मंगलवार, 3 सितंबर 2013

भूले हुए मिसरे की याद

भारत के विशाल भाषार्इ क्षेत्र में जैसे हिंदीतर भाषाओं के साथ हिन्दी के संबंध की समस्या महत्वपूर्ण है उसी प्रकार स्वयं हिन्दी प्रदेश के भीतर हिन्दी और उदर्ू के बीच संबंध की समस्या चुनौतीपूर्ण है। पहले उदर्ू नाम नहीं था, हिन्दी या हिन्दवी ही कही जाती थी। मीर कहते हैं- 'क्या जानूँ लोग कहते हैं किसको सरुरे कल्ब आया नहीं है लफ़्ज ये हिन्दी जबाँ के बीच।। खड़ी बोली के ढाँचे को हिन्दी या हिन्दवी के रचनाकारों ने इतना मांजा कि वह एक समर्थ गध भाषा में विकसित हो गयी। ये हिन्दी या हिन्दवी के रचनाकार हैं जिन्हें आज हम बड़ी आसानी से उदर्ू के खाते में डाल देते हैं। फिराक गोरखपुरी ठीक ही कहते हैं कि उदर्ू के साहित्यकारों ने हिन्दी गध को संगठित, सुगठित और सुसंस्Ñत बनाया। फिराक कहते हैं कि-'उदर्ू के साहित्यकारों ने और हिन्दी प्रांत के भद्र समाज ने खड़ी बोली या पच्छाहीं हिन्दी बोलने वालों में यह आत्मविश्वास पैदा कर दिया कि राष्ट्रभाषा का आन्दोलन कहाँ से कहाँ पहुँच गया, नही ंतो क्या अजब है कि बांग्ला या मराठी आदि उन्नत भाषायें मैदान में आ जातीं। मगर हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी हो सकती है, उदर्ू नहींं। यह राष्ट्रभाषा उदर्ू को मिटाकर नहीं, बलिक हिन्दी में उदर्ू के गुण लाकर बनार्इ जा सकती है। हुआ यह कि पहले हिन्दी और उदर्ू को अलगाया गया और फिर उसे आपसी प्रतिद्वंद्विता में डाल दिया गया। जाहिर है, प्रतिद्वंद्विता के मूल में भाषार्इ या साहितियक वजहें नहीं बलिक राजनीतिक और सांप्रदायिक वजहें रही हैं। इस प्रतिद्वंद्विता में दोनों ही भाषायें समान रूप से पराजित हुर्इ हैं। गालिब का एक शेर याद आता है- न गुल-ए- नग़मा: हूँ, न पर्द:- ए साज मैं हूँ अपने शिकस्त की आवाज़ यह बात दोनों भाषाओं पर समान रूप से लागू होती है। जाहिर है, अगर हम ऐसी प्रतिद्वनिद्वता में न फँसते तो आज हिन्दी को संस्Ñत और अंग्रेजी का और उदर्ू को फारसी का मुँह जोहने की जरूरत नहीं पड़ती। हिन्दी गध का विकास उदर्ू के रास्ते होकर आया है। और सब बातें छोड़ भी दी जायें ंतो सीधे-सीधे प्रेमचन्द का उदर्ू से हिन्दी में आगमन एक युगांतर है। देखते-देखते हमारा गध इतना प्रौढ़ इतना टकसाली हो गया, हमारा गध साहित्य इतना विकसित हो गया कि उसे लेकर हम विश्वसाहित्य के मंच पर गर्व के साथ खड़े हो सकते हैं। हिन्दी गध ही नहीं कविता में भी उदर्ू की परम्परायें विकसित हुइ±। आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द उदर्ू में ग़ज़लें कहा करते थे। निराला ने हिन्दी में ग़ज़लें कहीं। दुष्यंत कुमार आये और अब हिन्दी ग़ज़ल की एक पूरी पीढ़ी मौजूद है। कोर्इ भी भाषा जुबान तभी बन पाती है जब उसके दरवाजे शब्दों के लिए खुले हों। हमारी बोलियों ने सामाजिक- सांस्Ñतिक अन्त:क्रिया के दौरान अरबी फारसी के शब्दों को इस तरह अपनाया कि बोलियों के बीच से उन्हें अलगा पाना कठिन है। उदर्ू जब नहीं थी तब भी हमारे यहाँ अरबी-फारसी शब्दों का प्रयोग होता था। तुलसीदास के राम यों ही 'गरीब नेवाज नहीं हुए। तो अस्ल बात ये है कि उदर्ू और हिन्दी का जन्म साथ-साथ हुआ है। दोनों का भविष्य साथ-साथ होने में है। उदर्ू का जन्म ठेठ हिन्दुस्तान में हुआ है। इसलिए उदर्ू का भविष्य भी और कहीं नहीं, हिन्दुस्तान में और भारतीय उपमहाद्वीप में ही है। मीर और गा़लिब हिन्दुस्तान के कवि हैं और जितने उदर्ू के हैं उतने ही हिन्दी के । अकारण नहीं कि कर्इ बार इन कवियों में कबीर की अनुगूँजें सुनार्इ देती हैं। मीर कहते हैं- मीर के दीन-ओ-मजहब को, अब पूछते क्या हो उनने तो क़़श्क़: खेंचा, दैर में बैठा, कब का तर्क इस्लाम किया। ग़ालिब जब कह रहे होते हैं- रगो में दौड़ते फिरने के, हम नहीं काइल जब आँख ही से न टपका, तो फिर लहू क्या है तो बरबस कबीर की ये पंäयिँ याद आती हैं- सोर्इ आँसू साजना सोइ लोक विडाहिं जो लोइन लोहू चुवै जानौ हेतु हियाहिं।। उदर्ू और हिन्दी दोनों भाषाएँ और उनका साहित्य भारत की मिÍी की उपज है। इनके बीच आवजाही दोनों के लिए हितकर है । इनके बीच की बेगानगी नकली है। वजहे बेगानगी नहीं मालूम तुम जहाँ हो वहीं के हम भी हैं। इस बेगानगी ने दोनों का समान रूप से अनभल किया है। इसका अनुभव करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह कहते हैं- यह दीवार आखिर यह दीवार कब टूटेगी ? इतने बरस हुए ग़ज़लों से भरे इस उप महाद्वीप में मुझे एक भूले हुए मिसरे का अब भी इंतजा़र है। उस भूले हुए मिसरे को केदारनाथ सिंह गध में इस प्रकार याद करते हैं- 'मेरे जैसा व्यä तिे साहितियक खड़ी बोली की कल्पना ही नहीं कर सकता मीर और ग़ालिब के बिना। जरूरत इस भूले हुए मिसरे को फिर से याद करने की है।

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