परमानंद जी नहीं रहे ,यह सुनने के लिए मन उसी दिन से तैयार हो रहा था जिस दिन से उनके अस्पताल मे भर्ती होने की खबर मिली थी । सब प्रार्थनाएँ , शुभकामनायें और सदिच्छाएँ धरी रह गईं ।और परमानंद जी चले गए । कभी किसी प्रसंग मे परमानंद जी ने दाग एक शेर पढ़ा था जो बड़े त्रासद ढंग से परमानंद जी के प्रसंग में भी मौजू लगने लगा था –
होश-ओ-हवाश ताब-ओ-तवा दाग सब गया ।
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया ।
परमानंद जी भले ही अब गए हों ,उनकी शख्शियत तो पहले ही चली गयी थी । खराब स्वास्थ्य और स्मृति मे गड्ड मड्ड हो जाने के साथ ही उनके आवाज की बुलंदी खामोश हो गयी थी । उनकी उपस्थिति महज विनोद की वस्तु होकर रह गयी थी । इस हाल मे भी लोग बाग उनका मज़ाक उड़ाने बाज नहीं आ रहे थे । उन्हें प्यार करने वाले लोगों के लिए बेहद यातनादायी अनुभव क्षण थे ।इसे नियति का क्रूर व्यंग्य ही कहेंगे कि कि जीवन भर आदर ,स्पृहा और बहुधा ईर्ष्या के आलंबन रहे परमानंद जी हास्य और विनोद के आलंबन हो गए थे । इसलिए उनकी विदाई प्रतीक्षित थी ।
लेकिन एक परमानंद जी हमारे भीतर मौजूद हैं । और मौजूद रहेंगे । हम न मारे मरिहें संसारा के तर्ज़ पर ।
परमानंद जी से मेरी पहली भेंट 1980 मे हुयी थी । तब मैं बी ए का छात्र था ।छात्र क्या विधिवत छात्रनेता था जिसका पढ़ाई लिखाई से कुछ लेना देना नहीं था । पडरौना के उदित नारायण कॉलेज में। जहां थोड़े दिन पहले तक केदारनाथ सिंह प्राचार्य थे । वहाँ समकालीन कविता पर संगोष्ठी थी । जाड़े का दिन था । बाहर से आए विद्वानों में परमानंद जी की लंबाई सबसे कम थी । मोटा ऊनी कुर्ता, पाजामा और साल ओढ़े परमानंद जी छुपे से बैठे थे । केवल उनकी चमकती हुयी आँखें ही उनकी शख्शियत का पता दे रही थीं । जब वे बोलने के लिए खड़े हुये तो उनकी खनकती हुयी आवाज ने हम सबका ध्यान खींचा । लगा जैसे उनका पूरा शरीर ही वाकयंत्र है । वे पूरे शरीर से बोलते थे ,बल्कि उनका वजूद उनकी आवाज में ही उतर आया था । इस आवाज का जादू तब समझ मे आया जब हम विधिवत उनके छात्र हुये । 1981-1984 में एम ए की कक्षाओं में। पहले पहल वे मुक्तिबोध की कवितायें पढ़ाते हुये मिले । पहली ही कक्षा में हमारी चेतना में कहीं कुछ टूट रहा था ,कुछ बदल रहा था । मैं गोरखपुर पढ़ने नहीं आया था । छात्र राजनीति के लिए छात्र होना ज़रूरी था । इसलिए एमए हिन्दी का छात्र बन गया । एक निहायत पिछड़ी और सामंती पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति की चेतना को बदलने मे परमानंद जी की कक्षाओं की जबर्दस्त भूमिका थी । मेरे जैसे कितने लोग होंगे जिन्हें परमानंद जी की जादुई आवाज ने बदला होगा । परमानंद जी का पूरा व्यक्तित्व ही उनकी आवाज मे महदूद था । जब वे बोलने खड़े होते थे उनका रूपान्तरण हो जाता था । ऐसा तभी संभव होता है जब अपने बोले पर अखंड विश्वास हो । परमानंद जी साहित्य में सब कुछ छोड़ कर आए थे । साहित्य की दुनिया से वापसी के सारे पुल जलाकर आए थे -निहत्थे । शब्दों के सामर्थ्य पर उन्हें पूरा भरोसा था । उनकी आवाज इस भरोसे की आवाज थी , सामंतविरोधी विचारों की आवाज थी। हर तरह की कुंदता को खत्म करके चेतन बना देने वाली । इस आवाज ने कितनों को बदला , कितनों को बनाया हिसाब लगाना मुश्किल है । परमानंद जी की साहित्य यात्रा के सहयात्री केदारनाथ सिंह ठीक ही कहते हैं –परमानंद जी ने गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण को आधुनिक बनाया ।
सोच रहा हूँ ,परमानंद जी के बगैर गोरखपुर कैसा लगेगा ?कितना खाली ,और कैसा खाली ।......... इस खालीपन का हिसाब कौन करेगा । आधुनिक साहित्यिक चेतना का प्रेरक और प्रसारक ,एक निर्माता अध्यापक ,साहित्य का संगठन कर्ता,साहित्य की दुनिया का नागरिक अपनी किताबों ,पत्र पत्रिकाओं ,लेखों कविताओं और खनकती हुयी दमदार आवाज को छोडकर चला गया । गालिब याद आते हैं –थी वह इक शख्स के तसव्वुर से /अब वह र’अनाइ-ए-ख़याल कहाँ ।
गोरखपुर में रहते हुये उन्हें कई मोर्चों पर लड़ना पड़ा । एक पुरातन सामंती सोच वाले शहर मे नए साहित्य के लिए बिलकुल जगह नहीं थी । जहां विश्वविद्यालय जैसी संस्था भी जड़ता का शिकार हो वहाँ और जगहों की कल्पना भी कैसे की जा सकती थी । हिन्दी विभाग में रहते हुये परमानन्द जी ने नए साहित्य के लिए जगह बनाई । गोरखपुर विश्वविद्यालय में जब तक रहे साहित्य की मुख्यधारा और साहित्य के वर्तमान से उसे जोड़े रखा । उनके लिए आलोचना का स्मृति और वर्तमान से निरंतर संवाद थी ।यह संवाद उन्होने शैक्षणिक जीवन मे भी बनाए रखा । कबीर और जायसी ,निराला,प्रेमचंद , मुक्तिबोध से होते हुये केदारनाथ सिंह ,रघुवीर सहाय ,कुँवर नारायण तक और साहित्य मे आने वाली युवा और युवतर पीढ़ी तक उनकी नज़र थी । नया से नया और बड़ा से बड़ा लेखक परमानंद जी के माध्यम से अपने को गोरखपुर से जुड़ा महसूस करता था ।
गोरखपुर प्रेमचंद की कर्मभूमि रही है ,इसे गोरखपुर के साहित्यिक वातावरण मे जीवंत करने मे अकेले परमानंद जी ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी । श्रीमती शांता सिंह की अध्यक्षता में परमानंद जी ने विश्वविद्यालय मे प्रेमचंद पीठ स्थापित करने का मुहिम छेड़ा और उसे अंजाम तक पह्नुचाया । प्रेमचंद की स्मृति उनके लिए सामंती चेतना के विरोध का सशक्त माध्यम थी । इसीलिए परमानंद जी प्रेमचंद से जुड़ी हर गतिविधि के सहयात्री बन जाते थे । गोरखपुर मे प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना को लेकर वे बेहद उत्साहित थे ।प्रेमचंद साहित्य संस्थान को साहित्य का वैकल्पिक केंद्र बनाने मे उनकी बड़ी भूमिका थी ।प्रेमचंद संस्थान से त्रिलोचन ,श्रीलाल शुक्ल ,भीष्म साहनी ,राजेंद्र यादव ,नामवर सिंह ,केदारनाथ सिंह ,मार्कन्डेय ,दूधनाथ सिंह जैसे नामचीन साहित्यकारों को जोड़ना परमानंद जी के बूते की ही बात थी । प्रेमचंद साहित्य संस्थान की प्रगति और विकास के लिए वे लगातार चिंतित और सक्रिय रहे । प्रेमचंद साहित्य संस्थान के अध्यक्ष के रूप में उन्होने सदैव हमारा मार्ग दर्शन किया ।
साहित्य मे नए लेखकों पर जितना परमानंद जी ने लिखा उतना शायद ही किसी और हिन्दी आलोचक ने लिखा होगा । देखें तो नयी महिला रचनाकारों की बहुसंख्या को हिन्दी जगत से परिचित कराने में भी वे सबसे आगे खड़े मिलेंगे । नए लेखकों और नए विचारों के प्रति उनका नजरिया सदैव सकारात्मक था । नए से नए लेखक पर लिखने बोलने से उन्होने कभी गुरेज नहीं किया । इसी तरह नयी संस्थाओं को बल देने मे वे सदैव तत्पर रहे । नए लेखक पर लिखना आलोचकीय साहस की मांग करता है । परमानंद श्रीवास्तव मे यह आलोचकीय साहस अपनी पीढ़ी के आलोचकों मे सबसे ज्यादा था । शायद यही वजह है की आज परमानंद जी कमी नए लेखक कहीं ज्यादा शिद्दत से महसूस कर रहे हैं ।
परमानंद जी से मैंने आखिरी दिनों में आत्मकथा लिखने का प्रस्ताव किया था । लेकिन देर हो चुकी थी । सिलसिलेवार आत्मकथा लिख पाने की हालत में वे नहीं रह गए थे । आखिरी मुलाक़ात मे उन्होने मुझे 20-25 पृष्ठों की हस्तलिखित सामग्री दी है । सुंदर और सधी हुयी लिखावट में 20-25 पृष्ठ । यह आत्मकथा तो खैर किसी तरह नहीं है । यह अनेक रचनाकारों ,रचनाओं ,विचार यात्राओं का ढीला ढाला कोलाज जैसा है ,जिसका शीर्षक दिया है –साहित्य से निर्वासन । और पहला वाक्य है ‘साहित्य में रहने के लिए निर्वासन जरूरी है’। अपने आखिरी दिनों में परमानंद जी एक तरह से निर्वासन झेल रहे थे । अब निर्वासन ही साहित्य में बने रहने का उपाय था । बक़ौल फैज -आस उस दर से टूटती ही नहीं /जाके देखा न जा के देख लिया ।
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