शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

उसे दामिनी या निर्भया ही क्यों कहें

पिछले साल दिसम्बर महीने में 16 तारीख को दिल्ली में एक लड़की के साथ चलती बस में बलात्कार हुआ। बलात्कारी उसके साथ इस दरिंदगी के पेश आये कि सारी कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। बलात्कार की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं। हमारे समाज में बलात्कार और हत्या भी कोई नई या अचरज वाली खबर नहीं हैं। लेकिन इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। दिल्ली उबल पड़ी थी । देश भर में अनेक प्रदर्शन हुए, रैलियाँ निकाली गयीं। स्त्री के साथ होने वाले अन्याय पर ऐसा उद्वेलन पहले कभी नहीं देखा गया था। इसकी अनुगूँज संसद से सड़क तक और रैदास गेट;बनारस द्ध से इण्डिया गेट तक सुनाई पड़ी। आम तौर पर ऊँचा सुनने वाली संसद भी इस घटना से विचलित नजर आई। स्त्री के सुरक्षा और त्वरित लाभ के लिए कानून बनें। स्त्री को न्याय दिलाने के लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट बनें । स्त्री सशक्तिकरण और सुरक्षा के नजरियें से भारी विचार मंथन हुआ। दरिंदगी की शिकार लड़की को शहीद का दर्जा दिया गया। घटना के साल भर पूरा होने पर पीड़िता की स्मृति में अनेक संस्थाओं ने कार्यक्रम किये। कई सरकारों ने उसकी स्मृति फेलोशिप आदि जारी करके स्त्री सम्मान स्वाभिमान सुरक्षा के प्रति अपनी एकजुटता दिखायीं। इस पूरी प्रक्रिया में बस वह लड़की भुला दी गई। पीडि़त लड़की को शहीद और देवी का दर्जा दे दिया गया। मीडिया ने उसे निर्भया या दामिनी नाम दिया। निर्भया शायद इसलिए की वह अन्तिम साँस तक दरिंदों से लड़ती रही। उसकी लड़ाई मर्दवादी सोच पर बिजली की तरह गिरी, शायद इसीलिए उसे दामिनी नाम दिया गया। लेकिन वास्तव में ये उसके नाम नहीं हैं ये उसके नाम को छुपाने के लिए रचे गये विशेषण है। विशेषण वहाँ तक तो ठीक है जहाॅं तक वे विशेष्य की विशेषताएँ बताएं। यहाँ तो मामला एकदम उलटा है। विशेष्य की पहचान लुप्त करके विशेषण की महिमा मण्डित किया जा रहा हैं। महिमा मण्डन के मामले में हमारा कोई सानी नहीं हैं। खासतौर से स्त्रियों के मामलें में। हम स्त्रियॉं को बराबरी का दर्जा नहीं दे सकते हैं। उसे देवी, दुर्गा या काली कहकर पूजा तो कर सकते हैं, पर उसे साधारण मनुष्य की गरिमा देना हमें गवारा नहीं । हमें कष्ट होने लगता हैं। मिथक और इतिहास में ही नहीं सामान्य जीवन में भी स्त्रियाँ असामान्य शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का परिचय देती है। प्रायः हम इसे नजरदंाज कर जाते हैं। जब मामला नजरदंाज करने लायक नहीं रह जाता ह है तो फट उसे देवी बनाकर पूजना शुरु कर देते हैं। पूजा शुरु हुई नहीं कि उसका सामान्य स्त्री या सामान्य मनुष्य रूप भुला दिया जाता है । विचार करना चाहिए कि कहीं हम इस लड़की की वास्तविक पहचान भुलाकर इसी पुरानी कहानी को तो नहीं दुहरा रहे हैं। इस तरह हम निर्भया या दामिनी के रूप में उसे गौरवान्वित करेंगे। और उसकी वास्तविक पहचान छुपा देंगे। इसके पीछे तर्क यह है कि पीडि़ता का नाम उजागर होने से उसके बदनाम होने का खतरा है। एतराज इसी तर्क पर होना चाहिएैं। स्त्रियाँ मर्दो की दंरिदगी का शिकार होती रही है। वे अपनी मर्जी से बलात्कार या शारीरिक मानसिक दुर्व्यवहार को आमंत्रित नहीं करती हैं । मजे की बात यह है कि मर्दवादी सोच के दायरे में जो दरिंदगी का शिकार है वह बदनाम हो जाता है और दरिंदगी को अंजाम देने वाला नहीं। दरिंदगी व वहशीपन उसे और ज्यादा मर्द होने का प्रमाण पत्र देता है। इसलिए देेखे तो ऐसे दरिंदे या वहशी जब पकड़े जाते है तो जेल या कचहरी जाते समय उनके चेहरों पर ग्लानि या अपराध बोध नहीं बल्कि एक तरह का गुरुर टपकता रहता है। जो दरिंदगी का शिकार होती है उसका नाम इस तर्क से पोशीदा रखा जाता है कि वह बदनाम हो जायेगी। उसका सामाजिक जीवन मुश्किल हो जायेगा। उसका पति उससे नफरत करने लगेगा, उसका प्रेमी उससे मुॅंह मोड़ लेगा, उसका बेटा हीन ग्रन्थि से ग्रसित हो जायेगा। ऐसा इसलिए की सामान्य मर्दवादी सोच यही है कि स्त्रियाँ ही दोषी होती है। वे चाहे किसी हादसे ए वहशीपन या दरिंदगी का शिकार ही क्यों न हों। किसी भी तरह स्त्री की देह प्रभावित हुई है तोे वह संदेह के घेरे में आ जाती है। औरों की बात ही क्या की जाय। लंका विजय के बाद जब सीता भगवान राम के सामने लायी जाती हैं तब स्वयं राम सीता से यह कहते हैं मैं यह मानने की तैयार नहीं हॅंू कि आप जैसे सुन्दरी को घर में रखकर रावण जैसा दुष्टात्मा अपने को आप से दूर रख पाया होगा। सीता के लाख कहने पर कि शरीर मेरे वश में नहीं थाएइसे भले ही किसी ने छू दिया होए मेरा मन सदैव आप के प्रति समर्पित रहा हैए उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। अग्नि परीक्षा में सफल होने के बाद भी राम का सन्देह अपनी जगह बना रहता है। तो जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम का यह हाल है वहाँ साधारण मर्द की सोच का अंदाजा लगा सकते हैं। दरअसल यह मर्दवादी सोच का विस्तार है जमाने से मर्द लोग स्त्री का दैहिक शोषण इस बिना पर ही करते रहे हैं कि यदि मामला उजागर हो गया तो स्त्री ही दोषी मानी जायेगी। हमारी बोलियों में ऐसी अनेक कहावतें मिल जायेंगी जिससे इस बात की तसदीक होती हैं-लाजें पतौह बोलें ना सवादे ससुर छोड़े ना ( शर्म के मारे पुत्रवधू बोल नहीं पाती इसलिए श्वसुर अपनी हरकत से बाज नहीं आते । ) इस सोच के इस कदर सामाजिक स्वीकार्यता मिली है कि इसे कानून का दर्जा दे दिया गया है । पीडि़त स्त्री का नाम उजागर करने वाला ही अपराधी मान लिया जाता है। किसी हादसे का शिकार होने पर कोई भी पुरुष बदनाम नहीं होताएउल्टे उसे सहानुभूति ही मिलती है । फिर जो दिल्ली या कोलकाता में हुयी हैवानियत का का शिकार है बदनामी की आशंका से उसका नाम क्यों छुपाया जाये । लेकिन ऐसे मामलों में में शिकार को ही दोषी मान लेने की मानसिकता के कारण एक लड़की जिसने अपनी जान गवां दी एमरने के बाद उसे अपनी पहचान भी गवानी पड़ रही है ै। लेकिन मर्दवादी सोच पर आधारित सामाजिक विधान स्त्री को दोषी मानता है।स्त्रियॉं के ड्रेस कोड को लेकर होने वाली बहसों के मूल में भी यही सोच काम कर रही है । इस मामले में मर्दवादी सोच पर आधारित सामाजिक विधान के अनुरूप कानून भी है । इस मर्दवादी मानसिकता और इस पर आधारित कानून को अगर नहीं बदला गया तो स्त्री मुक्ति के सपने और सशक्तिकरण के सारे प्रयास धरे के धरे रह जायेंगे। जिस लड़की की कुर्बानी से स्त्रियॉं के अधिकार और सुरक्षा आदि को लेकर इतनी बहस चली एअनेक सख्त कानून बनें उसका नाम ही छुपा दिया गया । उसकी पहचान छुपाना दरअसल मर्दवादी मानसिकता को बनाए रखने की कोशिश है। इसलिए क्या यह उचित नहीं की पीड़िता की पहचान को दामिनी और निर्भया जैसे भारी भरकम विशेषणों के नीचे ढकने के बजाय उसकी वास्तविक पहचान सामने लाने की हिम्मत दिखाई जाये ।

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

काशी और कबीर

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स्मृति :परमानन्द श्रीवास्तव -शब्दों के सहारे जीवन


परमानंद जी नहीं रहे  ,यह सुनने के लिए मन उसी दिन से तैयार हो रहा था जिस दिन से उनके  अस्पताल मे भर्ती होने  की खबर मिली थी । सब प्रार्थनाएँ , शुभकामनायें और सदिच्छाएँ  धरी रह गईं ।और परमानंद जी चले गए । कभी किसी प्रसंग मे परमानंद जी ने दाग एक शेर पढ़ा था जो बड़े त्रासद ढंग से परमानंद जी के प्रसंग में  भी मौजू लगने लगा था –
होश-ओ-हवाश ताब-ओ-तवा दाग सब गया ।
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया ।
परमानंद जी भले ही अब गए हों ,उनकी शख्शियत तो पहले ही चली गयी थी । खराब स्वास्थ्य और स्मृति मे गड्ड मड्ड हो जाने के साथ ही उनके  आवाज की बुलंदी खामोश हो गयी थी । उनकी उपस्थिति महज विनोद की वस्तु होकर रह गयी  थी ।  इस हाल मे भी लोग बाग उनका मज़ाक उड़ाने बाज नहीं आ रहे थे ।  उन्हें प्यार करने वाले लोगों के लिए बेहद यातनादायी अनुभव क्षण थे ।इसे  नियति का क्रूर व्यंग्य  ही कहेंगे कि  कि जीवन भर आदर ,स्पृहा और बहुधा ईर्ष्या के आलंबन रहे परमानंद जी हास्य और विनोद के आलंबन हो गए थे । इसलिए उनकी विदाई प्रतीक्षित थी ।
 लेकिन एक परमानंद जी हमारे भीतर मौजूद हैं । और मौजूद रहेंगे । हम न मारे मरिहें संसारा के तर्ज़ पर ।
परमानंद जी  से मेरी पहली भेंट 1980 मे हुयी थी । तब मैं बी ए का छात्र  था ।छात्र क्या विधिवत छात्रनेता था जिसका  पढ़ाई लिखाई से कुछ लेना देना नहीं था ।  पडरौना के उदित नारायण कॉलेज में। जहां थोड़े दिन पहले तक केदारनाथ सिंह प्राचार्य थे । वहाँ समकालीन कविता पर संगोष्ठी थी । जाड़े का दिन था । बाहर से आए विद्वानों में परमानंद जी की लंबाई सबसे कम थी । मोटा ऊनी कुर्ता, पाजामा और साल ओढ़े परमानंद जी छुपे  से बैठे  थे । केवल उनकी चमकती हुयी आँखें ही उनकी शख्शियत  का पता दे रही थीं ।   जब वे बोलने के लिए खड़े हुये तो उनकी खनकती हुयी आवाज ने हम सबका ध्यान खींचा  । लगा जैसे उनका पूरा शरीर ही वाकयंत्र है । वे पूरे शरीर से बोलते थे ,बल्कि उनका वजूद उनकी आवाज में ही उतर आया  था । इस आवाज का  जादू तब समझ मे आया जब हम विधिवत उनके छात्र हुये । 1981-1984 में  एम ए की कक्षाओं में। पहले पहल वे   मुक्तिबोध की कवितायें पढ़ाते हुये मिले । पहली ही कक्षा में हमारी चेतना में कहीं कुछ टूट रहा था ,कुछ बदल रहा था । मैं गोरखपुर पढ़ने नहीं आया था । छात्र राजनीति के लिए छात्र होना ज़रूरी था । इसलिए एमए हिन्दी का छात्र बन गया । एक निहायत पिछड़ी और सामंती पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति की चेतना को बदलने मे परमानंद जी की  कक्षाओं की जबर्दस्त भूमिका थी । मेरे जैसे कितने लोग होंगे जिन्हें परमानंद जी की जादुई आवाज ने बदला होगा । परमानंद जी का पूरा व्यक्तित्व ही उनकी आवाज मे महदूद था । जब वे बोलने खड़े होते थे उनका रूपान्तरण हो जाता था । ऐसा तभी  संभव होता है जब अपने बोले पर अखंड विश्वास हो । परमानंद जी साहित्य में सब कुछ छोड़ कर आए थे । साहित्य की दुनिया से वापसी के सारे पुल जलाकर आए थे -निहत्थे । शब्दों के सामर्थ्य पर उन्हें पूरा भरोसा था ।  उनकी आवाज इस भरोसे की आवाज थी , सामंतविरोधी विचारों की आवाज थी।  हर तरह की कुंदता को खत्म करके  चेतन बना देने वाली   ।  इस आवाज ने कितनों को बदला , कितनों को बनाया हिसाब लगाना मुश्किल है । परमानंद जी की साहित्य यात्रा के सहयात्री केदारनाथ सिंह ठीक ही कहते हैं –परमानंद जी ने गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण को आधुनिक बनाया ।
सोच रहा हूँ ,परमानंद जी के बगैर गोरखपुर कैसा लगेगा ?कितना खाली ,और कैसा खाली ।......... इस खालीपन का हिसाब कौन करेगा । आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रेरक और प्रसारक ,एक निर्माता अध्यापक ,साहित्य का संगठन कर्ता,साहित्य की दुनिया का नागरिक अपनी किताबों ,पत्र पत्रिकाओं ,लेखों कविताओं और खनकती हुयी दमदार आवाज को छोडकर चला गया । गालिब  याद आते हैं –थी वह इक शख्स के तसव्वुर से /अब वह र’अनाइ-ए-ख़याल कहाँ ।
गोरखपुर  में रहते हुये उन्हें कई मोर्चों पर लड़ना पड़ा । एक पुरातन सामंती सोच वाले शहर मे नए  साहित्य के लिए बिलकुल जगह नहीं थी । जहां विश्वविद्यालय जैसी संस्था भी जड़ता का शिकार हो वहाँ और जगहों की कल्पना भी कैसे की जा सकती थी । हिन्दी विभाग में रहते हुये परमानन्द जी ने नए साहित्य के लिए जगह बनाई । गोरखपुर विश्वविद्यालय में जब तक रहे साहित्य की मुख्यधारा और साहित्य के वर्तमान से उसे जोड़े रखा । उनके लिए आलोचना का स्मृति और वर्तमान से निरंतर संवाद थी ।यह संवाद उन्होने शैक्षणिक जीवन मे भी बनाए रखा । कबीर और जायसी ,निराला,प्रेमचंद , मुक्तिबोध से होते हुये केदारनाथ सिंह ,रघुवीर सहाय ,कुँवर नारायण तक और साहित्य मे आने वाली युवा और युवतर  पीढ़ी तक उनकी नज़र थी । नया से नया और बड़ा से बड़ा लेखक परमानंद जी के माध्यम से  अपने को गोरखपुर से जुड़ा महसूस करता था ।
 गोरखपुर प्रेमचंद की कर्मभूमि रही है ,इसे गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण मे जीवंत करने मे अकेले परमानंद जी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी । श्रीमती शांता सिंह की अध्यक्षता में परमानंद जी ने विश्वविद्यालय मे प्रेमचंद पीठ स्थापित करने का मुहिम छेड़ा और उसे अंजाम तक पह्नुचाया । प्रेमचंद की स्मृति उनके लिए सामंती चेतना के विरोध का सशक्त माध्यम थी । इसीलिए परमानंद जी प्रेमचंद से जुड़ी हर गतिविधि के सहयात्री बन जाते थे । गोरखपुर मे प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना को लेकर वे बेहद उत्साहित थे ।प्रेमचंद साहित्य संस्थान को साहित्य का वैकल्पिक केंद्र बनाने मे उनकी बड़ी भूमिका थी ।प्रेमचंद संस्थान से  त्रिलोचन ,श्रीलाल शुक्ल ,भीष्म साहनी ,राजेंद्र यादव ,नामवर सिंह  ,केदारनाथ सिंह ,मार्कन्डेय ,दूधनाथ सिंह जैसे नामचीन साहित्यकारों को जोड़ना  परमानंद जी के बूते की ही बात थी ।  प्रेमचंद साहित्य संस्थान की प्रगति और विकास के लिए वे लगातार चिंतित और सक्रिय रहे । प्रेमचंद साहित्य संस्थान के अध्यक्ष के रूप में उन्होने सदैव हमारा मार्ग दर्शन किया ।
साहित्य मे नए लेखकों पर जितना परमानंद जी ने लिखा उतना शायद ही किसी और हिन्दी आलोचक ने लिखा होगा । देखें तो नयी महिला रचनाकारों की बहुसंख्या को हिन्दी जगत से परिचित कराने में भी वे सबसे आगे खड़े मिलेंगे । नए लेखकों और नए विचारों के प्रति उनका नजरिया सदैव सकारात्मक था । नए से नए लेखक पर लिखने बोलने से उन्होने कभी गुरेज नहीं किया । इसी तरह नयी संस्थाओं को बल देने मे वे सदैव तत्पर रहे ।  नए लेखक पर लिखना आलोचकीय साहस की मांग करता है । परमानंद श्रीवास्तव मे यह आलोचकीय साहस अपनी पीढ़ी के आलोचकों मे सबसे ज्यादा था । शायद यही वजह है की आज परमानंद जी कमी नए लेखक कहीं ज्यादा शिद्दत से महसूस कर रहे हैं ।
परमानंद जी से मैंने आखिरी दिनों में आत्मकथा लिखने का प्रस्ताव किया था । लेकिन देर हो चुकी थी । सिलसिलेवार आत्मकथा लिख पाने की हालत में वे नहीं रह गए थे । आखिरी मुलाक़ात मे उन्होने मुझे  20-25 पृष्ठों की हस्तलिखित सामग्री दी है । सुंदर और सधी हुयी लिखावट में 20-25 पृष्ठ । यह आत्मकथा तो खैर किसी तरह नहीं है । यह अनेक रचनाकारों ,रचनाओं ,विचार यात्राओं का ढीला ढाला कोलाज जैसा है ,जिसका शीर्षक दिया है –साहित्य से निर्वासन । और पहला वाक्य है ‘साहित्य में रहने के लिए निर्वासन जरूरी है’। अपने आखिरी दिनों में परमानंद जी एक तरह से  निर्वासन झेल रहे थे । अब  निर्वासन ही साहित्य में बने रहने का उपाय था । बक़ौल फैज -आस उस दर से टूटती ही नहीं /जाके देखा न जा के देख लिया ।

भोजपुरी जीवन का पर्व :डाला छठ



कार्तिक शुक्ल पक्ष की  षष्ठी तिथि की शाम । बनारस का अस्सी घाट  । छठ पर्व का मेला गंगा तट पर पसरा हुआ है  । यहाँ से वहाँ तक । छठ पर्व इधर भोजपुरी अस्मिता का प्रतीक बन कर उभरा है । अस्मिता या पहचान को राजनीतिक रूप से भुनाने वाले भी छठ मे हिस्सा लेने लगे हैं । अस्सीघाट पर नए बने मण्डप में भोजपुरी समाज के कार्यकर्ता जमे  थे । माइक से लगातार छठ के बारे कुछ बताया जा रहा था । कि यह सूर्य  की उपासना का व्रत है ,कि सूर्य  की पूजा कई देशों में होती है ,कि सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं । आवाज साफ थी ,भाषा अच्छी उच्चारण और अच्छा । मैंने देखा कि हम लोगों के प्रिय संस्कृत के प्रोफेसर उपेंद्र पाण्डेय बोल रहे हैं ।मुझे कालिदास याद आए । अभिज्ञान शाकुंतलम के मंगलाचरण में 10  प्रत्यक्ष देवताओं  को याद किया गया है।  उनमे सूर्य  भी हैं ।मुझे एक बात नहीं समझ मे आती है कि सूर्य की आराधना की जाती है और गीत छठ मैया का गाया जाता है । हमारा इतना प्रखर और प्रत्यक्ष देवता लोक तक आते आते कैसे माँ में बदल जाता है । आखिर गायत्री भी तो सूर्य की उपासना का मंत्र है उसे भी गायत्री माँ के रूप मे बदल दिया गया । अब अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी होते तो उनसे पूछता कि क्या कोई ऐसी लोक परंपरा रही है जो सूर्य के ममत्व को देख लेती रही है और यह त्योहार उसी लोक परंपरा या वेद से इतर परंपरा की स्मृति है? खैर इस बारे में अभी भी हम कमलेश दत्त त्रिपाठी से उम्मीद कर सकते हैं ।
अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने जुटी  महिलाएं अलग अलग झुंड मे बैठी हैं  । पीले और नारंगी के बीच के रंग  का खास सिंदूर नाक से लेकर मांग तक लगाए कुछ तैयारी  में  ,कुछ इंतज़ार में । छठ माँ का मधुर गीत भी कहीं कहीं गूंज रहा है ।  सूर्य को  बादलों ने ढक लिया है । बादलों के बीच से उनकी आभा छन कर आ रही है । ऐसा क्यों होता है की सूर्य को छल बादल क लेते हैं । देखें कितनी देर  ।एक अनिश्चितता सी छाई हुयी है । अनिश्चितता के बीच अद्भुत निश्चिंतता का माहौल बना हुआ है । सबने गंगा तट का कुछ हिस्सा घेर रखा है । लीप पोत कर बेदी बना ली गयी है। दिये जल गए हैं ।  गन्ने को जमीन में इस तरह लगाया गया है मानो मंडप बनाने की तैयारी हो रही है । बांस की बहँगी मे मौसमी फल और  प्रसाद रखे गए हैं ।बहँगी कच्चे बांस की बनी बड़ी सी डलिया होती है ,जिसे कहीं कहीं दौरी भी कहते हैं । सब कुछ इसी में रख  कर लाया जाता है ,इसीलिए इसे डाला छठ कहते हैं -शायद । मजे की बात यह कि ढोने का काम पुरुष करते हैं  -पति महोदय हों ,देवर हों या श्रीमान दामाद जी ही क्यों न हों । यहाँ कुछ विशेष नहीं चढ़ना है रोज के उपयोग की सामान्य चीजें । सिंघाड़ा ,मूली ,नीबू ,कच्ची हल्दी ,भिंगोया चना ,खीरा ,अमरूद ,अदरक ,मौसमी  और केला । इधर सेब ,संतरा ,अनन्नास भी दिखने लगे हैं । इस पूजा मे खास मिठाई बनती है । आटे में चीनी (कभी कभी गुड भी )मिलाकर अच्छी तरह माड़ लेते हैं । कुछ लोग मोयन भी डाल देते हैं । इसे हमारे यहाँ खजूर कहते हैं ।  कहीं कहीं इसको ठेकुवा भी कहते हैं । यही साधारण चीजें अर्घ्य मे चढ़ाई जाती हैं । रवीन्द्रनाथ का एक गीत अनायास याद आ जाता है देवता को क्या दूँ /जो प्रिय को दे सकता हूँ /वही देवता को भी देता हूँ /क्योंकि मैंने देवता को प्रिय बना लिया है और प्रिय को देवता । दैनंदिन जीवन का ही समर्पण है । समर्पण का उल्लास है ।
व्रत का माहात्म्य नहीं पता  पर अजब सी खुशी सब ओर फैली हुयी है । उधर गंगा बह रही हैं ,इधर खुशी का सागर हिलोरे ले रहा है । मुझे नहीं मालूम कि अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा कहीं की जाती है या नहीं । आम तौर पर तो उगते हुये सूर्य की पूजा होती है पूजा में भी और जीवन व्यवहार में भी । यहाँ डूबते हुये सूर्य की अभ्यर्थना के लिए जन समुद्र उमड़ा है । दिन भर अपने आलोक से हमारे जीवन को प्रकाशित करके ,अपनी ऊर्जा से हमे ऊर्जस्वित करके जो विदा हो रहा है , अस्त हो रहा है क्या यह उसके लिए आभार व्यक्त  करना है  । क्या यह  भोजपुरी मन की विशेषता है -कृतज्ञता और आभार से भरा हुआ !इसी बीच बादलों को भेद कर सूर्य थोड़ी देर के लिए दिखते हैं । दर्शन के लिए उमड़े जन समुद्र को हाथ हिलाते हुये झट चले जाते हैं । लेकिन इतने मे ही अर्घ्य दे दिया जाता है । लोग पने घरों की ओर लौट रहे है ,प्रसाद से भरा डाल उठाए । यही प्रसाद कल सुबह उगते हुये सूर्य को चढ़ाया जाना है ।
सप्तमी की सुबह । फिर अस्सी घाट । फिर वही जन समुद्र । कल जहां निगाहें पश्चिम की ओर लगी थीं ,आज पूरब की ओर लगी हैं । उगते हुये सूर्य का इंतज़ार । व्रत पूरा होगा । मन्नतें पूरी होने की आसूदगी । आज फिर बादल छाए हुये हैं । सूरज को उधर रामनगर की ओर से निकलना है । सबकी निगाहें उस तरफ लगी हुयी हैं । कुछ नारी कंठों ने सूरज को आदित ल्ल  बना दिया है ।क्या आदित मल्ल राजेश मल्ल के घर परिवार के हैं ! वे आदित मल्ल से उठने का आग्रह कर रही हैं । मानो किसी देवता से नहीं बल्कि घर के किसी बूढ़े बुजुर्ग से उठने के लिए कहा जा रहा है । उठिए ! अर्घ्य ले लीजिये । खैर सूरज हमारे बड़े बूढ़े हैं इससे किसको इंकार होगा । अब आदित मल्ल हैं कि बादलों से उलझे पड़े है । बादलों ने रास्ता रोक रखा है लेकिन कब तक । वो ,उधर रामनगर किले के सीध में थोड़ा ऊपर  निकल ही पड़े आदित मल्ल । बादल कब तक उन्हें रोकेंगे घर के लोगों से मिलने से  । वे निकल पड़े हैं । इंतज़ार खत्म होता है । अर्घ्य देने का सिलसिला शुरू । कुल के सबसे बड़े बूढ़े को प्रणाम करने के बाद घर के बड़े बूढ़ों को प्रणाम किया जा रहा है । व्रत पूरा हुआ । प्रसाद बट रहा है ।प्रसाद भी कैसा ! पहले डूबते हुये सूरज को चढ़ाया गया  फिर उगते हुये सूरज को । परिचितों रिशतेदारों में ही नहीं हरेक जो वहाँ पहुचा है प्रसाद पाने का हकदार है ।
छट के साथ भोजपुरी नए वर्ष कि शुरुआत हो जाती है । यह कैसा पर्व है जिसमे ऋतु के साथ तादात्म्य स्थापित किया जाता है ,उदित और अस्त होने को जीवन क्रम मान कर बराबर सम्मान दिया जाता है । विशिष्ट का इंतज़ार नहीं । सहज साधारण वस्तुओं से सहज जीवन में प्रत्यक्ष देवता कि आराधना कि जाती है । देवता भी ऐसा जो हममे जीवन का संचार करता है । हममें ही क्यों समूची प्रकृति को अपनी ऊर्जा से ऊर्जस्वित,प्रभा से भास्वित करता है । कहीं कोई भेद भाव नहीं । वह छठ माँ के रूप में ममता के अंचल में रखता है ,आदित मल्ल के रूप मे बड़े बुजुर्ग कि तरह हमारा हितू है । सहज जीवन में उपलब्ध । खुशियाँ बिखेरता हुआ ।