बुधवार, 8 अप्रैल 2015

किसानों की आत्महत्याओं के दौर में राहुल सांकृत्यायन की याद/ सदानंद शाही



आज राहुल सांकृत्यायन का जन्मदिन है .पर उन्हें याद करने की फुर्सत किसे होगी .चाहें तो इस प्रश्न को सीधे पूछ सकते हैं कि आज राहुल को कौन याद करता है  ? यह प्रश्न मेरे जेहन में दो कारणों से आया .मैं विश्व विद्यालय के जिस भोजपुरी अध्ययन केंद्र में काम करता हूँ उसकी  लाइब्रेरी का नाम राहुल ग्रंथागार है. भोजपुरी के विकास में राहुल सांकृत्यायन के अवदान को देखते हुए यह नामकरण किया गया है . राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी में आठ नाटक लिखे,भोजपुरी में अनेक लेख लिखे और भोजपुरी की रचनात्मक क्षमता का उपयोग हिंदी को बेहतर बनाने के लिए  किया . भोजपुरी को देवनागरी लिपि में लिखने की प्रेरणा भी उन्होंने ही दी थी .किसान आन्दोलन के समय बिहार में छपरा और आसपास के जिलों में किसान सभाओं में राहुल भोजपुरी में भाषण देते  थे,जिससे किसानो को उनकी बातें समझाने में आसानी हो .यही सोचकर राहुल ने भोजपुरी में एक समाचार पत्र निकालने की योजना बनायी थी .आजादी के बाद जब साक्षरता का अभियान चल रहा था ,राहुल जी का  सुझाव  था कि लोगों को उनकी मातृभाषाओं  के माध्यम से साक्षर बनाया जाये .इससे साक्षरता का लक्ष्य भी पूरा हो जाएगा और लोक भाषाएँ भी सुरक्षित रहेंगी  .अभी हाल में विश्वविद्यालय में नैक की टीम आई थी .यह टीम विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता की जांच करके उनकी ग्रेडिंग करती   है .नैक की  टीम भोजपुरी अध्ययन केंद्र में भी आई .टीम के एक वरिष्ठ सदस्य की नजर राहुल ग्रंथागार पर पड़ी .उन्होंने छूटते ही मुझ से पूछा –‘यह क्या राहुल गाँधी के नाम पर है?’ .मुझे इस प्रश्न पर आश्चर्य नहीं हुआ .आश्चर्य शायद तब होता जब नैक की टीम के लोग राहुल सांकृत्यायन को जान रहे होते.क्योंकि हमारी अकादमिक दुनिया एपीआई ,ग्रेड और ग्रेड पे से आगे कोई सरोकार नहीं रखना चाहती .इसके लिए राहुल सांकृत्यायन को नहीं राहुल गाँधी को या ऐसे ही किसी दूसरे राजपुरुष को जानना ज्यादा जरुरी है .
दूसरा कारण  यह है कि मुझे  राहुल जयंती (नौ अप्रैल को ) के दिन छपरा के निकट एकमा नामक स्थान पर हो रहे कार्यक्रम में जाना है .वहां  राहुल जी की  प्रतिमा लग  रही है .यह आयोजन किसी सरकार या  सरकारी संस्था की पहल पर नहीं हो रहा है .किसान आन्दोलन के जमाने में राहुल जी इस गाँव में आते जाते थे . राहुल जी के प्रशंसकों /मित्रों के वारिसों के प्रयास से इस गाँव में राहुल जी की प्रतिमा  लगायी जा रही है .जिसका अनावरण करने हमारे समय के  हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह अपने साथी कवि अरुण कमल के साथ   एकमा पंहुच रहे हैं. राहुल जी को याद करते हुए अनेक छोटे बड़े कार्यक्रम हर साल होते रहते हैं और हो रहे हैं  . गाजीपुर ,आज़मगढ़ , देवरिया या बिहार के किसी अनाम से गाँव से खबर आती रहती है कि वहां राहुल की जयंती मनाई जा रही है .
आखिर ऐसा क्या है कि पढ़ा लिखा बुद्धिजीवी समाज और अकादमिक  जगत का अधिकांश राहुल को याद नहीं करता और मुख्यधारा की चमक और चकाचौंध से दूर ग्रामीण अंचल के किसान और किसाननुमा कवि लेखक पत्रकार उन्हें याद करते  हैं  .
राहुल सांकृत्यायन से बचपन में हमारा परिचय महान घुमक्कड़शास्त्री  के रूप में होता है. आगे चल कर उन्हें हम महापंडित के रूप में जानने लगते हैं ..वे  महान शोधकर्ता, चिन्तक और लेखक थे .तिब्बत यात्रा  की महान खोजों ने उन्हें अचानक विश्व प्रसिद्द बना दिया था .अनुसन्धान और लेखन की तमाम योजनाओं के हाथ में रहते हुए भी राहुल जी किसान आन्दोलन में कूद पड़े .क्योंकि उन्होंने विश्व यात्राओंके क्रम में महसूस किया था कि- ‘भारत जैसी गरीबी और कहीं नहीं है’ .राहुल जी किसानो और मजदूरों की तकलीफों से वाकिफ थे .वे यह जानते और मानते थे कि –‘निराकार स्वराज से काम नहीं चलेगा ,किसानो की साकार तकलीफों को दूर करना होगा’ . काशी प्रसाद जायसवाल ने राहुल के बारे में  लिखा है  –उनमें  बुद्ध और ईसा जैसी करुणा थी . किसानों  की साकार तकलीफों को देखकर राहुल के ह्रदय की यह महान  करुणा फूट पड़ी .  वे अच्छी तरह  देख रहे थे  कि  ‘किसानों  की जय का नारा जिन लोगों ने लगाकर किसानो के वोट लिए वही मंत्रिमंडल में पंहुच कर जमीदारों की तकलीफों पर लेक्चर देने लगे हैं’ . ‘देश की आजादी के लिए लड़ने वाले लोग किसानों  को पीस डालने के लिए किसी से कम नहीं हैं’ . इसलिए राहुल अपने बौद्धिक कार्य की परवाह किये बगैर किसान आन्दोलन में कूद पड़े .इस दौर में राहुल जी महसूस कर रहे थे कि किसानों के ‘संघर्ष संचालन के लिए कोई सेना संचालक मंडली ऐसी होनी चाहिए जिसके सदस्य दूरदर्शी हों ,अंतिम त्याग के लिए तैयार हों,और जिनको कोई प्रलोभन अपनी ओर खीँच न सके’. राहुल ऐसी मंडली की अगली पंक्ति में खुद जा खड़े हुए . अमवारी के  किसान प्रतिरोध में ब्रिटिश पुलिस और सामंत सेना का मुकाबला करने जो पहला दस्त गया राहुल उसमे शामिल हुए .उन पर लाठियां बरसायी  गयी ,उनका सिर फट गया .मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने गीत लिखा –‘राहुल के सिर से खून गिरे फिर क्यों वह खून उबल न उठे’.राहुल की गिरफ्तारी हुयी .राहुल डिगे नहीं और संघर्ष में डटे रहे .किसानों का भारी हुजूम संघर्ष में शामिल हुआ .राहुलजी ने शब्द और कर्म की एकता की अनूठी मिसाल कायम की . राहुल सांकृत्यायन सच्चे अर्थों में जन बुद्धिधर्मी  थे .आज राहुल जी को याद करते हुए यह बात शिद्दत से महसूस हो रही है कि देश का  किसान एक हारी हुयी लड़ाई लड़ रहा है .
 भारत एक कृषि प्रधान देश है ,ऐसा बचपन में किताबों आदि में पढ़ा था और  महसूस भी होता  था .आज  देश में किसानों  की हालत देख सुन  कर यह बात निखालिस किताबी लगती है.जिस देश में हर साल लाखों की संख्या में किसान आत्महत्याएं करने को अभिशप्त हों और किसी के कान पर जूं तक न रेंगे उसे कृषि प्रधान कैसे माना जाये .देश  के किसी न किसी हिस्से से किसानो की आत्महत्या की खबरें  रोज सुनाई पडती   हैं . इन खबरों को  हमारे राष्ट्रीय मीडिया में बमुश्किल जगह मिलती है . सभ्यता और विकास के नाम पर जिस तरह से आदिवासियों को जंगल से बेदखल कर दिया गया उसी तरह  जमीन  से किसानो को भी  बेदखल करने पर हम  आमादा  है. खेती को लाभकारी  और किसान को खुशहाल बनाना किसी के एजेंडे पर नहीं है ,क्योंकि विकास की महायोजना में खेती और किसानी की समाई है ही नहीं .बाप दादों से मिली जमीन ही उसका एकमात्र आसरा है .जो कभी कर्ज के बहाने तो कभी औद्योगीकरण और विकास के बहाने उससे छीनी जा रही है. खेती और किसानी एक गैर लाभकारी काम हो गया है .  इसीलिए किसान  उजड़ रहे हैं ,आत्म हत्याएं कर रहे हैं .किसान को हम अन्नदाता तो कहते हैं लेकिन उस अन्नदाता की निरंतर अधोगति हो रही है .और हम इसे होने दे रहे हैं .राहुल सांकृत्यायन ने उस दौर में लिखा था ‘मैं समझता था कि किसान अपने भीतर से नेता पैदा कर सकते हैं लेकिन कैसे? इसका जवाब अभी नहीं दे सकता था’.क्या हमारे आधुनिकतावादियों,उत्तर-आधुनिकातावादियों  ,राष्ट्रवादियों ,उत्तर राष्ट्रवादियों ,समाजवादियों ,उत्तर समाजवादियों  और तरह तरह के  मार्क्सवादियों के  पास आज इसका कोई जवाब है ?

1 टिप्पणी:

  1. sundar lekh badhai. hamari shiksha vyavstha ka via rahul aur kisan bhayanak sach ujagar karta lekh jaroor padha jaana chaiye. delhi university ke shikshakon ki jan kari ke liye saajha kar raha hun

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