सिरी
रागु
तोही
मोही मोही तोही अंतरु कैसा ।
कनक कटिक
जल तरंग जैसा । 1 ।
जउ पै हम पाप न करता अहे अनंता ।
पतित
पावन नामु कैसा हुंता । । 1 । ।
तुम्ह
जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥
प्रभु
ते अनु जानीजे जन ते सुआमी ॥ 2॥
सरीरु
आराधे मो कउ बीचारु देहू ॥
रैदास
समदलु समझावे कोऊ॥ 3॥
तुझमे
मुझमें ,मुझमें तुझमें अंतर क्या
सोना
और सोने के कंगन में
जल और
तरंग में भेद कैसा ?
अरे हे
अनंत !
जो हम
न करते होते पाप
तुम्हारा
नाम पतित पावन कैसे होता ?
हे अंतर्यामी
!
तुम जो
नायक यह नायक बने हुये हो
बताओ
तो ज़रा !
ठीक है
कि-
प्रभु
से ही होती है जन की पहचान
लेकिन
यह भी तो उतना ही सच है कि
प्रभु
की पहचान भी अपने जन से होती है ।
हे मेरे
प्रभु !
ऐसा विचार
दो
कि शरीर
तुम्हारी आराधना करे
अरे !
रैदास को कोई समझावे
(कि )सब
(जन )समरस हैं
सब (जन)
एक हैं ॥
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