शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

उसे दामिनी या निर्भया ही क्यों कहें

पिछले साल दिसम्बर महीने में 16 तारीख को दिल्ली में एक लड़की के साथ चलती बस में बलात्कार हुआ। बलात्कारी उसके साथ इस दरिंदगी के पेश आये कि सारी कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। बलात्कार की घटनाएँ आए दिन होती रहती हैं। हमारे समाज में बलात्कार और हत्या भी कोई नई या अचरज वाली खबर नहीं हैं। लेकिन इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। दिल्ली उबल पड़ी थी । देश भर में अनेक प्रदर्शन हुए, रैलियाँ निकाली गयीं। स्त्री के साथ होने वाले अन्याय पर ऐसा उद्वेलन पहले कभी नहीं देखा गया था। इसकी अनुगूँज संसद से सड़क तक और रैदास गेट;बनारस द्ध से इण्डिया गेट तक सुनाई पड़ी। आम तौर पर ऊँचा सुनने वाली संसद भी इस घटना से विचलित नजर आई। स्त्री के सुरक्षा और त्वरित लाभ के लिए कानून बनें। स्त्री को न्याय दिलाने के लिए फास्ट ट्रेक कोर्ट बनें । स्त्री सशक्तिकरण और सुरक्षा के नजरियें से भारी विचार मंथन हुआ। दरिंदगी की शिकार लड़की को शहीद का दर्जा दिया गया। घटना के साल भर पूरा होने पर पीड़िता की स्मृति में अनेक संस्थाओं ने कार्यक्रम किये। कई सरकारों ने उसकी स्मृति फेलोशिप आदि जारी करके स्त्री सम्मान स्वाभिमान सुरक्षा के प्रति अपनी एकजुटता दिखायीं। इस पूरी प्रक्रिया में बस वह लड़की भुला दी गई। पीडि़त लड़की को शहीद और देवी का दर्जा दे दिया गया। मीडिया ने उसे निर्भया या दामिनी नाम दिया। निर्भया शायद इसलिए की वह अन्तिम साँस तक दरिंदों से लड़ती रही। उसकी लड़ाई मर्दवादी सोच पर बिजली की तरह गिरी, शायद इसीलिए उसे दामिनी नाम दिया गया। लेकिन वास्तव में ये उसके नाम नहीं हैं ये उसके नाम को छुपाने के लिए रचे गये विशेषण है। विशेषण वहाँ तक तो ठीक है जहाॅं तक वे विशेष्य की विशेषताएँ बताएं। यहाँ तो मामला एकदम उलटा है। विशेष्य की पहचान लुप्त करके विशेषण की महिमा मण्डित किया जा रहा हैं। महिमा मण्डन के मामले में हमारा कोई सानी नहीं हैं। खासतौर से स्त्रियों के मामलें में। हम स्त्रियॉं को बराबरी का दर्जा नहीं दे सकते हैं। उसे देवी, दुर्गा या काली कहकर पूजा तो कर सकते हैं, पर उसे साधारण मनुष्य की गरिमा देना हमें गवारा नहीं । हमें कष्ट होने लगता हैं। मिथक और इतिहास में ही नहीं सामान्य जीवन में भी स्त्रियाँ असामान्य शारीरिक एवं मानसिक क्षमता का परिचय देती है। प्रायः हम इसे नजरदंाज कर जाते हैं। जब मामला नजरदंाज करने लायक नहीं रह जाता ह है तो फट उसे देवी बनाकर पूजना शुरु कर देते हैं। पूजा शुरु हुई नहीं कि उसका सामान्य स्त्री या सामान्य मनुष्य रूप भुला दिया जाता है । विचार करना चाहिए कि कहीं हम इस लड़की की वास्तविक पहचान भुलाकर इसी पुरानी कहानी को तो नहीं दुहरा रहे हैं। इस तरह हम निर्भया या दामिनी के रूप में उसे गौरवान्वित करेंगे। और उसकी वास्तविक पहचान छुपा देंगे। इसके पीछे तर्क यह है कि पीडि़ता का नाम उजागर होने से उसके बदनाम होने का खतरा है। एतराज इसी तर्क पर होना चाहिएैं। स्त्रियाँ मर्दो की दंरिदगी का शिकार होती रही है। वे अपनी मर्जी से बलात्कार या शारीरिक मानसिक दुर्व्यवहार को आमंत्रित नहीं करती हैं । मजे की बात यह है कि मर्दवादी सोच के दायरे में जो दरिंदगी का शिकार है वह बदनाम हो जाता है और दरिंदगी को अंजाम देने वाला नहीं। दरिंदगी व वहशीपन उसे और ज्यादा मर्द होने का प्रमाण पत्र देता है। इसलिए देेखे तो ऐसे दरिंदे या वहशी जब पकड़े जाते है तो जेल या कचहरी जाते समय उनके चेहरों पर ग्लानि या अपराध बोध नहीं बल्कि एक तरह का गुरुर टपकता रहता है। जो दरिंदगी का शिकार होती है उसका नाम इस तर्क से पोशीदा रखा जाता है कि वह बदनाम हो जायेगी। उसका सामाजिक जीवन मुश्किल हो जायेगा। उसका पति उससे नफरत करने लगेगा, उसका प्रेमी उससे मुॅंह मोड़ लेगा, उसका बेटा हीन ग्रन्थि से ग्रसित हो जायेगा। ऐसा इसलिए की सामान्य मर्दवादी सोच यही है कि स्त्रियाँ ही दोषी होती है। वे चाहे किसी हादसे ए वहशीपन या दरिंदगी का शिकार ही क्यों न हों। किसी भी तरह स्त्री की देह प्रभावित हुई है तोे वह संदेह के घेरे में आ जाती है। औरों की बात ही क्या की जाय। लंका विजय के बाद जब सीता भगवान राम के सामने लायी जाती हैं तब स्वयं राम सीता से यह कहते हैं मैं यह मानने की तैयार नहीं हॅंू कि आप जैसे सुन्दरी को घर में रखकर रावण जैसा दुष्टात्मा अपने को आप से दूर रख पाया होगा। सीता के लाख कहने पर कि शरीर मेरे वश में नहीं थाएइसे भले ही किसी ने छू दिया होए मेरा मन सदैव आप के प्रति समर्पित रहा हैए उन्हें अग्निपरीक्षा देनी पड़ती है। अग्नि परीक्षा में सफल होने के बाद भी राम का सन्देह अपनी जगह बना रहता है। तो जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम का यह हाल है वहाँ साधारण मर्द की सोच का अंदाजा लगा सकते हैं। दरअसल यह मर्दवादी सोच का विस्तार है जमाने से मर्द लोग स्त्री का दैहिक शोषण इस बिना पर ही करते रहे हैं कि यदि मामला उजागर हो गया तो स्त्री ही दोषी मानी जायेगी। हमारी बोलियों में ऐसी अनेक कहावतें मिल जायेंगी जिससे इस बात की तसदीक होती हैं-लाजें पतौह बोलें ना सवादे ससुर छोड़े ना ( शर्म के मारे पुत्रवधू बोल नहीं पाती इसलिए श्वसुर अपनी हरकत से बाज नहीं आते । ) इस सोच के इस कदर सामाजिक स्वीकार्यता मिली है कि इसे कानून का दर्जा दे दिया गया है । पीडि़त स्त्री का नाम उजागर करने वाला ही अपराधी मान लिया जाता है। किसी हादसे का शिकार होने पर कोई भी पुरुष बदनाम नहीं होताएउल्टे उसे सहानुभूति ही मिलती है । फिर जो दिल्ली या कोलकाता में हुयी हैवानियत का का शिकार है बदनामी की आशंका से उसका नाम क्यों छुपाया जाये । लेकिन ऐसे मामलों में में शिकार को ही दोषी मान लेने की मानसिकता के कारण एक लड़की जिसने अपनी जान गवां दी एमरने के बाद उसे अपनी पहचान भी गवानी पड़ रही है ै। लेकिन मर्दवादी सोच पर आधारित सामाजिक विधान स्त्री को दोषी मानता है।स्त्रियॉं के ड्रेस कोड को लेकर होने वाली बहसों के मूल में भी यही सोच काम कर रही है । इस मामले में मर्दवादी सोच पर आधारित सामाजिक विधान के अनुरूप कानून भी है । इस मर्दवादी मानसिकता और इस पर आधारित कानून को अगर नहीं बदला गया तो स्त्री मुक्ति के सपने और सशक्तिकरण के सारे प्रयास धरे के धरे रह जायेंगे। जिस लड़की की कुर्बानी से स्त्रियॉं के अधिकार और सुरक्षा आदि को लेकर इतनी बहस चली एअनेक सख्त कानून बनें उसका नाम ही छुपा दिया गया । उसकी पहचान छुपाना दरअसल मर्दवादी मानसिकता को बनाए रखने की कोशिश है। इसलिए क्या यह उचित नहीं की पीड़िता की पहचान को दामिनी और निर्भया जैसे भारी भरकम विशेषणों के नीचे ढकने के बजाय उसकी वास्तविक पहचान सामने लाने की हिम्मत दिखाई जाये ।

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