माघी पूर्णिमा के दिन रैदास की जयंती देश विदेश
में धूम धाम से मनाई जाती है . रैदास की जन्म और कर्मभूमि बनारस में इन दिनों देश
और दुनिया से रैदास के अनुयायी उमड़ पड़ते हैं .सर गोबर्धन और उसके आसपास की जगह एक
नया नगर ही बस जाता है .राजघाट के निकट गंगा किनारे बने रैदास मंदिर से लेकर रैदास
पार्क होते हुए पुरे बनारस में रैदास के भक्तों का रेला उमड़ पड़ता है . धर्म की
नगरी बनारस में धार्मिक मेले तो रोज ही
लगते हैं .भारी भीड़ आती और जाती रहती है ,पर जैसी वैष्णवता रैदास भक्तों में दिखाई
देती है वह अन्यत्र दुर्लभ है . धर्म के कर्म कंडों से जुडी भीड़ जब बनारस या किसी
दुसरे शहर पर धावा बोलती है तो वहां का जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है . इसलिए मुझे
लगता है सभी तीर्थ यात्रियों को रैदास भक्तों से सीख लेनी चाहिए . जैसा अनुशासन और
जैसी सुव्यवस्था इन भक्तों में दिखाई पड़ती है वह बेमिसाल है .विचार करने पर मुझे
इसकी वजहें रैदास के जीवन और सन्देश में ही दिखाई देती है .
रैदास का जीवन और काव्य इस तरह घुला मिला है
जैसे चन्दन और पानी मिल जाता है। रैदास अपनी भक्ति और कर्म साधना से अपने र्इश्वर
को प्रत्यक्ष करने वाले संत थे। प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी गाने वाले रैदास का
व्यकित्व भले ही कबीर की तुलना में विनम्र और साधु लगता हो- वैचारिक दृढ़ता में
सिर्फ रैदास ही हैं जो कबीर से होड़ लेते हैं।
रैदास अपनी साधना में मन के चंगा होने की बात
करते हैं। यदि मन पवित्र है तो सामने की कठवत का पानी ही गंगा की तरह पवित्र है।
मन की शुद्धता, वाणी की शुद्धता और कर्म की शुद्धता रैदास की
वाणी का मर्म है। रैदास जिस समय और समाज में हुए थे उसमें मनुष्य के श्रम को
अवमानित किया जाता था।जो जितना ही उपयोगी
श्रम करता है वह सामजिक ढांचे में उतना ही हिन् माना जाता है . ६५ -७० बरस क्ले
लोकतंत्र ने भी इस धरना में कोई खास रद्दोबदल नहीं किया है .रैदास ने अपनी मानसिक
और वैचारिक दृढ़ता से श्रम को प्रतिष्ठा दी । उनके लिए कर्ममय जीवन ही पूजा है-
जहँ जहँ डोलउ सोर्इ परिक्ररमा जो कुछ
करौं सो पूजा। सहज जीवन क्रम में हम जहाँ
कहीं भी जाते हैं वही परिक्रमा है, जो कुछ करते हैं वह पूजा की तरह पवित्र
है। जिस श्रम को समाज ने हेय बना रखा था रैदास ने उसे प्रतिष्ठित करके श्रमशील
जनता को गरिमा और सम्मान दिया .
रैदास श्रम करि खाइहि जौलों पार बसाय।
नेक कमार्इ जउ करइ कबहुं न निहफल जाय ।।वे अपने
भक्तों को श्रम करके अपना पालन पोषण करने का सन्देश देते हैं . खास बात यह है कि आम तौर पर हमारे समाज में
अकर्मण्य साधुता का प्रचलन रहा है .इसके बरक्स रैदास श्रमशील साधुता का आह्वान
करते हैं .और कहते हैं की इश्वर किसी के बाप का नहीं है वह हर उस उस व्यक्ति का है
जो अपने कर्ममाय जीवन के भीतर उसे (ईश्वर को ) मन प्राण से चाहता है . उनका साहित्य वर्ण आधारित श्रेष्ठताक्रम को चुनौती
देता है . वर्ण व्यवस्था सामाजिक श्रम के
अपहरण का ही एक रूप है .इसलिए श्रम की सामजिक प्रतिष्ठा का जो सन्देश रैदास की
कविता और जीवन से मिलता है वह आज भी हमारे समाज की परम कामना है.
खेद की बात है कि हमारी अविकसित सामजिक चेतना मानवीय श्रम और
श्रमशील जनता को गरिमा और सम्मान देने को तैयार नहीं है। इसीलिए संत रैदास का जीवन और साहित्य आज की मनुष्यता के
विकास के लिए मार्ग दर्शक है . रैदास की जयंती श्रमजीवी साधुता की प्रतिष्ठा का
उत्सव है . आइए हम भी इस उत्सव में शामिल हों .
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