'खरी चवन्नी चांदी की जय बोलो महात्मा गांधी की से लेकर 26 जनवरी और 15 अगस्त के जुलूसों में लगने वाले महात्मा गांधी की जय की गूंज के साथ बचपन में ही गांधी से परिचय हुआ था। आइन्स्टाइन को तो बाद में पढ़ा कि - ''आने वाली पीढि़यों को मुशिकल से विश्वास होगा कि इस तरह का हाड़ माँस वाला मनुष्य इस धरती पर कभी मौजूद था लेकिन ऐसी अनेक चमत्कार कथाएँ भी सुनने को मिलती रहती थीं जिनसे गांधी के महात्मा ही नहीं अतिमानवीय शकित से सम्पन्न होने की पुषिट होती थी। कैसे गांधी की जय बोलने वाले को मारने के लिए दौड़ाने वाला अंगे्रज घोड़े से गिर कर मर गया या कुएँ में गिरी बकरी महात्मा का नाम जपने से सही सलामत मिल गयी जैसी कहानियों ने गांधी की एक अतिमानवीय छवि बना रखी थी।
गांधी की आत्मकथा सत्य का प्रयोग पढ़कर मैंने भी आत्मनिर्भरता के कर्इ प्रयोग किये थे जो अन्तत: हास्यास्पद सिद्ध हुए। उन दिनों मैंने भी गांधी की तरह गीता याद करने की कोशिश की थी। गांधी तो तेरहवें अध्याय तक पहुँच गए थे अपन तीसरे अध्याय तक जाते-जाते बोल गए। बहुत बाद में समझ में आया कि यह गांधी का प्रभावशाली गध था जो मेरे बाल मन को इस अनुकरण के लिए प्रेरित कर रहा था। समझ में यह भी आया कि गांधी की नकल संभव नहीं।
बाद में उच्च शिक्षा के लिए गांव से शहर आया तो एक दूसरे ही गांधी से परिचय हुआ। बातचीत में यह जुमला सुनने को मिला-मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। केवल बोलने में ही नहीं लिखत-पढ़त में भी इस जुमले का पर्याप्त प्रयोग होता है। लगभग सामान्य बोध की तरह। मैंने भी बिना सोचे समझे इस जुमले का प्रयोग सालों साल किया है।
महज संयोग है कि कुछ दिनों पहले मुझे सेवाग्राम और साबरमती आश्रम देखने का अवसर मिला। सेवाग्राम और साबरमती आश्रम में घूमते हुए अचानक मेरा ध्यान इस जुमले की ओर गया और मैं सोचने लगा कि क्या सचमुच मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है। आखिर इस जुमले के मूल में क्या है। क्या इस जुमले का र्इजाद इसलिए हुआ कि गांधी को मजबूरी में भारत विभाजन स्वीकार करना पड़ा। गांधी उधर नोवाखाली में साम्प्रदायिक दंगों से निपट रहे थे इधर उनके अनुयायी देश के साथ-साथ खुद को भी आजाद कर रहे थे। लेकिन यह मानने को जी नहीं करता क्योंकि यदि गांधी मजबूर होते तो उन्हें मारने की क्या जरूरत थी। गांधी के पास अब भी ऐसा बहुत कुछ था जिससे वे औरों को मजबूर कर रहे थे। परायों को ही नहीं अपनों को भी। कहते हैं एक बार बिड़ला ने गांधी से पूछा कि देश तो आजाद हो गया अब आप किसके खिलाफ लड़ेंगे। गांधी ने मुस्कराते हुए बिड़ला की ओर इशारा किया। बिड़ला गांधी के अनन्य सहयोगी थे। जाहिर है गांधी की योजना अब अपने लोगों से लड़ने की थी। कहने की जरूरत नहीं है कि यह लड़ार्इ ज्यादा हौसले की मांग करती है।
मुझे लगता हैं मजबूरी को महात्मा गांधी का पर्याय बताने वाले इस जुमले का प्रयोग इसलिए करते हैं कि हम गांधी को ठीक से जानते नहीं हैं। या उन्हें जानने के बारे में बहुत सचेत नहीं रहते। एक तरह की लापरवाही हमारे दिलो दिमाग में छार्इ रहती है और शायद हमारी नीयत में भी। गांधी को न जानना ही हमारे हित में हैं। दे दी हमे आजादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल तक ही गांधी को सीमित रखने में भलार्इ है।
सेवाग्राम में महात्मा गांधी की कुटिया के बाहर एक वजन नापने की मशीन रखी है। जिस पर दर्शकों के लिए सूचना लिखी है- 'महात्मा गांधी का वजन नापने की मशीन। महात्मा गांधी स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहते थे क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही सभी कार्य होने हैं। इसलिए वे वजन नापने की मशीन रखते थे। हम महात्मा गांधी के उसी वजन तक पहुँच पाते हैं जो मशीन से नापी जाती है। महात्मा गांधी का वास्तविक वजन हमें परेशान करता है। इसलिए हम उन्हें दीवाल पर टंगी एक तस्वीर और एक नारे से अधिक नहीं जानना चाहते।
सेवाग्राम और साबरमती दोनों ही जगहों पर गांधी के जीवन की झांकी मौजूद है। सेवाग्राम में गांधी जिस कुटिया में रहते थे। उसके बरामदे में एक टेलीफोन बूथ है। जिसमें काले रंग का भारी भरकम फोन रखा हुआ है। गांधी जी से देश की राजनीतिक सिथतियों के बारे में वायसराय को बात करनी होती थी इसलिए वायसराय ने सेवाग्राम तक टेलीफोन लाइन बिछवार्इ और गांधी से बात-चीत करने के लिए यह टेलीफोन लगवाया। यह देखते ही मुझे गांधी का वह कथन याद आया जो उन्होंने 1916 में अखिल भारतीय एक भाषा सम्मेलन में लखनऊ में कहा था- 'मैं कहता हूँ यदि मैं बोलना जानता हूँ और मेरे बोलने में कोर्इ ऐसी बात रहेगी जिससे वायसराय लाभ उठा सकें, तो वह अवश्य ही मेरी बातें हिन्दी में बोलने पर भी सुन लेंगे। उन्हें आवश्यकता होगी तो उसका अनुवाद करा लेंगे। यानी सुने जाने के लिए बात का होना महत्वपूर्ण है, यह या वह भाषा नहीं।
नमक सत्याग्रह के बाद गांधी ने तय किया था कि वे देश की आजादी हासिल होने के बाद ही साबरमती आश्रम आयेंगे। गांधी ने वर्धा के निकट सेगाँव में अपना नया ठिकाना बनाया। वर्धा से भी चार मील दूर। धुर देहात में। गांधी भारत में रहना चाहते थे और भारत गांव से बसता है। इसलिए वे 1936 से 1946 तक सेगाँव में रहे। यह घनघोर राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। गांधी की जगह कोर्इ दूसरा व्यकित केन्द्र को छोड़कर यहाँ रहना पसन्द नहीं करता। रोज-रोज की गतिविधियाँ, राजनीतिक दाव पेंच। लेकिन गांधी अच्छी तरह जानते थे कि उनके पास कहने के लिए बात है। इसलिए वे जिस किसी भाषा में बोलेंगे और जहाँ से बोलेंगे उनकी बात सुनी जायेगी। सेगाँव, जिसे गांधी ने सेवाग्राम नाम दिया, में बैठे गांधी की बात सुनने के लिए तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने टेलीफोन लगवाया।
गांधी ने एक बार कहा था- मैं लिनलिथगो से कहूँगा कि भारत एक विशाल देश है। जिस परिसिथति में हम यहाँ रहते हैं उनमें यदि आप रह सकते हों तो आजादी के बाद भी यहाँ आराम से रहिए। गांधी के इस कथन को आधार बनाकर शंकर ने 'सबके लिए जगह शीर्षक से एक काटर्ून बनाया जो हिन्दुस्तान टाइम्स में छपा था। इस काटर्ून में गांधी भारत के गावों में लिनलिथगो से रहने के लिए आग्रह कर रहे हैं। गांधी का आग्रह सुन कर लिनलिथगो और गाँव की असुविधा छोड़कर निकल भागने को आतुर उनके साथियों का चेहरा देखने लायक है। अंग्रेजों की छोडि़ए गाँव में रहने के सवाल पर आज भारतीय मध्यवर्ग मजबूरी के अलावा किसी सूरत में तैयार नहीं है। बेशक गाँवों की सिथतियाँ इसके लिए जिम्मेदार हैं, लेकिन इन सिथतियों के लिए कौन जिम्मेदार है ? गांधी के जमाने में गाँव आज से कहीं ज्यादा पिछड़े थे किन्तु गांधी के लिए गाँव में रहने का अर्थ सेगांव को सेवाग्राम बना देना था।
गांधी ने अहमदाबाद के साबरमती आश्रम से दांडी की यात्रा 12 मार्च 1930 को प्रात: साढ़े छ बजे शुरू की। अहमदाबाद से दांडी 240 मील दूर अरब सागर के किनारे बसा नामालूम सा गाँव था। 24 दिन की अनथक यात्रा के बाद गांधी पाँच अप्रैल को दांडी पहुँचे। अगली सुबह प्रार्थना के बाद मुÎी भर नमक उठाकर गांधी ने बि्रटिश साम्राज्यवाद की चूलें हिला दी। नमक उठाने जैसी साधारण बात इतनी युगान्तरकारी सिद्ध हो सकती है क्या गांधी इसे जानते थे ? शायद।
कभी-कभी मैं 7 जून 1883 की उस काली रात के बारे में सोचता हूँ जब डरबन से प्रिटोरिया जाते वक्त मेरित्सबर्ग में गांधी को पहले दर्जे का टिकट होने के बावजूद तीसरे दर्जे में जाने के लिए कहा गया। समझौता करके तीसरे दर्जे में आगे की यात्रा करने के बजाय गांधी ने मेरित्सबर्ग के रेलवे स्टेशन पर अंधेरी ठण्ठी रात गुजारना बेहतर समझा। अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध तन कर खड़ा होने वाला यह निर्णायक क्षण ही गांधी को गांधी बनाता है और किसी भी अन्याय अत्याचार का प्रतिकार करने वाले अदम्य साहस और आत्मबल का पता देता है।
गांधी का एक परिचय हमें प्रेमचन्द की कहानी र्इदगाह से मिलता है। र्इदगाह कहानी में नमाज के बाद बच्चे जब मेले में जाते हैं तो हामिद की उपेक्षा करते हैं, कुल जमापूँजी लगाकर चिमटा खरीदने पर उसका मजाक उड़ाया जाता है, मेले से लौटते हुए सब उससे लड़ते हैं और अन्त में सब हामिद और उसके चिमटे के कायल हो जाते हैं। मैं शिक्षाविद Ñष्ण कुमार का आभारी हूँ जिन्होंने र्इदगाह कहानी को गांधी के इस वाक्य से जोड़कर देखने का प्रस्ताव किया था- 'पहले वे तुम्हारी उपेक्षा करेंगे, फिर तुम्हारा मजाक उड़ाएंगे फिर तुमसे लडेंगे और फिर तुम्हारे पीछे चलने लगेेंगे।
गांधी कहते हैं- 'मेरा जीवन हीे मेरा सन्देश है। र्इदगाह कहानी के हामिद की तरह गांधी ने अपने जीवन से इस बात को सिद्ध किया था। उनकी उपेक्षा हुर्इ, उनका मजाक उड़ाया गया विरोध हुआ और फिर पूरा देश उनके पीछे चल पड़ा । इसलिए मुझे कहने दीजिए कि मजबूरी का नाम नहीं है महात्मा गांधी। मजबूती का नाम है महात्मा गांधी। क्या हम इसे अपने सामान्य बोध का हिस्सा बना पायेंगे?
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