रविवार, 13 अप्रैल 2014

प्रेमचंद भारतीय समाज के भीतरी आलोचक हैं- सदानंद शाही



इधर प्रेमचंद फिर बहस के घेरे में हैं । अबकी बहस इस बात पर हो रही है कि प्रेमचंद प्रगतिशील थे या नहीं । थोड़े दिन पहले बहस इस बात पर हो रही थी कि प्रेमचंद दलित विरोधी हैं या नहीं । अतिवादी दलित यह सिद्ध करने में लगे हुये थे कि प्रेमचंद दलित विरोधी थे । उनका मूल तर्क यही था कि वे जन्म से सवर्ण थे इसलिए वे दलित हितैषी हो ही नहीं सकते । मामला यहीं तक नहीं थमा । कुछ लोग उन्हें दलित विरोधी साबित करने में ज़मीन आसमान एक किए हुये थे । फिर क्या था ,दूसरा खेमा भी क़मर कस कर मैदान में आ डटा । ये लोग प्रेमचंद को दलित हितैषी ही नहीं बाकायदा दलित लेखक बनाने पर तुले गये  । सहानुभूति बनाम स्वानुभूति को लेकर बहस हुयी । प्रेमचंद की कृतियाँ ऐसे जोशो खरोश से जलायी गईं मानो मनुस्मृति ही जलायी जा रही हो । हालांकि जब मनुस्मृति जलायी गयी थी उस समय होश से ज्यादा काम लिया गया था । प्रेमचंद स्वयं भले सीधे –सादे रहे हों पर उनको लेकर विवादों का सिलसिला कभी थमा ही नहीं । प्रेमचंद के जीवन काल मेँ उनका विरोध वे लोग कर रहे थे जो आज की दलित राजनीति के सवर्ण हैं  । प्रेमचंद की कहानियों के पंडित मोटेराम शास्त्री प्रकट हो गए थे । ठाकुर श्रीनाथ सिंह जैसे लोग लठ्ठ लेकर पीछे पड़े थे  । निंदा,कुत्सा प्रचार गाली गलौज से लेकर मुकदमेबाजी तक हुयी । अंग्रेज तो बस सोजे वतन की प्रतियाँ ज़ब्त कर के रह गए । यहाँ भाई लोगों ने कुछ छोड़ा नहीं । प्रेमचंद को घृणा का प्रचारक कह कर निंदित किया गया । प्रेमचंद ने ऐसे लोगों का जवाब अपनी कलम से दिया । साहित्य में घृणा का स्थान  लेख इसका नमूना है।
अब बहस गांधीवाद और मार्क्सवाद के बीच हो रही है । कुछ लोग उन्हें कम्युनिष्ट तो  कुछ गांधीवादी साबित करने मेँ  लगे हुये हैं , कुछ आर्य  समाजी । प्रेमचंद की जन्मकुंडली खगाली जा रही है । वे कब किससे मिले , कब किस सभा मेँ  गए ,किन किन सभाओं की सदारत की । किन किन बैंकों मेँ  खाता था ,खातों मे पैसा कितना था । गोदान के होरी की तरह उन्होंने कब सूद पर पैसे चलाये आदि आदि ॰। कुछ लोगों  को  लगता है  कि हिन्दी मेँ  सतही किस्म की बहसें होती हैं । लेकिन उन्हें शायद इसका इल्म न हो कि सतही बहसों के लिए भी काफी श्रम करना पड़ता है । सामग्री जुटानी पड़ती है । और भी पता नहीं क्या क्या करना पड़ता है। इन सबका हासिल और कुछ हो न हो माहौल गरमाया रहता है ।
इधर एक तर्क यह चल पड़ा है कि  “अमुक  लेखक को पढ़ने समझने मेँ  मैंने सारा जीवन लगा दिया इसलिए उसके बारे में मेरा ही अंतिम  है” । कमल किशोर गोयनका कहते फिरते हैं कि मैंने प्रेमचंद की सेवा मेँ अपना जीवन लगा दिया इसलिए प्रेमचंद के बारे मेँ फैसला करने का अधिकार मेरा है । बाकी लोग जो तीन –तेरह (यह प्रयोग उनका है ,मुहावरा भी गलत है और प्रयोग भी )रचनाओं के आधार पर प्रेमचंद के बारे मेँ  राय देते हैं वह सिरे से गलत है । यह अलग बात है कि गोयनका की  टिप्पणियां भी उन्हीं  तीन –तेरह रचनाओं पर ही आधारित होती हैं । और वे जब कुछ कम चर्चित कहानियों का हवाला देते हैं तो अजीबो - गरीब निष्कर्ष निकालते हैं । 31 जुलाई को जनसत्ता मेँ  प्रकाशित अपनी टिप्पणी मेँ वे गमी और कानूनी कुमार कहानियों को परिवार नियोजन की  समस्या की कहानी   बताते हैं । गमी कहानी तो मुझे किसी संग्रह मेँ मिली नहीं ,लेकिन 1929 मेँ माधुरी मेँ  प्रकाशित कानूनी कुमार कहानी मेरी पढ़ी हुयी थी ।   यह  कहानी प्रेमचंद की अद्भुत व्यंग्य क्षमता का उदाहरण है । व्यंग्य की धार कहानी की पहली पंक्ति से ही फूट पड़ती है।   प्रेमचंद कहानी के प्रमुख पात्र का चित्र यों खींचते हैं -“मि0 कानूनी कुमार, एमएलए अपने ऑफिस मेँ समाचार पत्रों ,पत्रिकाओं और रिपोर्टों का एक ढेर लिए बैठे  हैं । देश की चिंताओं मेँ उनकी देह स्थूल हो गयी है ;सदैव देशोद्धार की फिक्र मेँ  पड़े रहते हैं  कानूनी कुमार को घर बैठे जो समस्याएँ सूझती हैं उनके लिए वे कानून का मसौदा तैयार करने लग जाते हैं। मजे की बात यह है कि वे कोई मसौदा तैयार भी नहीं कर पाते । प्रेमचंद इस कहानी मेँ ऐसे फर्जी देशोद्धारकों पर व्यंग्य  करते हैं ।  इसे प्रेमचंद को गांधीवादी या मार्क्सवादी कहे बगैर भी समझा जा सकता है । अब जीवन भर की उस महान साधना का क्या कीजिएगा जो इस कहानी को परिवार नियोजन की कहानी बताए ।
प्रेमचंद को भारतीय जीवन और भारतीय आत्मा के कथाकार के रूप मेँ प्रस्तावित करने के पहले यह जरूरी  है कि  भारतीय जीवन को और भारत कि आत्मा को जान लिया जाए ।भारतीय जीवन को मि कानूनी कुमार की तरह घर बैठे नहीं जाना जा सकता । गोयनका जी ने प्रेमचंद की बालक कहानी का भी जिक्र किया है ।  बालक कहानी का गंगू विवाह के छ्ह महीने बाद ही पैदा हुये बेटे को खुशी खुशी स्वीकार कर लेता है । उसका तर्क है कि मैंने एक बोया हुआ खेत लिया ,तो क्या उसकी फसल इसलिए छोड़ दूंगा ,कि उसे किसी दूसरे ने बोया था ?’गोयनका जी को प्रेमचंद की यह नैतिकता और आधुनिकता अकल्पनीय लगती है । क्योंकि  थोड़ी ही देर पहले वे प्रेमचंद को स्त्री की यौन पवित्रता का रक्षक घोषित कर चुके हैं । उन्हें इसलिए भी घोर आश्चर्य होता है कि यह बात कहने वाला कहानी का नायक अशिक्षित है । अशिक्षित पर ज़ोर देते समय गोयनका जी यह भूल  जाते हैं कि प्रेमचंद उसी कहानी में इस धारणा का खंडन कर रहे हैं कि शिक्षित व्यक्ति अनिवार्यतः सभ्य और सज्जन ही  होता है ।और अशिक्षित अनिवार्यतः असभ्य । बल्कि प्रेमचंद ने अपनी कई कहानियों में   दिखाया  हैं कि जिसे अशिक्षित कहा जाता है वह ज्यादा सभ्य और मानवीय है । बालक कहानी का पढ़ा लिखा भद्र    नरेटर  अंत में कहता है –तुम मुझे सज्जन समझते हो ?मैं ऊपर से सज्जन हूँ ;पर दिल का कमीना हूँ । असली सज्जनता तुममें है और यह बालक वह फूल है ,जिससे तुम्हारी सज्जनता की महक निकल रही है। प्रेमचंद औपनिवेशिक शिक्षा और औपनिवेशिक भद्रता की पोल खोलने में जरा भी संकोच नहीं करते ।  शिक्षित होने के दंभ से मुक्त होकर ही यह जाना जा सकता है।
जिन लोगों ने भिखारी ठाकुर का नाटक “गबरघिचोर” देखा या पढ़ा होगा उन्हें गोयनका जी की तरह आश्चर्य नहीं होगा ।नाटक का एक पात्र गलीज कलकत्ता कमाने गया है । इस बीच गलीज की पत्नी का संबंध गड़बड़ी से हो जाता है । इसी संपर्क से गबरघिचोर पैदा होता है । नाटक में गलीज ,उसकी पत्नी और गड़बड़ी गबरघिचोर पर अपना हक़ साबित करने के लिए बड़े दिलचस्प तर्क देते हैं । इन तर्कों मे नैतिकता का एक अलग ही रूप सामने आता है । भारत और भारतीय समाज एक बहुस्तरीय संरचना है । इसलिए यहाँ का जीवन बहुस्तरीय है और यहाँ कि नैतिकता के भी अनेक संस्तर हैं । भारत की आत्मा इस बहुस्तरीयता मेँ बसती  है । प्रेमचंद इस बहुस्तरीयता से परिचित हैं और इसकी कथा कहते हैं ।
प्रेमचंद का कम्युनिस्ट पाठ अगर इकहरा है तो भारत व्याकुल पाठ भी असंगत है । प्रेमचंद के विरोधी अलग अलग वजहों से उनके विरोधी हैं ,इसी तरह प्रेमचंद के समर्थक भी अलग अलग वजहों से समर्थन कर रहे हैं । न विरोधियों मेँ  एकता है न समर्थकों मेँ । वजह साफ है जिसका जैसा चश्मा उसके  वैसे प्रेमचंद । इसमे भी कोई दिक्कत नहीं है । सबको अपने ढंग से प्रेमचंद को देखने का हक़ हासिल है । समस्या तब होती है जब आप अपने ही रंग को असली  समझें  और दूसरे  सोचने विचारने  लायक भी न माने ।
जिस तरह से यह बहस  हो रही है उसमें   प्रेमचंद ही छूटे  जा रहे हैं । गांधी ,मार्क्स ,आंबेडकर ,दयानन्द पर बहस हो रही है और प्रेमचंद हैं कि बस किनारे बैठे मुस्करा रहे हैं । कि भाई बहस से खाली होना तो कुछ मेरी भी खोज खबर ले लेना ।  प्रेमचंद की मुस्कान में बहुत गहरा  अर्थ छुपा है। ऐसा मैंने क्या लिख दिया कि सब बौखलाए हुये हैं ,सब बेचैन हैं । आखिर इस बेचैनी का सबब क्या है ?
असल में प्रेमचंद भारतीय समाज के भीतरी आलोचक हैं । वे किसी ऊंचे आसन पर बैठे उपदेशक की तरह नहीं बल्कि समाज के भीतर से समाज को देख रहे हैं । इसीलिए प्रेमचंद की आलोचना जहां जड़ मानसिकता का मुंह चिढ़ाती है वहीं सामान्य मनुष्य को प्रेरित और प्रभावित करती है ।  हर वो विचार  जो मनुष्य को बेहतर बना सकता है प्रेमचंद को भाता है । बक़ौल गालिब –चलता हूँ थोड़ी दूर हर इक तेजरौ  के साथ /पहचानता नहीं हूँ ,अभी राहबर को मैं। 
अगर उन पर आर्य समाज का असर दिखता है तो इसलिए कि एक दौर में आर्य समाज ने हिन्दू समाज की संकीर्णताओं पर प्रहार किया था । अगर वे  गांधी के साथ दिखते हैं तो इसलिए कि इसमे उन्हें भारतीय समाज की मुक्ति की आहट सुनाई पड़ रही थी ।प्रेमचंद  अंबेडकर की प्रशंसा इसलिए करते हैं कि वे हिन्दू समाज के जड़ बंधनो को काटकर दलितों के लिए  मुक्ति- मार्ग प्रशस्त कर रहे थे । इसी तरह प्रेमचंद ने  प्रगतिशील लेखक संघ की सदारत करना स्वीकार  किया तो इसलिए कि उन्हें लगा कि यह संगठन सौंदर्य के मानदंड में बदलाव करके भारत की सांस्कृतिक चेतना को उन्नत करेगा । अपने उद्बोधन में जब प्रेमचंद ने कहा कि साहित्यकार स्वभाव से ही प्रगतिशील होता है तो वे अपने स्वभाव का ही परिचय दे रहे थे । बेशक प्रेमचंद  जड़ों से जुड़े हुये थे लेकिन हर  तरह की जड़ता के विरोधी थे ।  इसलिए इस या उस जड़ता से उन्हें जोड़ने की कोशिशें अंतत : बेमानी ही सिद्ध होंगी ।
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