सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में धर्मनिरपेक्षता
,गंगा जमुनी संस्कृति,भाई चारा जैसे विचार मुंह के बल गिर गए .रंग विरंगे विकास के
लुभावने नारे ने लोकतान्त्रिक चेतना और लोकतान्त्रिक अधिकारों के आकर्षण को मीलों
पीछे छोड़ दिया .कई ऐसे लोग मिले जिन्हें तानाशाही में कोई बुराई नजर नहीं आई .ऐसे
लोगों में डॉक्टर ,इंजिनियर ,ब्यूरोक्रेट और प्रोफ़ेसर आदि
भी शामिल हैं .समूचे मध्यवर्ग का कमोबेश यही हाल है .पिछले दो-तीन दशकों के भीतर मध्यवर्ग की संख्या में भारी इजाफा हुआ है.यह मध्यवर्ग किसी भी आदर्शवादी मूल्य से नहीं चिपका हुआ है .उसे सिर्फ विकास चाहिए.उस
विकास में दलितों ,अल्पसंख्यकों ,आदिवासियों .किसानों.मजदूरों और स्त्रियों के लिए
जगह है या नहीं इसकी परवाह उसे नहीं है .जनता के भारी हिस्से को तानाशाही में कोई
बुराई नहीं नजर आई .इसके उलट तानाशाही के स्वागत के लिए उत्सुकता दिखाई पड़ी . चिंता का
विषय यह नहीं है कि देश में तानाशाही आने जा रही है ,बल्कि चिंता इस बात की है कि
लोगों के मन में तानाशाही के लिए आकर्षण
पैदा हो गया है .
1857 से लेकर आजादी हासिल करने तक के जद्दोजहद में हमने बहुत से मूल्य विकसित किए
थे।इनमे सबसे बड़ा मूल्य आजादी
का था।मूल्य के रूप में आजादी के भीतर और भी विचार शामिल थे। हमने
आजादी
का यह अर्थ भी लिया कि ‘दूसरे की आजादी का सम्मान करें’ ।दूसरे
के होने का सम्मान करें । समानता और
भाई
चारा जैसे विचारो के मूल में यही भावना काम कर रही
थी। समानता और भाईचारे के विचार ने ही धर्म निरपेक्षता की शिक्षा दी। आजादी की इच्छा ने हमें और भी बहुत कुछ सिखाया । दलित और वंचित लोगों
को मुक्त और सम्पन्न बनाए बगैर सच्ची
आजादी संभव नहीं थी। इसलिए अछूतपन को मिटाने
की कोशिशें हुईं । दलित मुक्ति की दिशा में काफी कुछ काम हुआ । शताब्दियो
से रूढियों की
लौह श्रृंखला में जकडी स्त्रियों की मुक्ति का मसला भी सामने आया ।धीरे धीरे ही सही पर मजबूती के साथ इस दिशा में
आगे बढ़े। ये सारे विचार उन्नीसवीं और
बीसवीं शताब्दी में चले लम्बे स्वाधीनता संघर्ष के दौरान हुए समुद्र
मंथन से निकले । हमने इन मूल्यों को नये
विकसित हो रहे राष्ट्र का संकल्प पत्र घोषित किया । यह सब लोकतान्त्रिक व्यवस्था
में संभव हुआ .आज लोकतान्त्रिक व्यवस्था
और विचार का आकर्षण बहुत तेजी से क्षीण हुआ है .ऐसा लगता है कि हम सब कुछ उलट देने
को आमादा हैं.हमें तानाशाही आकर्षक और रंगीन दिखाई दे रही है . कभी अम्बेडकर
ने कहा था- ‘विचार चाहे जितने अच्छे हो उन्हें जीवित रखने के
लिए संघर्ष करने की जरूरत होती है।जिस तरह पौधे को बड़ा करने के लिए
खाद पानी और देखभाल की आवश्यकता होती,ठीक उसी तरह विचारों की भी देखभाल होनी
चाहिए ।पर्याप्त देखभाल के अभाव में पौधे
ही नहीं विचार भी मुरझा जाते हैं।‘ मौजूदा
राजनीतिक हालात में अम्बेडकर की यह बात और शिद्दत से
महसूस हो रही है ।
हमारे जेहन
में -सत्यमेव जयते का विचार पहले
से ही मौजूद था ।कहीं अवचेतन में हम यह मान बैठे
थे कि सत्य या सद्विचार स्वयं में इतने मजबूत हैं कि वे अपनी
रक्षा खुद कर लेंगे ।साँच को आंच क्या ।
हम यह भूल गये कि जिन पिछड़े हुए विचारों को पीछे छोड़ आये है , वे दोबारा उठ खड़े हो सकते हैं।अपने पराये , ऊँच नीच, धनी गरीब से लेकर धार्मिक और जातीय श्रेष्ठता की धारणाओं को हमने कम करके आँका।हमें भरोसा हो चला था कि झूठ के पाँव नहीं होते , इसलिए वह भला कैसे चलेगा । हमने सच को अकेला और निहत्था छोड़ दिया । हम यह भी भूल गये कि हमारी ही चेतना मे मौजूद अधिकार भावना , लोभ और लोलुपता का खाद पानी लेकर ये सारी वृत्तियाँ मजबूत होतीं रही हैं ।
इसी नाते लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चेतना में हमारा सामूहिक विश्वास शिथिल हुआ है।जिन प्रगतिशील और अग्रसोची विचारों पर हम रीझते रहे हैं', उनका आकर्षण कम हुआ है।आखिर क्यों ?क्यों लोगों को तानाशाही की तान मधुर लगाने लगी है ,बावजूद इसके कि हम अपने अगल बगल तानाशाही का हश्र देख रहे हैं . जिस तरह के धार्मिक और तानाशाही राज्य के लिए ललक पैदा हुयी है उसका जीता जागता नमूना हमारे पडोसी पाकिस्तान में मौजूद है। धार्मिक नफरत की राजनीति पर पाकिस्तान बना था। पाकिस्तान बन जाने के बाद कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना मुल्क को तर्क और विवेक के रास्ते पर ले जाना चाहते थे . लेकिन इस कोशिश में वे उसी नफरत की राजनीति के शिकार हुए,जिस पर सवार होकर वे स्वयं आये थे ।पाकिस्तान को अच्छे दिनों का सपना दिखाकर हर तानाशाही निजाम ने लूटा ही।इतने साफ उदाहरण के बाद भी हमारा दिल तथाकथित उदार तानाशाही के लिए मचल रहा है तो इसे क्या कहेंगे ?
हम यह भूल गये कि जिन पिछड़े हुए विचारों को पीछे छोड़ आये है , वे दोबारा उठ खड़े हो सकते हैं।अपने पराये , ऊँच नीच, धनी गरीब से लेकर धार्मिक और जातीय श्रेष्ठता की धारणाओं को हमने कम करके आँका।हमें भरोसा हो चला था कि झूठ के पाँव नहीं होते , इसलिए वह भला कैसे चलेगा । हमने सच को अकेला और निहत्था छोड़ दिया । हम यह भी भूल गये कि हमारी ही चेतना मे मौजूद अधिकार भावना , लोभ और लोलुपता का खाद पानी लेकर ये सारी वृत्तियाँ मजबूत होतीं रही हैं ।
इसी नाते लोकतंत्र और लोकतांत्रिक चेतना में हमारा सामूहिक विश्वास शिथिल हुआ है।जिन प्रगतिशील और अग्रसोची विचारों पर हम रीझते रहे हैं', उनका आकर्षण कम हुआ है।आखिर क्यों ?क्यों लोगों को तानाशाही की तान मधुर लगाने लगी है ,बावजूद इसके कि हम अपने अगल बगल तानाशाही का हश्र देख रहे हैं . जिस तरह के धार्मिक और तानाशाही राज्य के लिए ललक पैदा हुयी है उसका जीता जागता नमूना हमारे पडोसी पाकिस्तान में मौजूद है। धार्मिक नफरत की राजनीति पर पाकिस्तान बना था। पाकिस्तान बन जाने के बाद कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना मुल्क को तर्क और विवेक के रास्ते पर ले जाना चाहते थे . लेकिन इस कोशिश में वे उसी नफरत की राजनीति के शिकार हुए,जिस पर सवार होकर वे स्वयं आये थे ।पाकिस्तान को अच्छे दिनों का सपना दिखाकर हर तानाशाही निजाम ने लूटा ही।इतने साफ उदाहरण के बाद भी हमारा दिल तथाकथित उदार तानाशाही के लिए मचल रहा है तो इसे क्या कहेंगे ?
आजादी की लडाई
के दौरान विकसित लोकतांत्रिक मूल्यों का आकर्षण इसलिए खत्म होता चला गया क्योंकि लोकतान्त्रिक चेतना
के झंडाबरदारों से अनेक भूलें हुईं हैं .लालकृष्ण
आडवाणी बिलकुल सही कह रहे हैं कि भाजपा की असाधारण जीत के मूल में कांग्रेस और
लोकतान्त्रिक मूल्यों मे यकींन रखने वाली पार्टियों की ऐतिहासिक गलतियाँ
जिम्मेदार हैं .लम्बे समय तक देश ने
मूल्यों और आदर्शों के लिए त्याग ,तपस्या और कुर्बानी दी है .जबसे कुर्बानी
देने का साहस ख़त्म हुआ और उसकी जगह कुर्बानी के पाखण्ड ने ले ली तब से ऐसी गलतियां
आदत बनती गयीं . लोकतंत्र और समाजवाद का ढोल पीटने वाली राजनीतिक पार्टियों में न
तो लोकतंत्र के लिए सम्मान है और न ही समाजवाद के लिए .राजनीतिक दलों के भीतर
लोकतंत्र का न होना इसका सबसे बड़ा सुबूत है .इसी तरह धर्मनिरपेक्षता को झंडे की
तरह लहराते रहने के बावजूद उसके लिए हमारे मन में वास्तविक सम्मान नहीं है .मैं
केवल दो घटनाओं का जिक्र करना चाहता हूँ.शाहबानो केस के फैसले को राजीव गांधी की
सरकार ने संविधान संशोधन के द्वारा पलट दिया .जबकि कोर्ट का यह फैसला अल्पसंख्यक
वर्ग की आधी आबादी को सशक्त करने वाला था .याद करें –अनेक प्रगतिशील मुसलमान इस
फैसले की हिमायत कर रहे थे .उन्हें अनसुना करके कांग्रेस ने रुढ़िवादी लोगों के
सामने घुटने टेक दिए .वास्तव में कांग्रेस का यह फैसला अल्पसंख्यक समुदाय का वास्तविक
हित करने के लिए नहीं था . यह राजनीतिक
हित साधने के लिए लिया गया फैसला था . इस फैसले की प्रतिक्रिया से बहुसंख्यक वर्ग
के मन में उपजे असंतोष को दूर करने के लिए आनन् फानन में राम मंदिर का ताला खुलवा
दिया गया .यह फैसला भी राजनीतिकं लाभ के लिए ही था . उस समय कांग्रेस ने यदि अपने
लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए राजनीतिक लाभ की बलि देने का साहस किया होता
तो उसे आज यह दिन नहीं देखना पड़ता .कांग्रेस की इस गलती ने धर्म निरपेक्षता के
प्रति लोगों को शंकालु बनाया .इससे कांग्रेस को तात्कालिक लाभ जो भी मिला हो
दूरगामी तौर पर उसकी विश्वसनीयता ख़त्म होती गयी . तात्कालिक राजनीतिक लाभ को वरीयता
देने के नाते बहुतेरे लोगों को लोकतांत्रिक व्यवस्था से निराशा मिली .
इस निराशा में वे उन लोकतांत्रिक मूल्यों और अधिकारों तक को कुर्बान
करने को तैयार हो गए ,जिन्हें हासिल करने
के लिए एक लम्बी लड़ाई लड़ी गयी थी .यह मान लेना या कह देना कि इस तरह से तानाशाही का स्वागत करने
वाले सभी लोग अनिवार्यत: खराब या जाहिल लोग हैं ,सचाई को नजरअंदाज
करना है.।बेशक ऐसे काफी लोग हैं जिन्हे
विकास
की रंगीन छतरी के भीतर जातीय और
धार्मिक श्रेष्ठता वाले अच्छे दिनों की वापसी दिख रही है. किन्तु बहुतेरे ऐसे
संवेदनशील लोग भी हैं जो सचमुच तानाशाही को बेहतर विकल्प मान रहे
हैं. यही सबसे भयानक स्थिति है .यदि आप तानाशाह का इंतज़ार करेंगे तो वह प्रकट हो
जाएगा .इसलिए लोकतान्त्रिक और अग्रसोची मूल्यों को निहत्था छोड़ देने की बजाय उनके
लिए संघर्ष करने की जरुरत है ,तभी उन्हें जीवित और स्थापित किया जा सकता है.
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