किस्सा है
नालंदा के एक शख्स का
बड़े काबिल थे
इल्मी थे
शायर थे
दाना थे
नालंदा में प्रोफ़ेसर थे
दूर दूर तक उनकी दानाई के किस्से
मशहूर थे
लोग आते थे
लोग जाते थे
अखबारों में चर्चे थे
नादान दोस्तों से घिरा एक परदेशी
किसी दाना की तलाश में
नालंदा आ पंहुचा
किसी बच्चे से पूछा -
यहाँ कोई दाना रहता है
बच्चे ने उनके घर की ओर इशारा करते हुए कहा
वहां ,वहां
परदेशी फट पंहुच गया दाना के घर
और बोला
मैं नादान दोस्तों से घिरा हूँ
मुझे एक ऐसे शख्स की तलाश है जो
दाना हो
दोस्त हो या दुश्मन
बड़ी उम्मीद से आया हूँ
आपके पास
बच्चा बच्चा जानता है कि आप दाना है
वे खुश हुए
यह जानकार कि
बच्चा बच्चा जानता है वे दाना है
अपनी दानाई पर रीझते चले गए वे
इस कदर रीझे कि
खुद को
दाना और सिर्फ दाना के रूप में जानने लगे
यहीं एक गड़बड़ हुयी
दाना का एक पुराना अर्थ
चुपचाप चिपक गया
दाना से
वे सोचने लगे
चिड़िया तो दाना का बस एक ही अर्थ जानती है
अगर उसने मुझे दाना समझा और
चुग गयी तो
मेरा तो सब गड़बड़ हो जाएगा
सारा इल्म
सारा ज्ञान सारी दानाई धरी रह जायेगी
उन्हें चिड़िया की भाषा आती थी पर चिड़िया को उनकी भाषा नहीं आती थी
वे चिड़िया से डरने लगे
घर बाहर निकलना हुआ बंद
ले जाये गए पागलखाने
इलाज हुआ
ठीक हुए
छुट्टी होने को थी
खुश थे डॉक्टर ने पूछा
अब कैसा लगता है
बोले ठीक लगता है
लगता है की मैं मुकम्मल आदमी हूँ
किसी अनाज का दाना नहीं हूँ
डॉक्टर खुश था अपनी सफलता पर
कि वे पूछ बैठे
डॉक्टर साहेब एक मुश्किल है
क्या ?
यह तो ठीक है कि मैं आदमी हू
किसी अनाज का दाना नहीं हूँ
लेकिन यह बात चिड़िया को कैसे पता चलेगी
और वे फिर डर गए .
शताब्दियाँ बीत गयीं
तब से
नालंदा के लोगों में
डर का जींस समाया हुआ है
इसीलिए डरते हैं नालंदा के लोग
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