्षा के दिन के तौर पर देखें .अपने चेतन और अवचेतन को झकझोर कर देखें कि वहां स्त्री के लिए कैसे भाव मौजूद हैं ?.क्या हमारे भाव सभ्य कहे जाने योग्य हैं ?क्या बिना किसी पाखण्ड के हम स्त्री के प्रति बराबरी का भाव विकसित कर पाए हैं ? 

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