मंगलवार, 11 मार्च 2014

संत रैदास के सपनों का समाज : बेगमपुर





रविदास संत कवि हैं। व्यापकता और प्रसार में उनकी होड़ सिर्फ कबीर से है। वाराणसी के आस पास के इस संत कवि का प्रभाव पंजाब और राजस्थान तक व्याप्त है। रविदास की बानी गुरू ग्रंथ साहिब में संकलित है। जनश्रुति बताती है कि रविदास मीराबार्इ के गुरू थे। पंजाब और राजस्थान से होते हुए रविदास बानी का प्रभाव देश और अब विदेश में दिखार्इ  पड़ रहा है। बनारस का साहित्य समाज इस प्रभाव से अपरिचित नहीं तो तटस्थ जरूर है। रविदास कबीर के समकालीन हंै। उनके हुए छ: सौ से ज्यादा वर्ष बीत चुके हैं। छ: सौ वर्ष बाद भी इस संत कवि की बानी लाखों-करोड़ों लोगों को जीने का सम्बल प्रदान कर रही है। रविदास की बानी में विनम्रता और दृढ़ता का दुर्लभ मेल है। वे अपने कवित विवेक के बारे में कोर्इ दावा नहीं करते। कवि होने का कोर्इ दावा नहीं करते। साधु होने का दावा भी नहीं है। उनके यहाँ यदि किसी बात का दावा दिखार्इ पड़ता है तो अपने पेशे का और जाति का। रविदास चमड़े का काम करते थे और जूता सिलते थे। यह कवि ओछी समझी जाने वाली जाति और पेशे का दावा डंके की चोट पर करता है और उसे आत्म गौरव से भर देता है।
तथाकथित छोटी जाति और छोटे पेशे के कारण ही इस कवि के महत्व को स्वीकार नहीं किया गया। कर्इ ऐसी किंवदनितयाँ गढ़ी गर्इ जिसमें कवि के अपने दावे के उलट उसे उच्च वर्ण का साबित करने की कोशिश की गर्इ। इसके पीछे तर्क यह था कि प्रतिभा और महत्ता तो जाति और वर्ण विशेष में ही संभव है- इसलिए इस कवि का संबंध उच्च वर्ण से होगा ही। भले ही यह संबंध पिछले जन्म में रहा हो। कबीर के बारे में यह गुंजाइश थी कि उन्हें विधवा ब्राह्मणी का पुत्र बता कर उच्च वर्ण से जोड़ा जा सके। रविदास के बारे में यह गुंजाइश नहीं थी। इसलिए उन्हें पिछले जन्म का ब्राहमण घोषित करने की कोशिशें हुइ±।
ऐसी कोशिशों के पीछे एक बात तो यह थी कि जाति, वर्ण, चमत्कार आदि की चर्चा करके उनके सामाजिक विमर्श को उपेक्षित कर दिया जाय। रविदास के महत्व का स्वीकार उनके अनुयायियों के भीतर है। धर्म और सम्प्रदाय के दायरे से बाहर उनकी बानी की चर्चा कम होती है। रविदास को संत के रूप में याद करते हुए भी उनके सामाजिक सन्देश की चर्चा करने से लोग कतराते हैं। कहीं यह कहा जाता है कि संतों की बानी के अध्यातिमक अर्थ हैं, उन्हें सामाजिक सन्देश के रूप में सीमित करने का प्रयत्न ठीक नहीं। इस तर्क से संत की महत्ता का स्वीकार भी हो गया और सामाजिक सन्देश पर राख डालने की मन्शा भी पूरी हो गर्इ । यही वजह है कि संत रविदास की कवितार्इ की चर्चा नहीं के बराबर होती है। रविदास की कवितार्इ पर विचार करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि अच्छी कविता और महान कविता के अपने-अपने तर्क होते हैं। अपने काव्यात्मक गुणों के नाते कोर्इ कविता अच्छी कविता हो सकती है लेकिन महान कविता वह तभी होगी जब उसका सामाजिक परिप्रेक्ष्य भी बड़ा हो। भकितकाल कविता का स्वर्ण युग इसलिए हो सका कि वहाँ एक वृहत्तर सामाजिक सन्दर्भ मौजूद है। समाज की चालक-शकित धर्म था। इसलिए सारा अन्याय और शोषण धर्म के आवरण में हो रहा था। स्वाभाविक रूप से अन्याय और शोषण का प्रतिकार भी धर्म के आवरण में हुआ। इसीलिए भकित काल की कविता धार्मिक नहीं है वह अपने समय के सामाजिक संघर्ष की सांस्Ñतिक अभिव्यकित है।
संंत कवियों को पढ़ते हुए प्राय: हमारा यह विवेक कुन्द हो जाता है और हम उन्हें आध्यातिमक ऊँचाइयों, चमत्कार-कथाआें, करामातों आदि के दायरे में ही पढ़ते गुनते हैं। जरूरी नहीं कि ऐसा करने वाले केवल सवर्ण समूहों के लोग हों।जैसे कुछ दलित चिन्तक अम्बेडकर के समूचे सामाजिक विमर्श को संविधान निर्माण तक ही सीमित करते पाये जाते हैं, वैसे ही कुछ लोग रविदास के सामाजिक अभिप्रायों के बजाय चमत्कार कथाओं में ही उलझ कर रह जाते हैं। जबकि रविदास बानी का मर्म उसके सामाजिक अभिप्रयों के साथ समझने की जरूरत है।
संत रविदास की बानी बेगमपुर के रूप में एक वैकलिपक समाज की प्रस्तावना करती है। कबिरा खड़ा बजार में लिए लुआठा हाथ जो घर जारै आपना चले हमारे साथ पढ़ते हुए अक्सर यह बात मन में उठती है कि कबीर अपने साथ कहाँ ले जाना चाहते हैं। इसका उत्तर रैदास देते हैं। वे अपने पद में बेगमपुर का प्रस्ताव करते हैं। वे कहते हैं- 'मेरा शहर बेगमपुर यहाँ न दुख है न दुख की चिन्ता न माल है न लगान देने की फिक्रन खौफ न खता न गिरने का डर मुझे मिल गया है ऐसा खूबसूरत वतन जहाँ खैरियत ही खैरियत है मजबूत और मुकम्मल है यहाँ की बादशाहत यहाँ न कोर्इ दोयम है न तेयम सब अव्वल हैं यहाँआबोदाना के लिए मशहूर यह शहर दौलतमन्दों से अटा पड़ा हैजिसे जहाँ भावे वहाँ जाये कहीं कोर्इ रोक टोक नहीं है सभी बन्धनों से मुक्त रविदास चमार कहता है इस शहर में रहने वाला ही मेरा मित्र है।
यह बेगमपुर क्या है। क्या इसमें रविदास केवल भाव दशा की चर्चा करते हैं। क्या यह केवल कुण्डलिनी के सहस्रार तक पहुँच जाने की सिथति है ? पूरे पद में लगान अदा करने की चिन्ता से मुकित का आश्वासन है, भय से मुकित का भाव है। आबोदाना और हर तरह के खैरियत की आसूदगी है। कहीं कोर्इ रोक-टोक नहीं है, किसी तरह की भेद बुद्धि और बन्धन नहीं है। यह सिर्फ आध्यातिमक अनुभव नही है। यहाँ जिन दुखों और बन्धनों से मुकित की बात की गर्इ है वे नितान्त इहलौकिक या कि सामाजिक हैं। सामाजिक और आर्थिक विषमता समाज में भेद बुद्धि पैदा करती है और यह भेद बुद्धि विधि निषेध रचती हैं। बेगमपुर इन सबसे मुक्त है। बेगमपुर कवि का स्वप्न है। निष्ठुर, अविवेकी अन्याय पूर्ण सामाजिक यथार्थ के बरक्स कवि एक न्याय संगत, मानवीय और उदात्त समाज का सपना प्रस्तावित कर रहा है। पिछली शताबिदयों में आधुनिक दुनिया ने जिस तरह के वर्ग विहीन समाज का सपना देखा यह वैसा ही सपना है। भविष्य की मानवता यदि समतामूलक समाज की स्थापना कर पायी तो वह रविदास के बेगमपुर जैसा होगा। रविदास की यह कल्पना अमूर्त और अवास्तविक है एक तरह की यूटोपिया। यह ध्यान रहे कि धार्मिक सामाजिक भेदभाव के आधार भी अमूर्त और अवास्तविक हैं। इसके बावजूद वे ठोस सच्चार्इ की तरह हमें बंधनों में जकड़े हुए हैं। रविदास की यह कल्पना मिथ्या चेतना द्वारा रचित बन्धनों की जकड़न से मुक्त करने का विधान रचती है।
तुलसीदास का रामराज्य भी एक तरह की कल्पना ही है पर इसकी व्याख्या और चर्चा जोर शोर से होती है। कुछ लोग राम राज्य कायम करने के लिए यत्नशील भी हैं तो कुछ लोग राजनैतिक नारे के रूप में उपयोग करते हैं। लेकिन बेगमपुर की चर्चा कहीं नहीं होती। रविदास के बेगमपुर और तुलसी के रामराज्य को आमने -सामने  रख कर विचार करने पर इसका कारण समझ में आ जायेगा। रविदास और तुलसीदास के समय में लगभग सौ साल का फर्क है। बहुत संभव है बेगमपुर की धारणा तुलसीदास तक पहुँची हो और उन्हें लगा हो कि बेगमपुर में कुछ ज्यादा ही छूट दे दी गर्इ है। इसलिए इसे दुरुस्त किया जाय। तुलसीदास का संशोधन साफ समझ में आता है। बेगमपुर में सब अव्वल है जबकि रामराज्य में वर्णाश्रम निज निज धरम का पालन हो रहा है। यानी सामाजिक विभेद मौजूद हैं। तुलसी के राम का अवतार ही गो और ब्राह्मण की रक्षा के लिए हुआ था। यह रक्षा वर्णाश्रम धर्म को कायम करके ही की जा सकती थी। इसलिए तुलसीदास के राम कुछ लोगों के प्राइवेट-लिमिटेड बन जाते हैं। रविदास राम की इस इजारेदारी पर सवाल उठाते हैं और कहते हैं कि वह (राम) किसी के बाप का नहीं है। उसे प्रेम से कोर्इ पा सकता है। जो लोग राम को प्रेम से पाना चाहते हंै उनका रविदास के बेगमपुर में स्वागत है। इसीलिए रविदास के साथ कबीर भी कह उठते हैं- अवधू बेगम देस हमारा।

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