रविवार, 5 जनवरी 2014
भिखारी ठाकुर की आवाज
अभी अभी मैं भिखारी ठाकुर की जन्मभूमि और कर्मभूमि छपरा से लौटा हूँ ।मेरे मित्र और भिखारी ठाकुर रचनावली के प्रधान संपादक प्रो वीरेंद्र नारायण यादव ने बताया कि यहाँ भिखारी ठाकुर की जयंती मनाने की तैयारियां ज़ोर शोर से चल रही हैं । छपराए सिवान आरा से लेकर पटना तक एक साथ नौ.दस नगरों और उपनगरों मे तरह तरह के आयोजन हो रहे हैं । ठिठुरते जाड़े में खुले मैदान में नाट्य प्रस्तुतियाँ होने वाली हैं । यह सारा आयोजन स्वतरूस्फूर्त है । मुझे अपने बचपन की कुछ बातें याद हो आयीं । गाँव में जब तब भिखारी ठाकुर की चर्चा करते हुये लोग मिल जाते थे । चर्चा इस बात की होती कि भिखरिया के नांच में किस कदर भीड़ उमड़ती थी और किस तरह लोग पागल हो उठते थे और कैसे व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और प्रशासन को नाकों चना चबाना पड़ता था । भिखारी ठाकुर दिलोदिमाग में किसी लिजेंड की तरह बनए हुये हैं । केदारनाथ सिंह की कविता भिखारी ठाकुर ने इस भाव को और गहन बनाया है । उनकी कविता भिखारी ठाकुर के नांच को आजादी की लड़ाई से और विदेशिया की लय को राष्ट्रगान की लय से ही नहीं बल्कि भिखारी ठाकुर को गांधी से जोड़ती है। गांधी और भिखारी ठाकुर में क्या समानता हो सकती है एइस पर विचार करने का मन हो रहा है घ्
छपरा जिले के छोटे से गाँव कुतुबपुर से भिखारी ठाकुर खड़गपुर ;पश्चिम बंगाल द्धगए । उन दिनों आजीविका की तलाश में लोग बाग कलकत्ता ;अब कोलकाता द्धजाते थे । वहीं पर भिखारी ठाकुर को नाटक नौटंकी की लगन लगी । वहाँ से थोड़े दिन बाद भिखारी कुतुबपुर लौट आए । विदेसिया के प्रमुख पात्र विदेसी की तरह भिखारी को भी यकीन हो चला था .क़हत भिखारी भिखार होई गइलीं दौलत बहुत कमा के । बहुत दौलत कमा लेने के बाद मैं दरिद्र हो गया हूँ । जैसे दौलत की अधिकता दरिद्रता की निशानी हो । प्रेमचंद ने अपने समय में विकसित हो रही महाजनी सभ्यता के लक्षणो को ठीक से पहचाना था । भिखारी ठाकुर उस महाजनी सभ्यता की खूबियों को महज एक पंक्ति मे बड़े मार्मिक ढंग से कह देते हैं । पूंजी केन्द्रित विकास की अवधारणा हमें सांस्कृतिक रूप से दरिद्र बनाए दे रही है । हमारी मानवीय संवेदना अकादमिक चर्चा तक महदूद रह गयी है । कुतुबपुर लौटकर भिखारी ने अपनी नाटक मंडली बनायी और उसके माध्यम से नयी पनप रही सभ्यता की समीक्षा करने लगे । व्यंग्य उनका सबसे प्रमुख औज़ार है । भिखारी ठाकुर का व्यंग्य दरअसल भोजपुरी भाषा की अपार रचनात्मक संभावना का अर्क है । भोजपुरी जीवन और समाज को भिखारी ठाकुर अच्छी तरह जानते तो थे ही एकुछ दिन कलकत्ता रहकर उसे पहचान भी गए । उसकी खूबियों को ही नहीं खामियों को भी एसरल सरस जीवन संगीत में छुपी विसंगतियों और विडंबनाओं को भी ।कठिन बीहड़ जीवन स्थितियों की दयनीयता और बेचारगी को धता बताती उद्दाम जिजीविषा को भी । जिस तरह गांधी को भारत को देखने की नज़र दक्षिण अफ्रीका में मिली उसी तरह भिखारी ठाकुर को खड़गपुर .कलकत्ता में अपने समाज को देखने की नजर हासिल हुयी । प्रिय और अतिपरिचित को देखने के लिए एक वस्तुगत दूरी चाहिए ही होती है । अपने नाटकों में भिखारी ठाकुर ने नयी नज़र से देखे सुने अपने गाँव.समाज का अंकन किया है ।इसीलिए भिखारी ठाकुर के नांच में लोगों को मुक्ति का संगीत सुनाई पड़ा । उन्हें लोगों का बेशुमार प्यार हासिल हुआ । गांधी की तरह भिखारी ठाकुर को इस बात का इल्म था कि गांवों को बेहाल कर के देश का विकास नहीं हो सकता । दिल्ली कलकत्ता और पटना से गाँव को देखना एक बात है एगाँव मे जाकर उसे देखना बिलकुल अलग बात है । गाँव की आवाज दुनिया को सुनाने के लिए गांधी सेवाग्राम से बोलते हैं तो भिखारी ठाकुर कुतुबपुर से –क़हत भिखारी कुतुबपुर के नया गीत बनवइया । सेवाग्राम से गांधी की आवाज सारी दुनिया के साम्राज्यवादियों ने सुना केवल उनके चेलों ने ही उसे अनसुना कर दिया ! क्या वैसे ही हम भिखारी ठाकुर की आवाज को अनसुना कर रहे हैं . 18- 12-2014
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