स्वामी विवेकानन्द विश्व नागरिक थे। वे उन
लोगों में नहीं थे जो मानते हैं कि भारत विश्व गुरु है और उसे दुनिया को सिखाने का
हक हासिल है, सीखने का नहीं। ऐसी फर्जी और एकांगी
विश्वगुरुता से विवेकानन्द कोसों दूर रहे। वे पूरब और पश्चिम के लोगों से ही नहीं,
संस्कृतियों
से भी संवादरत थे। भारत से और मुख्यतः वेदान्त दर्शन से उन्होंने जो कुछ सीखा था
उसे विश्व मानवता के बीच जाँचा परखा था। इस तरह वे दुनिया विशेषकर पश्चिम की
दुनिया को जितना सिखा रहे थे, उतना ही सीख रहे थे। भारत में दुनिया
को देने लायक जो कुछ था वह दे रहे थे। भारत के लिए दुनिया में जो कुछ उपयोगी लगा
उसे भारत के लिए सँजो रहे थे। दुनिया से संवाद करते हुए विवेकानन्द ने अनुभव किया
कि भारत की कमजोरी का सबसे बड़ा कारण अशिक्षा है।वे शिक्षा के प्रसार को भारत का मुक्ति मार्ग
मानते थे।
उनकी स्पष्ट धारणा थी कि हमारे देश का
दुर्भाग्य यही है कि इस देश में कुछ मुट्ठी भर लोगों ने सम्पूर्ण शिक्षा और बुद्धि
पर एकाधिपत्य कर लिया है। इस एकाधिपत्य को तोड़ कर ही देश और समाज को उन्नत बनाया
जा सकता है। इस एकाधिपत्य को कायम करने में संस्कृत भाषा की भूमिका भी महत्वपूर्ण
है। विवेकानन्द ज्ञान पर किसी भी प्रकार की इजारेदारी के खिलाफ थे। वर्ण व्यवस्था
ज्ञान पर कुछ वर्गों या समूहों की इजारेदारी कायम करती रही है। भारत का सारा
प्राचीन ज्ञान-विज्ञान संस्कृत भाषा में निबद्ध रहा है। संस्कृत देवभाषा है इसलिए
संस्कृत पढ़ने का अधिकार भी कुछ मुट्ठी भर लोगों के लिए सीमित रहा है। इस तरह
एकाधिकार कायम करके कुछ लोग ज्ञान की शक्ति का उपयोग जन सामान्य का शोषण करने में
करते रहे हैं। विवेकानन्द इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं। वे इस तथ्य को अच्छी तरह
देख पाते हैं कि व्यापक जन समुदाय को शिक्षा से वंचित करके उसका शोषण किया गया। वे
सबसे पहले शिक्षा की मुक्ति का सवाल उठाते हैं। विवेकानन्द कहते हैं- ‘हमारे
शास्त्र ग्रंथों में आध्यात्मिकता के जो रत्न विद्यमान है और जो कुछ ही मनुष्यों
के अधिकार में मठों और अरण्यों में छिपे हुए हैं, सबसे पहले
उन्हें निकालना होगा। जिन लोगों के अधिकार में ये छिपे हुए हैं, केवल
वहीं से इस ज्ञान का उद्धार करने से काम न होगा, किन्तु उससे भी
दुर्भेद्य पेटिका अर्थात् जिस भाषा में ये सुरक्षित हैं उस शताब्दियों के संस्कृत
शब्दों के जाल से उन्हें निकालना होगा।’ विवेकानन्द का यह वाक्य अनेक दृष्टियों
से क्रान्तिकारी है .संस्कृत भाषा में निबद्ध ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते हुए भी
विवेकानन्द संस्कृत को ज्ञान की दुर्भेद्य पेटी मानते हैं। इस पेटी में बँधे ज्ञान
को जन साधारण के लिए मुक्त करने का आह्वान करते हैं।
संस्कृत की दुर्भेद्य पेटी से ज्ञान कैसे मुक्त
हो? इसके लिए विवेकानन्द लोकभाषाओं के पास जाते हैं. विवेकानन्द अच्छी
तरह जानते थे कि संस्कृत भाषा के माध्यम से ज्ञान को सार्वजनिक सम्पत्ति नहीं
बनाया जा सकता। वे स्वीकार करते हैं कि ‘जीवन भर संस्कृत भाषा का अध्ययन करने
के बावजूद कोई नयी किताब उठाने पर मुझे स्वयं कठिनाई होती है। तो फिर जिन्होने
संस्कृत का अभ्यास नहीं किया है उन्हें कितनी कठिनाई होगी।’ इसीलिए
विवेकानन्द जन सामान्य को बोलचाल की भाषा में शिक्षा देने की बात करते हैं। ज्ञान
को मातृभाषाओं के माध्यम से जनसामान्य तक पहुँचाने का आह्वाहन करते हंै।
भक्तिकाल के कवियों ने जिस तरह बोलियों के
महत्व को स्वीकार किया और उसे स्थापित किया लगभग उसी तरह विवेकानन्द भी लोक भाषाओं
के माध्यम से जनसमुदाय को शिक्षित करने की बात करते हैं। यूनेस्को का कहना है कि
मातृभाषाएँ समझ का बेहतर माध्यम हो सकती है। दुनिया भर के शिक्षाविद् इस बात पर
जोर दे रहे हैं कि मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा देना अधिक उपयोगी है क्योंकि
मातृभाषा के ध्वनि प्रतीकों से बालक भली प्रकार परिचित होता है। इससे समझ की
प्रक्रिया आसान हो जाती है। विवेकानन्द ज्ञान पर से एकाधिकार खत्म करके उसे
सार्वजनिक बनाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें लगता है कि मातृभाषाओं के माध्यम से
यह कार्य किया जा सकता है। शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने के लिए विवेकानन्द उसे लोक
भाषाओं-मातृभाषाओं के माध्यम से पहुँचाने की बात करते हैं।
उन्हें
अच्छी तरह मालूम है कि हमारे देश की गरीब जनता शिक्षा के लिए स्वतः आगे नहीं
आयेगी। क्योंकि गरीब लड़के पाठशाला में आने की अपेक्षा अपने पिता की सहायता करने
खेतों में जाना या जीविका के लिए और कोई धन्धा करना पसन्द करेंगे। इस वास्तविकता
से परिचित होने के नाते विवेकानन्द दूसरा ही उपाय निकालते हैं। उनका प्रसिद्ध कथन
है कि यदि पहाड़ मुहम्मद के पास नहीं जाता तो पहाड़ ही मुहम्मद के पास क्यों न
जायें। यानी हिन्दुस्तान का गरीब मेहनतकश किसान यदि शिक्षा के पास नहीं पहुँचता तो
शिक्षा को उसके पास पहुँचना चाहिए। विवेकानन्द इसके लिए धर्मोपदेश करते हुए घूमने
वाले सन्यासियों का आह्वान करते हैं कि उन्हें अपने को शिक्षक के रूप में संगठित
करके धर्मोपदेश करने के साथ लोगों को ज्ञान विज्ञान की शिक्षा भी देनी चाहिए। यह
देखकर घोर आश्चर्य होता है कि आज विज्ञान के गर्भ से उपजी हुई तकनीक जन समुदाय के
बीच रूढि़ और अन्धविश्वास फैलाने में लगी है जबकि एक संन्यासी जन साधारण को ज्ञान
विज्ञान से लैस करना चाहता है बल्कि इसके लिए धर्मोपदेशकों एवं संन्यासियों का
आह्वान करता है।वे एक घुमन्तू शिक्षालय की कल्पना करते हैं जो गरीब और असहाय लोगों
के पास पहुँचकर उन्हें शिक्षित करे।
विवेकानन्द
लोकभाषा की बात करते हुए इतिहास से भी सबक लेते हैं। महात्मा बुद्ध ने जनता की
भाषा में उपदेश किया और व्यापक जन तक अपनी शिक्षाओं को पहुँचाने में सफल हुए। उनके
प्रभाव से संस्कृत की शिक्षा बन्द हो गयी। विवेकानन्द कहते हैं कि इससे संस्कृत का
वैशिष्ट्य कायम रहा और आगे चलकर संस्कृत और संस्कृत में निबद्ध ज्ञान का महत्व फिर
से स्थापित हो गया। इसलिए विवेकानन्द संस्कृत को उपेक्षित नहीं छोड़ना चाहते।
मातृभाषाओं के माध्यम से शिक्षा दी जाय, इसके साथ ही संस्कृत की शिक्षा भी जारी
की जाय। इसके लिए विवेकानन्द अद्भुत तर्क देते हैं । उन्हें यह आशंका लगती है कि
लोकभाषाओं के प्रचार के बाद संभव है, कोई दूसरी जाति संस्कृत में निष्णात हो
जाय और विशिष्ट होने का दावा करे। विवेकानन्द संस्कृत की इस विशिष्टता को समाप्त
कर देना चाहते है। अगर जन सामान्य संस्कृत में दक्ष होगा तो संस्कृत का अजूबापन या
वैशिष्ट्य अपने आप खत्म हो जायेगा। विवेकानन्द किसी भी तरह संस्कृत का वैशिष्ट्य
और इस बहाने किसी जाति या वर्ण विशेष के वैशिष्ट्य को समाप्त कर देना चाहते हैं
क्योंकि भारत के सामान्य जन के शोषण और दुखों के मूल में यह वैशिष्ट्य ही है।
इसलिए विवेकानन्द किसी भाषा वर्ग या जाति के वैशिष्ट्य के बरक्स सामान्य को तरजीह
देते हैं
विवेकानन्द
इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि इस देश में स्त्रियों और पुरुषों में इतना भेद
क्यों रखा गया है। वेदान्त की घोषणा है कि सभी प्राणियों में परमात्मा विद्यमान
है। इसलिए विवेकानन्द को यह बात सख्त नागवार लगती है कि स्त्रियों को इस देश में
महज सन्तानोत्पादक यन्त्र बनाकर रखा गया है। इसकी असली वजह उन्हें शिक्षा से वंचित करना रहा है।
इसीलिए विवेकानन्द जनसामान्य की शिक्षा पर जितना जोर देते है उतना ही जोर स्त्री
शिक्षा पर भी देते हैं।
विवेकानन्द
स्त्रियों को अबला के रूप में शिक्षित करने के खिलाफ है। वे भारतीय स्त्रियों की
सभी समस्याओं के मूल में उनके भीतर शिक्षा का अभाव मानते हैं। इसीलिए वे स्पष्ट
तौर पर घोषित करते हैं कि स्त्रियों की सभी समस्यायें शिक्षा नाम के जादू से खत्म
की जा सकती है। यद्य़पि वे स्त्री शिक्षा के लिए तमाम परम्परागत बातों पर भी जोर
देते हैं फिर भी वे स्त्री को स्वाधीन देखता चाहते हैं। ‘स्त्रियों को
ऐसी अवस्था में रखना चाहिये कि वे अपनी समस्याओं का अपने ही तरीके से हल कर सकें।
हमारी भारतीय स्त्रियाँ इस कार्य में संसार की अन्य स्त्रियों के समान ही दक्ष
हैं।’
स्वामी
विवेकानन्द ने अपने वेदान्त के ज्ञान को यथार्थ की कसौटी पर कसा था। वे भारतीय
समाज में मौजूद पाखण्ड को भली भाँति समझते थे। वे देख रहे थे कि सैद्धान्तिक रूप
से भले ही भेदभाव न बरता गया हो लेकिन व्यावहारिक रूप से भेदभाव मौजूद है। शक्ति
पूजा के केन्द्र बंगाल मे ंरहते हुए विवेकानन्द ने अनुभव किया कि महज प्रतीक रूप
में शक्ति पूजा करने से काम नहीं चलेगा। जरूरत यथार्थ शक्तिपूजा की है। वे कहते हैं-
‘यथार्थ शक्ति पूजक तो वह है, जो यह जानता है कि ईश्वर विश्व में
सर्वव्यापी शक्ति है और जो स्त्रियों में उस शक्ति का प्रकाश देखता है।‘
विवेकानन्द हिन्दुस्तान में इस यथार्थ
शक्तिपूजा के हिमायती थे। इस यथार्थ शक्तिपूजा का मूल मन्त्र स्त्री शिक्षा में
देखते हैं। वे स्त्रियों के लिए अलौकिक और लौकिक दोनों तरह की शिक्षा की जरूरत पर
बल देते हैं। ऐसी शिक्षा जो स्त्रियों को स्वतंत्र और शक्तिशाली बनाये, दूसरे
गुणों के साथ उनके भीतर शूरता और वीरता का
संचार करे।
वास्तव में विवेकानन्द शिक्षा को सर्वजन सुलभ बनाने वाले विचारक हैं।
भारतीय समाज मे ंपरम्परा से जिन लोगों को शिक्षा और ज्ञान से वंचित रखा गया और
शक्तिहीन, गुलाम और दरिद्र बनाया गया उन्हें शिक्षित करना। हिन्दुस्तान का
किसान, मजदूर, दलित उपेक्षित वर्गों के साथ स्त्रियाँ भी
शिक्षा के वरदान से वंचित रखी गयी थीं। शिक्षा को ही बन्धन में बांध कर रखा गया
था। विवेकानन्द शिक्षा को हर तरह के बन्धन से मुक्त करने का आह्वान करते हैं। उसे
जाति, धर्म, लिंग, भाषा आदि के बंन्धन से मुुक्त करके
सर्वजन सुलभ बनाना चाहते हैं। वे शिक्षा की सार्थकता इसी रूप में देखते हैं।
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