यह स्त्री विरोधी
समय है ..दो साल पहले के निर्भया कांड पर
हुए देश व्यापी विरोध से माहौल बना था कि स्त्री के साथ होने वाली घटनाएँ अब नहीं
घटेंगी .या घटित भी हुयीं तो अपराधी न केवल पकड़ लिए जायेंगे और उन्हें तत्काल सजा
मिलेगी .देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए ऐसा लग रहा था कि शायद ही कोई
स्त्रियों की ओर बुरी नजर से देखने की हिम्मत करे.लेकिन स्थिति एकदम उलट है .
स्त्रियों के साथ होने वाले अत्याचार की घटनाएं आये दिन हो रही हैं .कोलकाता में
७१ साल की नन के साथ हुयी घटना में लिंग
के साथ धर्म के आग्रह भी काम कर रहे हैं . स्त्री उत्पीडन की हर नयी घटना क्रूरता
में पिछली घटना को पीछे छोड़ रही है . असभ्यता के नित नए
कीर्तिमान बन रहे हैं .क्या लैंगिक भेदभाव की असभ्यता हमारे समाज की सहज प्रकृति
है ?क्या इस असभ्यता से छुटकारे का कोई
उपाय नहीं है ?क्या हमारी साड़ी पढाई –लिखी ,सारा ज्ञान - विज्ञान इस मनोवृत्ति के
आगे लाचार है ? महादेवी वर्मा का साहित्य ऐसे सभी प्रश्नों को समझने में हमारी मदद
करता है .
महादेवी वर्मा के
साहित्य को स्त्री वेदना के साहित्य के
रूप में पढ़ा जाता रहा है. जबकि सच यह है
कि महादेवी का साहित्य लिंग भेद पर आधारित समाज की विवेचना की दृष्टि देता है और
लैंगिक अंतर को श्रेष्ठता और हीनता के रूप में देखे जाने के अभ्यास को तोड़ता है
.लैंगिक भिन्नता को श्रेष्ठता और हीनता के
युग्म में परिभाषित करने वाले मनोविज्ञान ने स्त्री - पुरुष के बीच पराएपन का भाव पैदा किया है .इस नाते
स्त्री और पुरुष एक दूसरे को पराये के रूप में देखने लग जाते हैं .यह भाव दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा
कर देता है .नतीजतन दोनों के बीच अधीन बनने
और अधीन बना लेने की होड़ शुरू हो
जाती है . पुरुष वर्चस्व का ढांचा दर असल इसी होड़ का नतीजा है .वर्तमान समय स्त्री
के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार के मूल में भी कहीं न कहीं यह होड़ ही है .
महादेवी स्त्री और
पुरुष सम्बन्ध को समाज की दो आधार शिलाएं मानती हैं और इन दोनों के बीच परस्पर पूरकता के
सम्बन्ध को विकसित होते देखना चाहती हैं. परस्पर पूरकता के इस भाव में गैर बराबरी
,विद्वेष ,वर्चस्व या अधीनता के लिए कोई जगह नहीं है .यहाँ संगी और संगिनी का भाव
बनता है. समाज की इन दो आधार शिलाओं के बीच के असंतुलित सम्बन्ध ने सामाजिक
समस्याएं पैदा की हैं और सभ्यता को प्रश्नांकित किया है . स्त्री के साथ होने वाल असभ्य व्यवहार समाज की
असभ्यता का सूचक है .महादेवी का साहित्य सभ्यता के इसी सवाल से हमें दो-चार कराता है.
महादेवी अपनी कविता में अपरिचित पंथ पर चलने की
बात करती हैं .समाज में स्त्री पुरुष की अधीन बनी रहे .पुरुष का वर्चस्व कायम रहे
.स्त्री अपनी अधीनता को सौभाग्य समझे .पुरुष अपने अन्याय को अधिकार समझे यह
यथास्थिति ही परिचित पंथ है . महादेवी का साहित्य इस परिचित पंथ से अलग नए पंथ
(रास्ता )का प्रस्ताव करता है .लेकिन जो परिचित है वह चाहे जितना अन्यायपूर्ण हो -सुगम
लगता है और जो अपरिचित है वह दुर्गम.अधीनता त्याग देने पर स्त्री को भी नए मार्ग
की तलाश करनी पड़ेगी .चुनौतियों से दो- चार होना पड़ेगा .इसलिए स्त्रियों के लिए भी
अपरिचित पंथ को समझना और स्वीकार करना मुश्किल है . महादेवी बिना किसी हो हल्ले
के स्त्रियों को इस अपरिचित पंथ पर न केवल
ले आती हैं, बल्कि उस पर चलने का साहस भी देती हैं .
महादेवी इसके लिए
ज्ञान का दीप जलाती हैं .दीपक उनका सबसे
प्रिय प्रतीक है . यथास्थिति बदलने के लिए महादेवी सबसे ज्यादा भरोसा दीपक पर ही
करती हैं .दीप की कांपती हुयी लौ .अँधेरे से लड़ती हुयी ..दीपक जलते ही यथास्थिति
का अँधेरा अपने आप मिट जाता है .
महादेवी को यथास्थिति
का बोध है और दीपक की सामर्थ्य का भी .वे कहती हैं –मधुर मधुर मेरे दीपक जल !/युग
युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल /प्रियतम का पथ आलोकित कर .यह प्रियतम कौन है जिसका पथ महादेवी आलोकित करना चाहती हैं . कौन ऐसा
प्रिय है जिसे अँधेरा ही पसंद है .एक दूसरे गीत में महादेवी कहती हैं –‘मेरे
प्रियतम को भाता है तम के परदे में
आना’.महादेवी की कविता का मर्म और उसकी शक्ति यहाँ समझ में आती है . वे अपने प्रिय
की मर्जी के विरुद्ध ,पसंद के विरुद्ध दीप जलाती हैं और प्रियतम के पथ को आलोकित
करती हैं .थोड़ी देर के लिए इस प्रिय को अज्ञात रहस्य मानने का अभ्यास छोड़कर अगर हम यह मान लें कि यह प्रिय
और कोई नहीं बल्कि पुरुष है तो बहुत सी बातें साफ़ हो जाती हैं . वे जिस अँधेरे के खिलाफ संघर्षरत हैं वह
अज्ञान है .पुरुष अन्धेरे में ही नहीं है
उसे तम का पर्दा भाता है . यह तम का पर्दा मिथ्या ज्ञान है .महादेवी ज्ञान के दीपक
से प्रिय पुरुष के अज्ञान अन्धकार को ही नहीं बल्कि मिथ्या ज्ञान ,मिथ्या चेतना को
भी दूर करने का प्रयास करती हैं. स्वाभाविक रूप से श्रेष्ठ होने के पुरुष अहंकार
को दूर करती हैं . महादेवी का मधुर मधुर जलने वाला दीपक कबीर का लुआठा बन जाता है
.महादेवी का साहित्य पुरुष वर्चस्व ,पुरुष अहंकार की मिथ्या चेतना और अन्धकार के
विरुद्ध अकम्पित जलने वाला दीपक है .
महादेवी स्त्री और
पुरुष के बीच संगी और संगिनी रूप को आदर्श मानती हैं.पुरुष वर्चस्व में स्त्री का
संगिनी रूप छाया मात्र में बदल गया है .पुरुष ने स्त्री को छाया बन जाने के लिए
बाध्य किया है .स्त्री ने इस छाया रूप को न केवल स्वीकार कर लिया है बल्कि इसे अपना सौभाग्य मान लिया है .स्त्री पुरुष सम्बन्ध में यही मिथ्या ज्ञान
है . इसी मिथ्या ज्ञान के नाते पुरुष को स्त्री का छाया बन जाना भाता है . इसी मिथ्या ज्ञान से स्त्री
छाया बन जाने को अपना परम सौभाग्य समझती है .छाया और संगिनी के फर्क को स्पष्ट
करते हुए महादेवी लिखती हैं –छाया का कार्य ,आकार में अपने आपको इस प्रकार मिला
देना है जिसमे वह उसी के समान जान पड़े और संगिनी का अपने सहयोगी की प्रत्येक
त्रुटि को पूर्ण करके उसके जीवन को अधिक से अधिक पूर्ण बनाना है .
ऐसा तभी संभव है जब
स्त्री का अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व हो .महादेवी पुरुष के अंध अनुसरण और अनुकरण को अनर्थ बताती
हैं, क्योंकि यह स्त्री की स्वतंत्रता का निषेध है .वे दोनों में संगिनी और संगी
भाव को विकसित करने का प्रस्ताव कराती हैं
.इसके लिए महादेवी आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करने पर जोर देती हैं .महादेवी के
लिए आंतरिक शक्ति के विकास का अर्थ है स्त्री के स्वतन्त्र व्यक्तित्व का विकास
.महादेवी यह भी जानती हैं कि अधिकार भिक्षा वृत्ति से न मिले हैं न मिलेंगे
.उन्हें हासिल करने के लिए स्त्री को स्वयं अधिकारी बनना होगा.
तमाम विडम्बनाओं के
बावजूद आज यह तथ्य हमारे सामने है कि आज की स्त्री पुरुष सत्ता द्वारा खीची गयी लक्ष्मण रेखा के बाहर निकल आई है . अब वह किसी भी तरह देहरी के भीतर वापस नहीं जाने वाली .पुरुष वर्चस्व
की यथास्थिति वैचारिक रूप से दरक गयी है
.भले ही हमारे सामने पुरुष वर्चस्व का ढांचा बहुत मजबूत दिखाई दे रहा हो ,सच यह है
कि उसका नैतिक आधार ख़त्म हो गया है .अब भौतिक रूप से पुरुष वर्चस्व का ढांचा
चरमराने वाला है.स्त्री के प्रति होने वाले अत्याचारों , क्रूरताओं और अपराधों के
मूल में इस नैतिक पराजय की खिसियाहट भी है .
आज स्त्री एक नए पथ
पर चल पड़ी है .यह महादेवी का सुझाया अपरिचित पंथ ही है . ‘पंथ होने दो अपरिचित
,प्राण रहने दो अकेला’ का उद्घोष महादेवी का आत्म उद्बोधन है जो सामजिक सन्दर्भ
में समूची स्त्री जाति का आत्म बन जाता है .महादेवी हमें बताती हैं कि
अबला होने के भाव से स्त्री की मुक्ति में
ही मर्द होने के दंभ से पुरुष की
मुक्ति निहित है .इस दंभ से मुक्त होकर ही पुरुष का मनुष्य होना संभव है . इसलिए स्त्री
विरोधी समय में महादेवी की याद हमें बेहतर मनुष्य और सभ्य समाज होने की दिशा में आगे ले जाती है. .