नाइजीरिया, पेरिस और पेशावर की
घटनाओं ने मनुष्यता को सहमा कर रख दिया है
.विश्व मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह उपस्थित हुई है कि हम मनुष्य बने और
बचे
रहेंगे या पुनः बर्वर युग में लौट
जायेंगे। मजे की बात यह है कि यह चुनौती धर्म के नाम पर दी जा रही है। धर्म और वर्चस्व की राजनीति में हुए
अपवित्र गठबंधित ने हमारी मानवीय विकास यात्रा को कुंठित कर दिया है। यह एक वैश्विक
परिघटना है जिसके साक्ष्य हमें देश में भी मिल रहे हैं और दुनिया में भी। ऐसा इसलिए है कि वर्चस्व
और पहचान की राजनीति ने अलंकरण मूलक धर्म को अपना हथियार बनाया है. इसने
हमारे मानव धर्म की चेतना को अवरुद्ध कर दिया है। विवेकानन्द की जयन्ती इस समूचे परिदृश्य
पर विचार करने का सबसे उपयुक्त अवसर है .विवेकानंद
की याद हमें इस चुनौती से निपटने का सूत्र भी देती है।
विवेकानन्द
के समूचे चिन्तन की धुरी धर्म पर टिकी है। वे भारत सहित समूची मानवता का भविष्य
धर्म के दायरे में ही देख पाते हैं। विवेकानन्द भारत राष्ट्र की कल्पना धर्म के
बगैर नहीं कर पाते। वे धर्म की अपनी व्याख्या करते हैं-‘धर्म प्रेम में ही
है, अनुष्ठानों में नहीं, और वह भी हार्दिक
प्रेम जो शुद्ध और निष्कपट हो।’ ऐसा कह कर विवेकानन्द संसार के सभी धर्मों के मर्म को निचोड़कर रख देते हैं। वे हमें यह भी
बताते हैं कि धर्म आलंकारिकता में में नहीं बल्कि उसमे सारतत्व होना चाहिए। सारतत्व
के नष्ट हो जाने पर धर्म भी नष्ट हो जाता
है।
विवेकानन्द ने यह महसूस किया था कि हमारे धर्म पर बाहयाडम्बर इतने भारी हो गये हैं कि उसका सार तत्व नष्ट हो गया है। वे बड़े साफ़ शब्दों में समझाते हैं कि सार तत्व के नष्ट हो जाने के कारण ही धर्म में अतिरंजना और अलंकरण की चेष्टा हुई .इससे धर्म की भयानक अवनति हुई है। वे कहते हैं कि ‘इससे अधिक अवनति क्या हो सकती है कि देश के बड़े-बड़े मेधावी मनुष्य भोजन के प्रश्न को लेकर तर्क करते हुए सैकड़ों वर्ष बिता दें, इस बात पर विवाद करते हुए कि तुम हमें छूने लायक हो या हम तुम्हें।’ उनका निश्चित मत था कि जिस जाति का बहुलांश छूत-अछूत, खाद्य-अखाद्य और वेष-भूषा जैसे प्रश्नों को हल करने में समय बिता दे उसकी अवनति निश्चित है। इस मामले में वे इस्लाम से भी बहुत कुछ सीखने के लिए तैयार हैं।
विवेकानन्द भारत की उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा इस धारणा को मानते हैं कि ‘संसार में हम सर्वोच्च जाति के हैं।’ उनका मानना है कि यह धारणा हमें दूसरों से कुछ भी सीखने से रोकती है। विवेकानन्द मानते हैं कि भारतीयों का शेष दुनिया से अलग-थलग रहना और संसार की गति में अनुरूप चलना न सीख पाना ही भारतीय मन की अवनति का प्रमुख कारण हैं।
इसीलिए अपनी शिक्षाओं में वे धार्मिक अलंकरण की जगह धर्म के सार तत्व को स्थापित करने की बात करते हैं।
विवेकानन्द मन्दिर मूर्ति देवी-देवताओं की बात करते-करते अचानक कह उठते हैं-‘आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्म भूमि भारत माता ही हमारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं।’ विवेकानन्द यहाँ तक कहते हैं कि समझ लो बाकी सब देवता सो रहे हैं। अपने मानव धर्म को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं ‘ये मनुष्य और पशु जिन्हें हम आस-पास और पीछे देख रहे हैं, ये ही हमारे ईश्वर हैं। इनमें सबसे पहले पूज्य हैं हमारे अपने देशवासी। परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करने और झगड़ने के बजाय हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। यह ईर्ष्या-द्वेष और कलह अत्यन्त भयावह कर्म है।’ यहाँ आकर विवेकानन्द का मानव धर्म हमारे सामने प्रत्यक्ष होता है। यह वही मानव धर्म है जिसे बुद्ध, कबीर ने अपनी वाणी और आचरण में प्रकट किया है। रवीन्द्रनाथ ने जिसका गायन अपने गीतों में किया है।
विवेकानन्द के धर्म का आधार यह लोक ही है इसीलिए वे धर्म शिक्षा पर जितना जोर देते हैं उतना ही लोक शिक्षा पर भी जोर देते हैं . वे आधुनिक शिक्षा की आलोचना इस आधार पर करते है कि यह हमें निषेधात्मक बनाती है। विवेकानन्द आधुनिक शिक्षा की बुनियादी आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘निषेधात्मक बाते सीखते-सीखते बालक जब सोलह वर्ष की अवस्था को पहुँचता है निषेधों की खान बन जाता है-उसमें न जान रहती है न रीढ़।’ विवेकानन्द की बात आज भी उतनी ही सच है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में स्वतन्त्र विचारों के मनुष्य पैदा करने की क्षमता ही नहीं है। खास तौर पर आधुनिक शिक्षा हमारे अतीत के प्रति पूर्णतः नकार की भावना पैदा करती है। विवेकानन्द के विचार में भविष्य का निर्माण अतीत से जुड़कर ही संभव है। वे हमें अतीत के साथ सार्थक संवाद का विवेक देते हैं। अतीत का पूर्ण निषेध जितना गुमराह करने वाला है अतीत का अन्धानुकरण भी उतना ही भयावह है। इस तरह वे अतीत के सत को चुनने और असत को छोड़ने का मर्म सिखाते हैं। अतीत के साथ संवाद की यह दृष्टि ही हमारे भविष्य का पथ प्रकाशित कर सकती है।
विवेकानन्द की धर्म शिक्षा हमें यह भी सिखाती है कि अपने ऊपर अटूट विश्वास रखो। यह विश्वास कि प्रत्येक आत्मा में अनन्त शक्ति विद्यमान हैं।’ विवेकानन्द के धर्म शिक्षा का प्राण तत्व यही आत्मविश्वास है। इसी आत्म विश्वास की कमी के नाते हम किन्हीं व्यंग्य चित्रों या चलचित्रों से डर जाते हैं। अलंकरण मात्र यानी कुछ बाह्य चिन्हों को धर्म मानने की वजह से ही हमें लगता है कि कोई चल चित्र का रेखाचित्र हमारे धर्म को कमजोर , नष्ट या ख़त्म कर सकता है। विवेकानन्द की धर्म शिक्षा हमें यह भी बताती है कि अपने प्रति अविश्वास ही अधर्म है। यह अविश्वास ही हमें असहिष्णु बनता है, अनुदार बताता है, हमें मनुष्य होने से रोकता है और बर्वरता की ओर ले जाता है। अपने प्रति विश्वास करना मनुष्य पर, मनुष्यता की शक्ति पर, मनुष्य के मानवीय गुणों पर, मानवता पर विश्वास करना है। जब आदमी को न अपने पर विश्वास हो न दूसरे पर, न मनुष्यता पर तो फिर उसे पशु होने से कौन रोक सकता है? रवीन्द्रनाथ ने अपने जीवन की सोध्य बेला में, अपने अंतिम जन्मदिन के अवसर पर जो ‘सभ्यता का संकट’ नाम का भाषण लिखा था, उनमे अपनी तमाम निराशा के बावजूद वे कहते हैं, ‘‘मनुष्य पर विश्वास खो देना पाप है और वह पाप मैं नहीं करूंगा।’’ विवेकानन्द की जयंती हमें यह भी बताती है कि जो धर्म नाम लेकर के मनुष्य की हत्या कर रहे हैं, वे किसी धर्म के नही हैं-वे आदमी भी नहीं है।
विवेकानन्द ने यह महसूस किया था कि हमारे धर्म पर बाहयाडम्बर इतने भारी हो गये हैं कि उसका सार तत्व नष्ट हो गया है। वे बड़े साफ़ शब्दों में समझाते हैं कि सार तत्व के नष्ट हो जाने के कारण ही धर्म में अतिरंजना और अलंकरण की चेष्टा हुई .इससे धर्म की भयानक अवनति हुई है। वे कहते हैं कि ‘इससे अधिक अवनति क्या हो सकती है कि देश के बड़े-बड़े मेधावी मनुष्य भोजन के प्रश्न को लेकर तर्क करते हुए सैकड़ों वर्ष बिता दें, इस बात पर विवाद करते हुए कि तुम हमें छूने लायक हो या हम तुम्हें।’ उनका निश्चित मत था कि जिस जाति का बहुलांश छूत-अछूत, खाद्य-अखाद्य और वेष-भूषा जैसे प्रश्नों को हल करने में समय बिता दे उसकी अवनति निश्चित है। इस मामले में वे इस्लाम से भी बहुत कुछ सीखने के लिए तैयार हैं।
विवेकानन्द भारत की उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा इस धारणा को मानते हैं कि ‘संसार में हम सर्वोच्च जाति के हैं।’ उनका मानना है कि यह धारणा हमें दूसरों से कुछ भी सीखने से रोकती है। विवेकानन्द मानते हैं कि भारतीयों का शेष दुनिया से अलग-थलग रहना और संसार की गति में अनुरूप चलना न सीख पाना ही भारतीय मन की अवनति का प्रमुख कारण हैं।
इसीलिए अपनी शिक्षाओं में वे धार्मिक अलंकरण की जगह धर्म के सार तत्व को स्थापित करने की बात करते हैं।
विवेकानन्द मन्दिर मूर्ति देवी-देवताओं की बात करते-करते अचानक कह उठते हैं-‘आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्म भूमि भारत माता ही हमारी आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है। सर्वत्र उसके हाथ हैं, सर्वत्र उसके पैर हैं और सर्वत्र उसके कान हैं।’ विवेकानन्द यहाँ तक कहते हैं कि समझ लो बाकी सब देवता सो रहे हैं। अपने मानव धर्म को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं ‘ये मनुष्य और पशु जिन्हें हम आस-पास और पीछे देख रहे हैं, ये ही हमारे ईश्वर हैं। इनमें सबसे पहले पूज्य हैं हमारे अपने देशवासी। परस्पर ईर्ष्या-द्वेष करने और झगड़ने के बजाय हमें उनकी पूजा करनी चाहिए। यह ईर्ष्या-द्वेष और कलह अत्यन्त भयावह कर्म है।’ यहाँ आकर विवेकानन्द का मानव धर्म हमारे सामने प्रत्यक्ष होता है। यह वही मानव धर्म है जिसे बुद्ध, कबीर ने अपनी वाणी और आचरण में प्रकट किया है। रवीन्द्रनाथ ने जिसका गायन अपने गीतों में किया है।
विवेकानन्द के धर्म का आधार यह लोक ही है इसीलिए वे धर्म शिक्षा पर जितना जोर देते हैं उतना ही लोक शिक्षा पर भी जोर देते हैं . वे आधुनिक शिक्षा की आलोचना इस आधार पर करते है कि यह हमें निषेधात्मक बनाती है। विवेकानन्द आधुनिक शिक्षा की बुनियादी आलोचना प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘निषेधात्मक बाते सीखते-सीखते बालक जब सोलह वर्ष की अवस्था को पहुँचता है निषेधों की खान बन जाता है-उसमें न जान रहती है न रीढ़।’ विवेकानन्द की बात आज भी उतनी ही सच है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में स्वतन्त्र विचारों के मनुष्य पैदा करने की क्षमता ही नहीं है। खास तौर पर आधुनिक शिक्षा हमारे अतीत के प्रति पूर्णतः नकार की भावना पैदा करती है। विवेकानन्द के विचार में भविष्य का निर्माण अतीत से जुड़कर ही संभव है। वे हमें अतीत के साथ सार्थक संवाद का विवेक देते हैं। अतीत का पूर्ण निषेध जितना गुमराह करने वाला है अतीत का अन्धानुकरण भी उतना ही भयावह है। इस तरह वे अतीत के सत को चुनने और असत को छोड़ने का मर्म सिखाते हैं। अतीत के साथ संवाद की यह दृष्टि ही हमारे भविष्य का पथ प्रकाशित कर सकती है।
विवेकानन्द की धर्म शिक्षा हमें यह भी सिखाती है कि अपने ऊपर अटूट विश्वास रखो। यह विश्वास कि प्रत्येक आत्मा में अनन्त शक्ति विद्यमान हैं।’ विवेकानन्द के धर्म शिक्षा का प्राण तत्व यही आत्मविश्वास है। इसी आत्म विश्वास की कमी के नाते हम किन्हीं व्यंग्य चित्रों या चलचित्रों से डर जाते हैं। अलंकरण मात्र यानी कुछ बाह्य चिन्हों को धर्म मानने की वजह से ही हमें लगता है कि कोई चल चित्र का रेखाचित्र हमारे धर्म को कमजोर , नष्ट या ख़त्म कर सकता है। विवेकानन्द की धर्म शिक्षा हमें यह भी बताती है कि अपने प्रति अविश्वास ही अधर्म है। यह अविश्वास ही हमें असहिष्णु बनता है, अनुदार बताता है, हमें मनुष्य होने से रोकता है और बर्वरता की ओर ले जाता है। अपने प्रति विश्वास करना मनुष्य पर, मनुष्यता की शक्ति पर, मनुष्य के मानवीय गुणों पर, मानवता पर विश्वास करना है। जब आदमी को न अपने पर विश्वास हो न दूसरे पर, न मनुष्यता पर तो फिर उसे पशु होने से कौन रोक सकता है? रवीन्द्रनाथ ने अपने जीवन की सोध्य बेला में, अपने अंतिम जन्मदिन के अवसर पर जो ‘सभ्यता का संकट’ नाम का भाषण लिखा था, उनमे अपनी तमाम निराशा के बावजूद वे कहते हैं, ‘‘मनुष्य पर विश्वास खो देना पाप है और वह पाप मैं नहीं करूंगा।’’ विवेकानन्द की जयंती हमें यह भी बताती है कि जो धर्म नाम लेकर के मनुष्य की हत्या कर रहे हैं, वे किसी धर्म के नही हैं-वे आदमी भी नहीं है।