बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

सब जन एक हैं



सिरी रागु

तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ।
कनक कटिक जल तरंग जैसा । 1 ।
जउ  पै हम पाप न करता अहे अनंता ।
पतित पावन नामु कैसा हुंता । । 1 । ।
तुम्ह जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥
प्रभु ते अनु जानीजे जन ते सुआमी ॥ 2॥
सरीरु आराधे मो कउ बीचारु देहू ॥
रैदास समदलु समझावे कोऊ॥ 3॥

तुझमे मुझमें  ,मुझमें तुझमें अंतर क्या
सोना और सोने के कंगन  में
जल और तरंग में भेद कैसा ?
अरे हे अनंत !
जो हम  न करते होते पाप
तुम्हारा नाम पतित पावन कैसे होता ?
हे अंतर्यामी !
तुम जो नायक यह नायक बने हुये हो
बताओ तो ज़रा !
ठीक है कि-
प्रभु से ही होती है जन की पहचान
लेकिन यह भी तो उतना ही  सच है कि
प्रभु की पहचान भी अपने जन से होती है ।

हे मेरे प्रभु !
ऐसा विचार दो
कि शरीर तुम्हारी आराधना करे
अरे ! रैदास को कोई समझावे
(कि )सब (जन )समरस हैं
सब (जन) एक हैं ॥

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