मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

भोजपुरी जीवन का पर्व :डाला छठ



कार्तिक शुक्ल पक्ष की  षष्ठी तिथि की शाम । बनारस का अस्सी घाट  । छठ पर्व का मेला गंगा तट पर पसरा हुआ है  । यहाँ से वहाँ तक । छठ पर्व इधर भोजपुरी अस्मिता का प्रतीक बन कर उभरा है । अस्मिता या पहचान को राजनीतिक रूप से भुनाने वाले भी छठ मे हिस्सा लेने लगे हैं । अस्सीघाट पर नए बने मण्डप में भोजपुरी समाज के कार्यकर्ता जमे  थे । माइक से लगातार छठ के बारे कुछ बताया जा रहा था । कि यह सूर्य  की उपासना का व्रत है ,कि सूर्य  की पूजा कई देशों में होती है ,कि सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं । आवाज साफ थी ,भाषा अच्छी उच्चारण और अच्छा । मैंने देखा कि हम लोगों के प्रिय संस्कृत के प्रोफेसर उपेंद्र पाण्डेय बोल रहे हैं ।मुझे कालिदास याद आए । अभिज्ञान शाकुंतलम के मंगलाचरण में 10  प्रत्यक्ष देवताओं  को याद किया गया है।  उनमे सूर्य  भी हैं ।मुझे एक बात नहीं समझ मे आती है कि सूर्य की आराधना की जाती है और गीत छठ मैया का गाया जाता है । हमारा इतना प्रखर और प्रत्यक्ष देवता लोक तक आते आते कैसे माँ में बदल जाता है । आखिर गायत्री भी तो सूर्य की उपासना का मंत्र है उसे भी गायत्री माँ के रूप मे बदल दिया गया । अब अगर हजारी प्रसाद द्विवेदी होते तो उनसे पूछता कि क्या कोई ऐसी लोक परंपरा रही है जो सूर्य के ममत्व को देख लेती रही है और यह त्योहार उसी लोक परंपरा या वेद से इतर परंपरा की स्मृति है? खैर इस बारे में अभी भी हम कमलेश दत्त त्रिपाठी से उम्मीद कर सकते हैं ।
अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने जुटी  महिलाएं अलग अलग झुंड मे बैठी हैं  । पीले और नारंगी के बीच के रंग  का खास सिंदूर नाक से लेकर मांग तक लगाए कुछ तैयारी  में  ,कुछ इंतज़ार में । छठ माँ का मधुर गीत भी कहीं कहीं गूंज रहा है ।  सूर्य को  बादलों ने ढक लिया है । बादलों के बीच से उनकी आभा छन कर आ रही है । ऐसा क्यों होता है की सूर्य को छल बादल क लेते हैं । देखें कितनी देर  ।एक अनिश्चितता सी छाई हुयी है । अनिश्चितता के बीच अद्भुत निश्चिंतता का माहौल बना हुआ है । सबने गंगा तट का कुछ हिस्सा घेर रखा है । लीप पोत कर बेदी बना ली गयी है। दिये जल गए हैं ।  गन्ने को जमीन में इस तरह लगाया गया है मानो मंडप बनाने की तैयारी हो रही है । बांस की बहँगी मे मौसमी फल और  प्रसाद रखे गए हैं ।बहँगी कच्चे बांस की बनी बड़ी सी डलिया होती है ,जिसे कहीं कहीं दौरी भी कहते हैं । सब कुछ इसी में रख  कर लाया जाता है ,इसीलिए इसे डाला छठ कहते हैं -शायद । मजे की बात यह कि ढोने का काम पुरुष करते हैं  -पति महोदय हों ,देवर हों या श्रीमान दामाद जी ही क्यों न हों । यहाँ कुछ विशेष नहीं चढ़ना है रोज के उपयोग की सामान्य चीजें । सिंघाड़ा ,मूली ,नीबू ,कच्ची हल्दी ,भिंगोया चना ,खीरा ,अमरूद ,अदरक ,मौसमी  और केला । इधर सेब ,संतरा ,अनन्नास भी दिखने लगे हैं । इस पूजा मे खास मिठाई बनती है । आटे में चीनी (कभी कभी गुड भी )मिलाकर अच्छी तरह माड़ लेते हैं । कुछ लोग मोयन भी डाल देते हैं । इसे हमारे यहाँ खजूर कहते हैं ।  कहीं कहीं इसको ठेकुवा भी कहते हैं । यही साधारण चीजें अर्घ्य मे चढ़ाई जाती हैं । रवीन्द्रनाथ का एक गीत अनायास याद आ जाता है देवता को क्या दूँ /जो प्रिय को दे सकता हूँ /वही देवता को भी देता हूँ /क्योंकि मैंने देवता को प्रिय बना लिया है और प्रिय को देवता । दैनंदिन जीवन का ही समर्पण है । समर्पण का उल्लास है ।
व्रत का माहात्म्य नहीं पता  पर अजब सी खुशी सब ओर फैली हुयी है । उधर गंगा बह रही हैं ,इधर खुशी का सागर हिलोरे ले रहा है । मुझे नहीं मालूम कि अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा कहीं की जाती है या नहीं । आम तौर पर तो उगते हुये सूर्य की पूजा होती है पूजा में भी और जीवन व्यवहार में भी । यहाँ डूबते हुये सूर्य की अभ्यर्थना के लिए जन समुद्र उमड़ा है । दिन भर अपने आलोक से हमारे जीवन को प्रकाशित करके ,अपनी ऊर्जा से हमे ऊर्जस्वित करके जो विदा हो रहा है , अस्त हो रहा है क्या यह उसके लिए आभार व्यक्त  करना है  । क्या यह  भोजपुरी मन की विशेषता है -कृतज्ञता और आभार से भरा हुआ !इसी बीच बादलों को भेद कर सूर्य थोड़ी देर के लिए दिखते हैं । दर्शन के लिए उमड़े जन समुद्र को हाथ हिलाते हुये झट चले जाते हैं । लेकिन इतने मे ही अर्घ्य दे दिया जाता है । लोग पने घरों की ओर लौट रहे है ,प्रसाद से भरा डाल उठाए । यही प्रसाद कल सुबह उगते हुये सूर्य को चढ़ाया जाना है ।
सप्तमी की सुबह । फिर अस्सी घाट । फिर वही जन समुद्र । कल जहां निगाहें पश्चिम की ओर लगी थीं ,आज पूरब की ओर लगी हैं । उगते हुये सूर्य का इंतज़ार । व्रत पूरा होगा । मन्नतें पूरी होने की आसूदगी । आज फिर बादल छाए हुये हैं । सूरज को उधर रामनगर की ओर से निकलना है । सबकी निगाहें उस तरफ लगी हुयी हैं । कुछ नारी कंठों ने सूरज को आदित ल्ल  बना दिया है ।क्या आदित मल्ल राजेश मल्ल के घर परिवार के हैं ! वे आदित मल्ल से उठने का आग्रह कर रही हैं । मानो किसी देवता से नहीं बल्कि घर के किसी बूढ़े बुजुर्ग से उठने के लिए कहा जा रहा है । उठिए ! अर्घ्य ले लीजिये । खैर सूरज हमारे बड़े बूढ़े हैं इससे किसको इंकार होगा । अब आदित मल्ल हैं कि बादलों से उलझे पड़े है । बादलों ने रास्ता रोक रखा है लेकिन कब तक । वो ,उधर रामनगर किले के सीध में थोड़ा ऊपर  निकल ही पड़े आदित मल्ल । बादल कब तक उन्हें रोकेंगे घर के लोगों से मिलने से  । वे निकल पड़े हैं । इंतज़ार खत्म होता है । अर्घ्य देने का सिलसिला शुरू । कुल के सबसे बड़े बूढ़े को प्रणाम करने के बाद घर के बड़े बूढ़ों को प्रणाम किया जा रहा है । व्रत पूरा हुआ । प्रसाद बट रहा है ।प्रसाद भी कैसा ! पहले डूबते हुये सूरज को चढ़ाया गया  फिर उगते हुये सूरज को । परिचितों रिशतेदारों में ही नहीं हरेक जो वहाँ पहुचा है प्रसाद पाने का हकदार है ।
छट के साथ भोजपुरी नए वर्ष कि शुरुआत हो जाती है । यह कैसा पर्व है जिसमे ऋतु के साथ तादात्म्य स्थापित किया जाता है ,उदित और अस्त होने को जीवन क्रम मान कर बराबर सम्मान दिया जाता है । विशिष्ट का इंतज़ार नहीं । सहज साधारण वस्तुओं से सहज जीवन में प्रत्यक्ष देवता कि आराधना कि जाती है । देवता भी ऐसा जो हममे जीवन का संचार करता है । हममें ही क्यों समूची प्रकृति को अपनी ऊर्जा से ऊर्जस्वित,प्रभा से भास्वित करता है । कहीं कोई भेद भाव नहीं । वह छठ माँ के रूप में ममता के अंचल में रखता है ,आदित मल्ल के रूप मे बड़े बुजुर्ग कि तरह हमारा हितू है । सहज जीवन में उपलब्ध । खुशियाँ बिखेरता हुआ । 

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